पिछले प्रसंग में विदुर के उपदेश से धृतराष्ट्र और गान्धारी के वनगमन तथा उनके वैराग्य का वर्णन हुआ। अब आगे की कथा में धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा देखे गए अशुभ संकेतों और अर्जुन की व्यथित अवस्था का प्रसंग आता है।
अर्जुन की प्रतीक्षा में युधिष्ठिर क्यों होने लगे चिंतित?
भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा को जानने और अपने स्वजनों से मिलने के लिए अर्जुन द्वारका गए हुए थे। परन्तु कई महीने बीत जाने पर भी जब वे लौटकर नहीं आए, तब धर्मराज युधिष्ठिर के मन में चिंता उत्पन्न होने लगी। उन्हें चारों ओर भयंकर अपशकुन दिखाई देने लगे। उन्होंने देखा कि काल की गति अत्यन्त विचित्र हो गई है। ऋतुएँ अपने स्वभाव के अनुसार नहीं चल रही थीं और प्रकृति की क्रियाएँ उलट-पुलट हो रही थीं। लोगों का स्वभाव भी बदल चुका था।
वे क्रोधी, लोभी और असत्यपरायण हो गए थे। जीवन-निर्वाह के लिए लोग अधर्मपूर्ण उपायों का सहारा लेने लगे थे। व्यवहार में कपट भर गया था और यहाँ तक कि मित्रता तथा पारिवारिक संबंधों में भी छल और कलह बढ़ने लगी थी। इन सब लक्षणों को देखकर युधिष्ठिर ने समझ लिया कि कलियुग का प्रभाव प्रारम्भ हो रहा है और कोई बड़ा अनिष्ट निकट है। उन्होंने अपने भाई भीमसेन से कहा कि अर्जुन को द्वारका भेजे हुए सात महीने बीत चुके हैं, फिर भी वे वापस नहीं आए हैं। इसका कारण समझ में नहीं आता।
युधिष्ठिर को कलियुग के कौन-कौन से संकेत दिखाई दिए?
युधिष्ठिर ने यह भी आशंका प्रकट की, कि कहीं वह समय तो नहीं आ गया, जब भगवान श्रीकृष्ण अपनी लीला को समाप्त करने वाले हैं। उन्होंने स्मरण किया कि उन्हीं भगवान की कृपा से उन्हें राज्य, धन, विजय और समस्त सुख प्राप्त हुए थे। इसके साथ ही युधिष्ठिर ने अनेक भयंकर अपशकुनों का वर्णन किया।
उन्होंने कहा कि आकाश में उल्कापात हो रहा है, पृथ्वी काँप रही है और शरीरों में रोग बढ़ रहे हैं। उनकी बायीं जाँघ, आँख और भुजा बार-बार फड़क रही है तथा हृदय तीव्र गति से धड़क रहा है, जो किसी बड़े अनिष्ट का संकेत देता है।
उन्होंने देखा कि सियार सूर्य की ओर मुँह करके रो रही है, कुत्ते निर्भय होकर चिल्ला रहे हैं और पशु-पक्षियों का व्यवहार भी विचित्र हो गया है। गौएँ रो रही हैं, बछड़े दूध नहीं पी रहे और बैल उदास हो गए हैं।
दिशाएँ धुँधली हो गई हैं, सूर्य और चन्द्रमा के चारों ओर मण्डल बन रहे हैं, बादल भयंकर गर्जना कर रहे हैं और बिजली बार-बार गिर रही है। धूल भरी आँधी चल रही है और ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति स्वयं किसी बड़े संकट की सूचना दे रही हो।
अर्जुन द्वारका से लौटे तो उनकी हालत कैसी थी?
युधिष्ठिर ने देखा, देवताओं की मूर्तियाँ भी विचलित-सी प्रतीत हो रही थीं, उनमें से पसीना निकल रहा था और वे हिलती हुई जान पड़ती थीं। नगर, ग्राम, वन और आश्रम सब अपने वैभव और आनंद से शून्य हो गए थे। इन सभी उत्पातों को देखकर युधिष्ठिर अत्यंत चिंतित हो उठे। उन्हें ऐसा लगा कि यह सब संकेत इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि पृथ्वी भगवान श्रीकृष्ण के चरणों के स्पर्श से वंचित होने वाली है।
इसी चिंता में डूबे हुए थे कि उसी समय अर्जुन द्वारका से लौट आए। युधिष्ठिर ने देखा कि अर्जुन अत्यंत व्याकुल अवस्था में हैं। उनका मुख म्लान है, नेत्रों से आँसू बह रहे हैं और शरीर की कान्ति लुप्त हो चुकी है। अपने प्रिय भाई को इस दशा में देखकर युधिष्ठिर का हृदय द्रवित हो उठा और वे भय तथा चिंता से भर गए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
युधिष्ठिर अर्जुन की प्रतीक्षा क्यों कर रहे थे?
अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा जानने और अपने स्वजनों से मिलने के लिए द्वारका गए थे। सात महीने बीतने के बाद भी उनके न लौटने से युधिष्ठिर चिंतित हो गए।
युधिष्ठिर को कौन-कौन से अपशकुन दिखाई दिए?
उन्हें उल्कापात, भूकंप, रोगों की वृद्धि, पशु-पक्षियों के विचित्र व्यवहार, धूल भरी आँधी, भयंकर गर्जना और अन्य अशुभ संकेत दिखाई दिए।
युधिष्ठिर ने इन संकेतों को किससे जोड़ा?
युधिष्ठिर को लगा कि ये घटनाएँ कलियुग के प्रभाव और किसी बड़े अनिष्ट के आने का संकेत हैं।
युधिष्ठिर को श्रीकृष्ण के संबंध में क्या आशंका हुई?
उन्हें आशंका हुई कि कहीं भगवान श्रीकृष्ण अपनी पृथ्वी की लीला समाप्त करने वाले तो नहीं हैं।
द्वारका से लौटते समय अर्जुन की अवस्था कैसी थी?
अर्जुन अत्यंत व्यथित थे। उनका मुख म्लान था, आँखों से आँसू बह रहे थे और शरीर की कान्ति भी समाप्त हो गई थी।









