|| ज्ञान का महासागर ||

भागवत पुराण, प्रथम स्कंध (24) : राजा परीक्षित का वैराग्य और गंगा तट पर उनका अंतिम संकल्प

भागवत पुराण, प्रथम स्कंध के इस लेख में पढ़िए राजा परीक्षित को तक्षक सर्प के शाप के बाद वैराग्य कैसे हुआ। उन्होंने राजपाट त्यागकर गंगा तट पर आमरण अनशन किया।

साझा करें:

Bhagwat Puran Parikshit Vairagya

राजधानी पहुँचने पर राजा परीक्षित को अपने उस निंदनीय कर्म ऋषि के अपमान पर गहरा पश्चाताप हुआ। वे अत्यंत उदास हो गए और मन ही मन सोचने लगे- “मैंने एक निरपराध और तेजस्वी ब्राह्मण के साथ अत्यंत नीच व्यवहार किया।

यह अत्यंत खेद की बात है। अवश्य ही इस अपमान का फल मुझे शीघ्र ही भोगना पड़ेगा और मैं यही चाहता हूँ, ताकि मेरे इस पाप का प्रायश्चित हो सके और फिर कभी ऐसा अपराध न करूँ।”

राजा परीक्षित को अपने अपराध पर हुआ पश्चाताप-

वे आगे सोचने लगे, “ब्राह्मणों के क्रोध की अग्नि आज ही मेरे राज्य, सेना और खजाने को भस्म कर दे, ताकि मेरे भीतर फिर कभी ब्राह्मण, देवता और गौओं के प्रति ऐसी पाप-बुद्धि उत्पन्न न हो।”

इसी चिंतन के बीच उन्हें ज्ञात हुआ कि ऋषि-पुत्र के शाप से सातवें दिन तक्षक सर्प उन्हें डसेगा। यह सुनकर वे विचलित नहीं हुए, बल्कि इसे अपने लिए शुभ मानने लगे। उन्होंने विचार किया-“मैं लंबे समय से संसार में आसक्त हो गया था। अब यह अवसर मिला है कि मैं वैराग्य धारण करूँ।”

राजा परीक्षित का वैराग्य-

वे पहले से ही सांसारिक भोगों को तुच्छ मानते थे। अब उन्होंने उनका पूर्ण त्याग कर भगवान श्रीकृष्ण के चरणों की सेवा को ही जीवन का लक्ष्य बना लिया। उन्होंने आमरण अनशन (मृत्यु तक उपवास) का व्रत धारण किया और गंगा के पवित्र तट पर जाकर बैठ गए।

गंगाजी, जिनका जल भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों के स्पर्श से पवित्र हुआ है और जिसमें तुलसी की सुगंध मिली रहती है, समस्त लोकों को पवित्र करती हैं। ऐसे समय कौन मरणासन्न व्यक्ति उनका आश्रय न लेगा? इस प्रकार राजा परीक्षित ने सभी आसक्तियों का त्याग कर मुनियों का व्रत धारण किया और एकाग्र भाव से भगवान के चरणों का ध्यान करने लगे।

कुछ ही समय में त्रिलोकी को पवित्र करने वाले महान ऋषि-मुनि अपने-अपने शिष्यों के साथ वहाँ पधारे। ऐसा कहा जाता है कि संतजन तीर्थों की यात्रा के बहाने स्वयं उन स्थानों को पवित्र कर देते हैं।

गंगा तट पर महान ऋषि-मुनियों का आगमन-

उस समय वहाँ अत्रि, वसिष्ठ, च्यवन, शरद्वान, अरिष्टनेमि, भृगु, अंगिरा, पराशर, विश्वामित्र, परशुराम, उतथ्य, इन्द्रप्रमद, इध्मवाह, मेधातिथि, देवल, आर्ष्टिषेण, भारद्वाज, गौतम, पिप्पलाद, मैत्रेय, और्व, कवष, अगस्त्य, भगवान व्यास, नारद और अन्य अनेक देवर्षि, ब्रह्मर्षि तथा राजर्षि उपस्थित हुए।

इतने महान ऋषियों को एकत्र देखकर राजा परीक्षित ने उनका यथायोग्य सत्कार किया। उन्होंने उनके चरणों में सिर रखकर वंदना की और जब सभी अपने-अपने आसनों पर विराजमान हो गए, तब वे विनम्र भाव से हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हुए।

राजा परीक्षित ने ऋषियों के सामने क्या संकल्प लिया?

राजा परीक्षित बोले, “हम अत्यंत धन्य हैं कि आप जैसे महापुरुषों की कृपा हमें प्राप्त हुई। राजवंश के लोग प्रायः अपने कर्मों के कारण ब्राह्मणों के चरणों से दूर हो जाते हैं-यह अत्यंत दुःख की बात है। मैं भी देह और गृह में आसक्त होकर पापमय जीवन जी रहा था।

अब भगवान ने ब्राह्मण के शाप के रूप में मुझ पर कृपा की है, जिससे मेरे भीतर वैराग्य उत्पन्न हुआ है।” उन्होंने आगे कहा- “अब मैंने अपना चित्त भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया है। चाहे तक्षक सर्प स्वयं आकर मुझे डसे या कोई अन्य उसके रूप में आए-मुझे इसकी कोई चिंता नहीं। आप कृपा करके भगवान की मधुर लीलाओं का गान करें।”

