एक दिन राजा परीक्षित धनुष लेकर वन में शिकार खेलने गए। हिरणों का पीछा करते-करते वे अत्यंत थक गए। भूख और प्यास से उनका गला सूख रहा था, पर आसपास कहीं जल का कोई स्रोत नहीं मिला।
इसी अवस्था में वे पास ही स्थित एक ऋषि के आश्रम में पहुँच गए। आश्रम में उन्होंने देखा कि एक मुनि शांत भाव से आँखें बंद किए आसन पर बैठे हैं।
वे बाहरी संसार से पूरी तरह अलिप्त, इन्द्रियों, मन और बुद्धि से परे, ब्रह्म के तुरीय स्वरूप में स्थित थे। उनके शरीर पर बिखरी जटाएँ थीं और वे कृष्ण मृगचर्म धारण किए हुए थे। राजा परीक्षित ने उनसे जल की याचना की, किंतु मुनि समाधि में लीन थे, इसलिए उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
राजा परीक्षित् से हुई ये भारी भूल -
राजा को न तो बैठने के लिए आसन मिला, न किसी प्रकार का स्वागत-सत्कार हुआ। भूख-प्यास और थकान से व्याकुल होकर उन्होंने इसे अपना अपमान समझ लिया। उनके जीवन में ऐसा क्रोध पहले कभी नहीं आया था।
लौटते समय, क्रोधवश उन्होंने अपने धनुष की नोक से एक मरा हुआ साँप उठाया और उसे उस मुनि के गले में डाल दिया। मन में उन्होंने सोचा-“क्या ये सच में समाधि में हैं या केवल दिखावा कर रहे हैं?” वे वहाँ से अपनी राजधानी लौट आए।
श्रृंगी ऋषि ने राजा परीक्षित् को शाप क्यों दिया?
उसी समय, उस मुनि शमीक ऋषि का पुत्र पास ही अन्य ऋषि कुमारों के साथ खेल रहा था। जब उसे यह समाचार मिला कि राजा ने उसके पिता का अपमान किया है, तो वह क्रोध से भर उठा।
उसने कहा- “ये राजा लोग उच्छिष्ट खाने वाले कौओं के समान अहंकारी हो गए हैं। ब्राह्मणों के सेवक होकर भी वे अपने स्वामी का अपमान करते हैं। ऐसे मर्यादा-भंग करने वाले को दंड अवश्य मिलना चाहिए।”
क्रोध में भरे उस बालक ने कौशिकी नदी का जल लेकर आचमन किया और अपने तपोबल से शाप दे दिया- “जिस राजा परीक्षित ने मेरे पिता का अपमान किया है, उसे आज से सातवें दिन तक्षक सर्प डस लेगा।
शाप देने के बाद जब वह बालक आश्रम पहुँचा, तो अपने पिता के गले में मरा हुआ साँप देखकर दुःख से रोने लगा। उसके रोने की आवाज सुनकर शमीक ऋषि ने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं।
शमीक ऋषि को पुत्र के शाप पर हुआ पश्चाताप -
उन्होंने साँप को हटाकर पुत्र से पूछा- “बेटा, तुम क्यों रो रहे हो? किसने तुम्हारा अपकार किया है?” पुत्र ने सारी घटना कह सुनाई। यह सुनकर शमीक ऋषि ने अपने पुत्र की प्रशंसा नहीं की, बल्कि गहरा दुःख प्रकट करते हुए बोले- “मूर्ख बालक! तूने बहुत बड़ा पाप किया है। राजा परीक्षित कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। वे धर्मात्मा और भगवान के प्रिय भक्त हैं।
उन्होंने केवल क्षणिक भूल की, और तूने उन्हें इतना कठोर दंड दे दिया!” उन्होंने आगे समझाया- “राजा के कारण ही प्रजा सुरक्षित रहती है। यदि धर्मात्मा राजा न रहे, तो समाज में अराजकता फैल जाती है- चोरी, हिंसा और अधर्म बढ़ जाते हैं। तब लोग एक-दूसरे पर अत्याचार करने लगते हैं, और धर्म का नाश हो जाता है।”
शमीक ऋषि ने अत्यंत करुण भाव से कहा- “हमारा राजा निष्पाप है। इस नासमझी में तूने अपने ही रक्षक को दंड दे दिया। भगवान इसे क्षमा करें।” ऋषि शमीक को अपने पुत्र के इस कृत्य पर अत्यंत पश्चाताप हुआ। उन्होंने राजा के अपमान को महत्व नहीं दिया, बल्कि अपने पुत्र की भूल को ही बड़ा अपराध माना।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
राजा परीक्षित् ने ऋषि का अपमान क्यों किया?
भूख-प्यास और थकान से व्याकुल राजा परीक्षित् को ऋषि से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। उन्होंने इसे अपना अपमान समझ लिया और क्रोध में मरा हुआ साँप ऋषि के गले में डाल दिया।
राजा परीक्षित् को शाप किसने दिया था?
राजा परीक्षित् को शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंगी ने शाप दिया था।
श्रृंगी ऋषि ने राजा परीक्षित् को क्या शाप दिया?
श्रृंगी ऋषि ने शाप दिया कि राजा परीक्षित् को सातवें दिन तक्षक सर्प डस लेगा।
शमीक ऋषि ने अपने पुत्र को क्यों डाँटा?
शमीक ऋषि ने कहा कि राजा परीक्षित् धर्मात्मा और भगवान के प्रिय भक्त हैं। उन्होंने क्षणिक भूल की थी, इसलिए उन्हें इतना कठोर दंड देना उचित नहीं था।
शमीक ऋषि को श्रृंगी के शाप पर दुख क्यों हुआ?
शमीक ऋषि को लगा कि उनके पुत्र ने अपने ही रक्षक राजा को कठोर दंड देकर बड़ी भूल की है। धर्मात्मा राजा के न रहने पर समाज में अराजकता और अधर्म बढ़ सकता है।








