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भागवत पुराण, प्रथम स्कंध (21) : परीक्षित् की दिग्विजय तथा धर्म और पृथ्वी का संवाद

भागवत पुराण प्रथम स्कंध के इस लेख में राजा परीक्षित् की दिग्विजय, धर्म और पृथ्वी के संवाद, कलियुग के प्रभाव, भगवान श्रीकृष्ण के लीला-समापन और पृथ्वी के शोक का वर्णन है।

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धर्म और पृथ्वी का संवाद

पाण्डवों के महाप्रयाण के पश्चात् भगवान् के परम भक्त राजा परीक्षित् श्रेष्ठ ब्राह्मणों की शिक्षा के अनुसार पृथ्वी का शासन करने लगे। उनके जन्म के समय ज्योतिषियों ने उनके विषय में जो कुछ कहा था, वे सभी महान् गुण वास्तव में उनमें विद्यमान थे। उन्होंने उत्तर की पुत्री इरावती से विवाह किया, जिससे जनमेजय आदि चार पुत्र उत्पन्न हुए।

परीक्षित् का शासन और अश्वमेध यज्ञ-

उन्होंने कृपाचार्य को अपना आचार्य बनाकर गंगा के तट पर तीन अश्वमेध यज्ञ किए, जिनमें ब्राह्मणों को पर्याप्त दक्षिणा दी गई। उन यज्ञों में देवता प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होकर अपना भाग ग्रहण करते थे। उन्हीं दिनों उनके शिविर से कुछ ही दूरी पर एक अद्भुत घटना घटी।

धर्म ने बैल का रूप धारण किया था और वह एक ही पैर से चल रहा था। एक स्थान पर उसे पृथ्वी गाय के रूप में मिली। पुत्र-वियोग से दुःखी माता के समान उसके नेत्रों से अश्रुधारा बह रही थी और उसका शरीर श्रीहीन हो गया था। धर्म ने पृथ्वी से पूछा।

धर्म ने कहा- “कल्याणि! क्या तुम कुशल से हो? तुम्हारा मुख मलिन हो रहा है और तुम श्रीहीन प्रतीत हो रही हो। अवश्य ही तुम्हारे हृदय में कोई गहन दुःख है। क्या तुम्हारा कोई प्रिय सम्बन्धी दूर देश चला गया है, जिसके कारण तुम शोक कर रही हो? या तुम मेरे लिए चिन्तित हो कि मेरे तीन चरण नष्ट हो गए हैं और अब मैं केवल एक पैर से ही स्थित हूँ?

संभव है, तुम इस बात से दुःखी हो कि अब शूद्र तुम्हारे ऊपर शासन करेंगे; या उन देवताओं के लिए शोक कर रही हो, जिन्हें अब यज्ञों में आहुति नहीं दी जाती।

क्या तुम उस प्रजा के लिए दुःखी हो, जो वर्षा के अभाव में अकाल और दुर्भिक्ष से पीड़ित हो रही है? देवि! क्या तुम उन स्त्रियों और असहाय बालकों के लिए शोक कर रही हो, जिन्हें राक्षस-समान मनुष्य सताते हैं?

क्या तुम्हें इस बात का दुःख है कि विद्या कुकर्मी ब्राह्मणों के हाथों में पड़ गई है और ब्राह्मण विप्रद्रोही राजाओं की सेवा कर रहे हैं? आज के राजा पूर्णतः कलियुग से प्रभावित होकर धर्म से भ्रष्ट हो गए हैं और उन्होंने बड़े-बड़े देशों को उजाड़ दिया है-क्या तुम उनके लिए शोक कर रही हो?

आज की जनता आहार-विहार, वस्त्र, स्नान और स्त्री-सहवास आदि में शास्त्रीय नियमों का पालन न करके स्वेच्छाचार में प्रवृत्त हो गई है। क्या इस कारण तुम दुःखी हो? माँ पृथ्वी! अब मुझे प्रतीत होता है कि तुम्हें भगवान् श्रीकृष्ण की स्मृति व्यथित कर रही है।

उन्होंने तुम्हारा भार उतारने के लिए अवतार लिया था और ऐसी दिव्य लीलाएँ कीं, जो मोक्ष का साधन हैं। अब उनके लीला-समापन के पश्चात् तुम उनके वियोग से शोकाकुल हो रही हो। देवि ! तुम तो धन-रत्नों की खान हो। अपने इस क्लेश का कारण बताओ, जिससे तुम इतनी दुर्बल हो गई हो। ऐसा प्रतीत होता है कि काल ने तुम्हारा वह सौभाग्य छीन लिया है, जिसकी देवता भी वन्दना करते थे।”