ऋषियों ने की परीक्षित की प्रशंसा -

राजा परीक्षित अत्यंत धीर थे। उन्होंने दृढ़ निश्चय के साथ गंगा के दक्षिण तट पर कुश का आसन बिछाकर उत्तरमुख होकर बैठ गए। राजकाज का भार वे पहले ही अपने पुत्र जनमेजय को सौंप चुके थे।

जब एकछत्र सम्राट परीक्षित इस प्रकार आमरण अनशन का व्रत लेकर बैठे, तब आकाश में स्थित देवताओं ने उनकी प्रशंसा करते हुए पुष्पों की वर्षा की और दिव्य नगाड़े बजने लगे। सभी ऋषि-मुनियों ने भी उनके इस निश्चय की सराहना की और “साधु-साधु” कहकर अनुमोदन किया।

उन्होंने कहा- “राजर्षि! आप पांडव वंश के गौरव हैं। भगवान श्रीकृष्ण के सेवक होने के कारण आपके लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि आपने क्षण भर में ही उस राजसिंहासन का त्याग कर दिया, जिसकी सेवा बड़े-बड़े राजा करते हैं।

हम सब यहीं रहेंगे, जब तक आप इस नश्वर शरीर को त्यागकर भगवद्धाम को प्राप्त नहीं हो जाते।” ऋषियों के ये मधुर, गंभीर और सत्य वचन सुनकर राजा परीक्षित ने उनका अभिनंदन किया और भगवान के दिव्य चरित्रों को सुनने की उत्कंठा प्रकट की।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

राजा परीक्षित को वैराग्य क्यों हुआ?

ऋषि के अपमान के बाद राजा परीक्षित को अपने कर्म पर गहरा पश्चाताप हुआ। तक्षक सर्प के शाप को उन्होंने संसार की आसक्ति छोड़कर वैराग्य धारण करने का अवसर माना।

राजा परीक्षित ने आमरण अनशन का संकल्प क्यों लिया?

उन्होंने सांसारिक भोगों का त्याग कर भगवान श्रीकृष्ण के चरणों की सेवा को जीवन का लक्ष्य बनाया और मृत्यु तक उपवास का व्रत धारण किया।

राजा परीक्षित आमरण अनशन के लिए कहाँ बैठे?

राजा परीक्षित गंगा के पवित्र दक्षिण तट पर कुश का आसन बिछाकर उत्तरमुख होकर बैठे।

राजा परीक्षित के पास कौन-कौन से ऋषि-मुनि आए?

उनके पास अत्रि, वसिष्ठ, भृगु, अंगिरा, पराशर, विश्वामित्र, परशुराम, भारद्वाज, गौतम, अगस्त्य, भगवान व्यास, नारद और अनेक देवर्षि, ब्रह्मर्षि तथा राजर्षि आए।

राजा परीक्षित ने ऋषि-मुनियों से क्या प्रार्थना की?

उन्होंने ऋषि-मुनियों से भगवान श्रीकृष्ण की मधुर लीलाओं का गान करने और उनके दिव्य चरित्र सुनाने की प्रार्थना की।

नवीनतम लेख

सभी लेख देखें
श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 1, श्लोक 34 : अर्जुन ने युद्धभूमि में किन संबंधियों को देखा?

भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 1, श्लोक 34 : अर्जुन ने युद्धभूमि में किन संबंधियों को देखा?

भगवद्गीता के अध्याय 1 के श्लोक 34 में अर्जुन युद्धभूमि में उपस्थित आचार्य, पिता, पुत्र, पितामह, मामा, ससुर और अन्य संबंधियों को देखकर युद्ध करने के धर्म पर प्रश्न उठाते हैं।

कामना का त्याग क्यों जरूरी है? इच्छाओं से मुक्ति कैसे मिलेगी?

आध्यात्म

कामना का त्याग क्यों जरूरी है? इच्छाओं से मुक्ति कैसे मिलेगी?

कामना का अर्थ, इच्छाओं से उत्पन्न आसक्ति, क्रोध और मानसिक अशांति को समझिए। जानिए विवेक, समता, आत्मसंतोष और ईश्वर के प्रति समर्पण से कामनाओं का त्याग कैसे करें।

सोमदत्त (सौदास) को असुर योनि क्यों मिली? शिव के शाप से कैसे हुआ उद्धार?

पौराणिक कथाएं

सोमदत्त (सौदास) को असुर योनि क्यों मिली? शिव के शाप से कैसे हुआ उद्धार?

सोमदत्त (सौदास) को महादेव ने असुर योनि का शाप क्यों दिया? जानिए गौतम ऋषि की सलाह, गर्ग मुनि द्वारा नौ दिनों तक सुनाई गई रामकथा और उसके चमत्कारी प्रभाव की कथा।

भागवत पुराण, प्रथम स्कंध (24) : राजा परीक्षित का वैराग्य और गंगा तट पर उनका अंतिम संकल्प

भागवत पुराण

भागवत पुराण, प्रथम स्कंध (24) : राजा परीक्षित का वैराग्य और गंगा तट पर उनका अंतिम संकल्प

भागवत पुराण, प्रथम स्कंध के इस लेख में पढ़िए राजा परीक्षित को तक्षक सर्प के शाप के बाद वैराग्य कैसे हुआ। उन्होंने राजपाट त्यागकर गंगा तट पर आमरण अनशन किया।