भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि मनुष्य का मन केवल वर्तमान भोगों में ही नहीं फंसता, बल्कि ‘श्रुत’ और ‘श्रोतव्य’ भोगों में भी उलझा रहता है।
श्रुत और श्रोतव्य भोग क्या हैं?
'श्रुत’ का अर्थ है- वे भोग जिन्हें हमने सुना है, और ‘श्रोतव्य’ का अर्थ है वे भोग जिन्हें हम भविष्य में प्राप्त करने की कल्पना करते हैं। ये दोनों ही प्रकार के भोग मन को विचलित करते हैं और आध्यात्मिक उन्नति में बाधा बनते हैं।
सामान्यतः मनुष्य केवल उन वस्तुओं से ही आकर्षित नहीं होता जो उसके पास हैं, बल्कि उन चीजों से भी आकर्षित होता है जिनके बारे में उसने सुना है या जिनकी कल्पना करता है।
श्रुत भोग कैसे मन को आकर्षित करते हैं?
उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति ने किसी स्थान, वस्तु या सुख के बारे में सुना, तो उसके मन में उसे पाने की इच्छा उत्पन्न हो जाती है। यही इच्छा आगे चलकर कामना और फिर बंधन का कारण बनती है।
‘श्रुत' भोग वे हैं जो हमने दूसरों से सुनकर अपने मन में बसा लिए हैं। जैसे किसी ने कहा कि अमुक स्थान बहुत सुंदर है या अमुक वस्तु बहुत सुख देने वाली है, तो हम बिना अनुभव किए ही उसके प्रति आकर्षित हो जाते हैं। यह आकर्षण वास्तविकता पर नहीं, बल्कि कल्पना पर आधारित होता है।
श्रोतव्य भोग और भविष्य की कल्पना-
इसी प्रकार, ‘श्रोतव्य’ भोग वे हैं जिनकी हम कल्पना करते हैं कि भविष्य में हमें मिलेंगे। यह भविष्य की अपेक्षा और आशा मन को वर्तमान से हटाकर एक कल्पनात्मक संसार में ले जाती है। व्यक्ति सोचता रहता है,“जब मुझे यह मिलेगा, तब मैं सुखी हो जाऊंगा।”
लेकिन यह ‘तब’ कभी आता नहीं, और मन हमेशा असंतुष्ट बना रहता है। इन दोनों प्रकार के भोगों का त्याग इसलिए आवश्यक है, क्योंकि ये मन को स्थिर नहीं रहने देते। मन हमेशा या तो अतीत में सुनी हुई चीजों में उलझा रहता है या भविष्य की कल्पनाओं में भटकता रहता है।
इससे वर्तमान का सही उपयोग नहीं हो पाता और व्यक्ति अपने कर्तव्य से भी दूर हो जाता है। गीता के अनुसार, जब तक मन इन कल्पनाओं और इच्छाओं से मुक्त नहीं होता, तब तक वह समता को प्राप्त नहीं कर सकता और बिना समता के न तो शांति मिलती है और न ही आत्मज्ञान।
श्रुत और श्रोतव्य भोगों का त्याग क्यों जरूरी है?
श्रुत और श्रोतव्य भोगों का त्याग करने का अर्थ यह नहीं है कि हम संसार को छोड़ दें, बल्कि इसका अर्थ है- उनके प्रति अपने मन की आसक्ति को समाप्त करना। जब हम यह समझ लेते हैं कि इन भोगों में स्थायी सुख नहीं है, तब धीरे-धीरे उनका आकर्षण कम होने लगता है।
इसके लिए विवेक का अभ्यास आवश्यक है। जब हम बार-बार यह विचार करते हैं कि वास्तविक सुख भीतर है, बाहर नहीं, तब हमारा मन इन भोगों से हटने लगता है। साथ ही, निष्काम कर्म और समभाव का अभ्यास भी हमें इनसे मुक्त करने में सहायक होता है।
अंततः, श्रुत और श्रोतव्य भोग केवल मन की कल्पनाएं हैं, जो हमें वास्तविकता से दूर ले जाती हैं। जब हम इनसे ऊपर उठते हैं, तब हमारा मन वर्तमान में स्थिर होता है और हमें सच्ची शांति का अनुभव होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
श्रुत भोग का क्या अर्थ है?
श्रुत भोग वे भोग हैं जिन्हें हमने दूसरों से सुनकर अपने मन में बसा लिया है और जिनके प्रति आकर्षण उत्पन्न हो जाता है।
श्रोतव्य भोग किसे कहा गया है?
श्रोतव्य भोग वे हैं जिनकी हम कल्पना करते हैं कि भविष्य में हमें प्राप्त होंगे।
श्रुत और श्रोतव्य भोगों का त्याग क्यों जरूरी है?
क्योंकि ये मन को अतीत की सुनी हुई बातों और भविष्य की कल्पनाओं में उलझाए रखते हैं, जिससे मन स्थिर नहीं रह पाता।
क्या इन भोगों का त्याग करने के लिए संसार छोड़ना जरूरी है?
नहीं। इनका त्याग करने का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, बल्कि इनके प्रति मन की आसक्ति को समाप्त करना है।
श्रुत और श्रोतव्य भोगों से ऊपर उठने का उपाय क्या है?
विवेक, निष्काम कर्म और समभाव के अभ्यास से मन धीरे-धीरे इन भोगों की आसक्ति से मुक्त होकर वर्तमान में स्थिर हो सकता है।








