भगवान के स्वधाम-गमन और यदुवंश के संहार का वृत्तान्त सुनकर निश्चलमति युधिष्ठिर ने स्वर्गारोहण का निश्चय किया। कुन्ती ने भी अर्जुन के मुख से यदुवंशियों के नाश और भगवान के स्वधाम-गमन का समाचार सुनकर अनन्य भक्ति से अपने हृदय को भगवान श्रीकृष्ण में लगा दिया और सदा के लिए इस जन्म-मृत्यु रूप संसार से अपना मुँह मोड़ लिया।
भगवान श्रीकृष्ण ने लोकदृष्टि में जिस यादव-शरीर से पृथ्वी का भार उतारा था, उसका उसी प्रकार परित्याग कर दिया, जैसे कोई काँटे से काँटा निकालकर दोनों को ही फेंक देता है।
भगवान की दृष्टि में दोनों ही समान थे। जैसे वे नट के समान मत्स्य आदि रूप धारण करते हैं और फिर उनका त्याग कर देते हैं, वैसे ही उन्होंने जिस यादव-शरीर से पृथ्वी का भार दूर किया था, उसे भी त्याग दिया।
जिनकी मधुर लीलाएँ श्रवण करने योग्य हैं, उन भगवान श्रीकृष्ण ने जब अपने मनुष्य-से प्रतीत होने वाले शरीर का परित्याग किया, उसी दिन विचारहीन लोगों को अधर्म में प्रवृत्त करने वाला कलियुग प्रकट हो गया। महाराज युधिष्ठिर से कलियुग का प्रसार छिपा न रहा।
उन्होंने देखा कि देश, नगर, घर और समस्त प्राणियों में लोभ, असत्य, छल, हिंसा आदि अधर्मों की वृद्धि हो रही है। तब उन्होंने महाप्रस्थान का निश्चय किया। उन्होंने अपने विनयी पौत्र परीक्षित् को, जो गुणों में उन्हीं के समान थे, समुद्र से घिरी हुई पृथ्वी के सम्राट् पद पर हस्तिनापुर में अभिषिक्त किया।
उन्होंने मथुरा में शूरसेनाधिपति के रूप में अनिरुद्ध के पुत्र वज्र का भी अभिषेक किया। इसके पश्चात् समर्थ युधिष्ठिर ने प्राजापत्य यज्ञ करके आहवनीय आदि अग्नियों को अपने में लीन कर दिया; अर्थात् गृहस्थाश्रम के धर्म से मुक्त होकर उन्होंने संन्यास ग्रहण किया।
युधिष्ठिर ने अपने समस्त वस्त्राभूषण आदि वहीं त्याग दिए और ममता तथा अहंकार से रहित होकर समस्त बन्धनों को काट डाला। इस प्रकार शरीर को मृत्युरूप मानकर उन्होंने उसे त्रिगुणों में लीन कर दिया, त्रिगुणों को मूल प्रकृति में, सर्वकारणरूपा प्रकृति को आत्मा में और आत्मा को अविनाशी ब्रह्म में विलीन कर दिया।
उन्हें यह अनुभव होने लगा कि यह सम्पूर्ण दृश्य-प्रपञ्च ब्रह्मस्वरूप ही है। इसके पश्चात् उन्होंने शरीर पर चीर-वस्त्र धारण किया, अन्न-जल का त्याग कर दिया, मौन धारण किया और केशों को खोलकर बिखेर लिया। वे अपने स्वरूप को ऐसा प्रदर्शित करने लगे, मानो कोई जड़, उन्मत्त या पिशाच हो।
फिर वे बिना किसी की प्रतीक्षा किए और बहरे के समान किसी की बात पर ध्यान न देते हुए घर से निकल पड़े। हृदय में उस परब्रह्म का ध्यान करते हुए, जिसे प्राप्त करके पुनः लौटना नहीं होता, उन्होंने उत्तर दिशा की ओर यात्रा आरम्भ की- जिस दिशा में पहले महान् महात्मा जा चुके थे।
भीमसेन, अर्जुन आदि युधिष्ठिर के छोटे भाइयों ने भी यह देख लिया कि अब पृथ्वी के समस्त लोग अधर्म के सहायक कलियुग से प्रभावित हो चुके हैं; इसलिए वे भी श्रीकृष्ण-चरणों की प्राप्ति का दृढ़ निश्चय करके अपने ज्येष्ठ भ्राता के पीछे-पीछे चल पड़े।
उन्होंने जीवन के समस्त पुरुषार्थों को भलीभाँति प्राप्त कर लिया था; अतः यह निश्चय करके कि भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमल ही हमारे परम पुरुषार्थ हैं, उन्होंने उन्हें अपने हृदय में धारण कर लिया। पाण्डवों के हृदय में भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों के ध्यान से भक्ति-भाव उमड़ पड़ा।
उनकी बुद्धि सर्वथा शुद्ध होकर भगवान श्रीकृष्ण के उस परमोत्कृष्ट स्वरूप में अनन्य भाव से स्थिर हो गई, जिसमें केवल निष्पाप पुरुष ही स्थित हो सकते हैं। फलतः उन्होंने अपने विशुद्ध अन्तःकरण से वही परम गति प्राप्त कर ली, जो विषयासक्त दुष्ट मनुष्यों को कभी प्राप्त नहीं होती।
संयमी तथा श्रीकृष्ण-प्रेम में निमग्न भगवन्मय विदुरजी ने भी प्रभासक्षेत्र में अपने शरीर का त्याग कर दिया। उस समय उन्हें लेने के लिए आए हुए पितरों के साथ वे अपने लोक यमलोक को चले गए। द्रौपदी ने देखा कि पाण्डव अब सर्वथा निरपेक्ष हो गए हैं; तब उन्होंने भी अनन्य प्रेम से भगवान श्रीकृष्ण का चिन्तन करते हुए उन्हें प्राप्त कर लिया।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
भगवान श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन के बाद क्या हुआ?
भगवान श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन के बाद कलियुग का आरम्भ हुआ और युधिष्ठिर ने संसार में बढ़ते अधर्म को देखकर महाप्रस्थान का निर्णय लिया।
युधिष्ठिर ने अपना राज्य किसे सौंपा?
युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर में अपने पौत्र परीक्षित का सम्राट पद पर अभिषेक किया।
मथुरा का राजा किसे बनाया गया?
युधिष्ठिर ने मथुरा में अनिरुद्ध के पुत्र वज्र का शूरसेनाधिपति के रूप में अभिषेक किया।
पाण्डवों ने महाप्रस्थान क्यों किया?
कलियुग के प्रभाव और संसार से विरक्ति के बाद पाण्डवों ने भगवान श्रीकृष्ण के चरणों को अपना परम पुरुषार्थ मानकर उनके ध्यान में महाप्रस्थान किया।
द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण को कैसे प्राप्त किया?
द्रौपदी ने पाण्डवों को संसार से पूरी तरह विरक्त देखकर अनन्य प्रेम से भगवान श्रीकृष्ण का चिंतन किया और उन्हें प्राप्त कर लिया।









