राजा परीक्षित् एक दिन अपने राज्य का भ्रमण कर रहे थे। उन्होंने अद्भुत और दुःखद दृश्य देखा। एक व्यक्ति राजवेश धारण किए हुए हाथ में डंडा लेकर एक गाय और बैल को निर्दयता से पीट रहा है।
वह बैल अत्यन्त दुर्बल होकर केवल एक पैर पर खड़ा काँप रहा था और भय से व्याकुल होकर मूत्र त्याग कर रहा था।
दूसरी ओर गाय अत्यन्त कृशकाय, बछड़े से विहीन और भूख से पीड़ित थी। उसके नेत्रों से अश्रुधारा बह रही थी और वह बार-बार उस क्रूर व्यक्ति के प्रहार सह रही थी।
यह दृश्य देखकर राजा का हृदय करुणा से भर उठा और उन्होंने तत्काल अपने धनुष को चढ़ाकर उस दुष्ट को ललकारा कि वह कौन है जो निर्बल प्राणियों पर अत्याचार कर रहा है।
राजा परीक्षित् ने धर्म और पृथ्वी को दिया आश्वासन-
राजा ने उस व्यक्ति को धिक्कारते हुए कहा कि यद्यपि उसने राजा का वेश धारण किया है, किन्तु उसके कर्म उसे अधम सिद्ध करते हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जो निरपराधों पर अत्याचार करता है, वह दण्ड का अधिकारी है। इसके पश्चात् उन्होंने उस बैल से स्नेहपूर्वक पूछा कि वह कौन है, जिसका ऐसा दुःखद हाल हुआ है।
राजा ने यह भी कहा कि उनके राज्य में किसी भी प्राणी को भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि राजा का परम धर्म है- दुःखियों की रक्षा करना और दुष्टों का दमन करना। उन्होंने उस गाय को भी सांत्वना दी और आश्वासन दिया कि अब उसे कोई कष्ट नहीं होगा।
धर्म ने दुःख के कारण को लेकर क्या कहा?
बैल के रूप में उपस्थित धर्म ने अत्यन्त गूढ़ वाणी में उत्तर दिया। उसने कहा कि संसार में दुःख का वास्तविक कारण समझ पाना अत्यन्त कठिन है। कुछ लोग इसे कर्म का फल मानते हैं, कुछ प्रारब्ध को कारण बताते हैं, तो कुछ स्वभाव अथवा ईश्वर को कारण मानते हैं।
कई विचारक तो यह भी कहते हैं कि दुःख का कारण तर्क और वाणी से परे है। इस प्रकार धर्म ने किसी एक व्यक्ति को दोष न देकर यह संकेत किया कि संसार का दुःख अनेक कारणों से उत्पन्न होता है और उसका निर्णय सूक्ष्म विवेक से ही किया जा सकता है।
राजा परीक्षित् ने धर्म के वचनों को सुनकर समझ लिया कि यह कोई साधारण बैल नहीं, बल्कि स्वयं धर्म का ही स्वरूप है। उन्होंने देखा कि धर्म के चार में से तीन चरण- तप, शौच और दया नष्ट हो चुके हैं और केवल सत्य ही शेष रह गया है।
उसी प्रकार गाय के रूप में पृथ्वी भी अत्यन्त दुःखी थी, क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण के पृथ्वी से प्रस्थान के बाद अधर्म का प्रभाव बढ़ गया था। राजा ने दोनों को आश्वस्त किया और धर्म के तीनों चरणों को पुनः स्थापित करने का संकल्प किया।
कलियुग के रहने के लिए कौन से 5 स्थान दिए गए?
इसके बाद राजा परीक्षित् ने उस अत्याचारी को दण्ड देने के लिए अपनी तलवार उठाई। तब वह व्यक्ति भयभीत होकर उनके चरणों में गिर पड़ा और शरण माँगने लगा।
वह कोई और नहीं, स्वयं कलियुग था, जिसने अधर्म फैलाने के लिए यह रूप धारण किया था। राजा दयालु और शरणागत-वत्सल थे, अतः उन्होंने उसे मारने के स्थान पर चेतावनी दी कि वह उनके राज्य में अधर्म का प्रसार न करे।
जब कलियुग ने रहने के लिए स्थान माँगा, तब राजा ने उसे केवल चार स्थान दिए-जुआ, मद्यपान, स्त्री-संग और हिंसा-जहाँ असत्य, मद, आसक्ति और निर्दयता निवास करते हैं। बाद में उसे ‘सुवर्ण’ अर्थात् धन में भी स्थान मिला, जहाँ लोभ और अन्य दोष उत्पन्न होते हैं।
राजा परीक्षित् ने निर्देश दिया कि जो मनुष्य अपने कल्याण की इच्छा रखते हैं, उन्हें इन स्थानों से दूर रहना चाहिए। उन्होंने धर्म को पुनः स्थिर किया और पृथ्वी का संरक्षण किया।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
राजा परीक्षित् ने कलियुग को कौन-कौन से स्थान दिए?
राजा ने कलियुग को जुआ, मद्यपान, स्त्री-संग और हिंसा के स्थान दिए। बाद में उसे ‘सुवर्ण’ अर्थात् धन में भी स्थान मिला।
धर्म के कितने चरण नष्ट हो चुके थे?
धर्म के चार में से तीन चरण- तप, शौच और दया नष्ट हो चुके थे और केवल सत्य ही शेष रह गया था।
गाय और बैल के रूप में कौन उपस्थित थे?
बैल के रूप में स्वयं धर्म और गाय के रूप में पृथ्वी उपस्थित थी।
कलियुग को सुवर्ण में स्थान क्यों मिला?
सुवर्ण अर्थात् धन में लोभ और अन्य दोष उत्पन्न होते हैं, इसलिए बाद में कलियुग को सुवर्ण में भी स्थान मिला।
राजा परीक्षित् ने लोगों को किन स्थानों से दूर रहने का निर्देश दिया?
राजा परीक्षित् ने निर्देश दिया कि जो मनुष्य अपने कल्याण की इच्छा रखते हैं, उन्हें इन स्थानों से दूर रहना चाहिए।