पृथ्वी ने भगवान् श्रीकृष्ण के वियोग को दुःख का कारण बताया-

पृथ्वी ने कहा- “धर्म! तुम जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब तुम स्वयं जानते हो। जिन भगवान् के आश्रय से तुम अपने चारों चरणों सत्य, पवित्रता, दया और तप से युक्त होकर संसार को सुख प्रदान करते थे, उन्हीं भगवान् के साथ असंख्य दिव्य गुण निवास करते हैं।

उनमें सत्य, पवित्रता, दया, क्षमा, त्याग, सन्तोष, सरलता, शम, दम, तप, समता, तितिक्षा, उपरति, शास्त्रविचार, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, वीरता, तेज, बल, स्मृति, स्वतन्त्रता, कौशल, कान्ति, धैर्य, कोमलता, निर्भीकता, विनय, शील, साहस, उत्साह, सौभाग्य, गम्भीरता, स्थिरता, आस्तिकता, कीर्ति, गौरव और निरहंकारता ये सभी अप्राकृत गुण निरन्तर उनके साथ रहते हैं।

वे ही समस्त गुणों के आश्रय, सौन्दर्य के धाम भगवान् श्रीकृष्ण अब इस लोक से अपनी लीला समेटकर चले गए हैं, और यह संसार पापमय कलियुग की कुदृष्टि का शिकार हो गया है। यही देखकर मैं अत्यन्त शोक कर रही हूँ। मैं अपने लिए, तुम्हारे लिए, देवताओं, पितरों, ऋषियों, साधुओं तथा समस्त वर्ण और आश्रमों के मनुष्यों के लिए शोक कर रही हूँ।

जिनके कृपा-कटाक्ष की प्राप्ति के लिए ब्रह्मा आदि देवताओं ने दीर्घकाल तक तप किया, और जिनके चरणकमलों की सेवा के लिए लक्ष्मीजी भी अपने कमलवन को छोड़ देती हैं उन भगवान् के चरणचिह्नों से विभूषित होकर ही मुझे अद्वितीय वैभव प्राप्त हुआ था।

परन्तु अब मेरा वह सौभाग्य समाप्त हो गया। भगवान् ने मुझे छोड़ दिया है। सम्भव है, अपने सौभाग्य पर गर्व करने के कारण ही मुझे यह दण्ड मिला हो। तुम अपने तीन चरणों के अभाव से दुःखी थे; अतः तुम्हें पुनः पूर्ण करने के लिए वे परमसुन्दर श्यामस्वरूप में यदुवंश में प्रकट हुए और असुरवंशी राजाओं के रूप में पृथ्वी पर बढ़े हुए भार को नष्ट कर दिया।

वे परम स्वतन्त्र भगवान् हैं। जिनकी प्रेममयी चितवन, मधुर मुस्कान और वाणी ने सत्यभामा आदि देवियों का भी मान हर लिया था, और जिनके चरणस्पर्श से मैं सदा आनन्दित रहती थी उन भगवान् श्रीकृष्ण के वियोग को कौन सह सकता है?”

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

राजा परीक्षित् ने किसके निर्देश के अनुसार पृथ्वी का शासन किया?

पाण्डवों के महाप्रयाण के पश्चात् राजा परीक्षित् श्रेष्ठ ब्राह्मणों की शिक्षा के अनुसार पृथ्वी का शासन करने लगे।

राजा परीक्षित् ने कितने अश्वमेध यज्ञ किए?

उन्होंने गंगा के तट पर तीन अश्वमेध यज्ञ किए।

धर्म ने किस रूप में पृथ्वी को देखा?

धर्म ने बैल का रूप धारण किया था और पृथ्वी को गाय के रूप में देखा।

पृथ्वी भगवान् श्रीकृष्ण के वियोग में क्यों शोक कर रही थी?

भगवान् श्रीकृष्ण इस लोक से अपनी लीला समेटकर चले गए थे और पृथ्वी उनके चरणचिह्नों से प्राप्त अपने अद्वितीय वैभव के समाप्त होने से शोक कर रही थी।

धर्म के कितने चरण नष्ट हो गए थे?

धर्म के तीन चरण नष्ट हो गए थे और वह केवल एक पैर से स्थित था।

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