वाल्मीकि रामायण के प्रसंग में जब लव और कुश भगवान श्रीराम के दरबार में रामायण का गान कर रहे थे, तब उन्होंने केवल कथा ही नहीं सुनाई, बल्कि उस महान वंश और उसकी राजधानी अयोध्या का भी अत्यन्त मनोहारी चित्र प्रस्तुत किया। वे कहते हैं- यह सम्पूर्ण पृथ्वी, जो प्राचीन काल से लेकर अब तक अनेक पराक्रमी राजाओं के अधीन रही है, उसी इक्ष्वाकु वंश की गौरवशाली परम्परा में यह रामायण महाकाव्य प्रकट हुआ है। इसी वंश में महापराक्रमी राजा सगर हुए, जिन्होंने समुद्र की खुदाई करवाई और जिनके साथ साठ हजार पुत्र चलते थे।
लव-कुश विनम्रता से कहते हैं, ‘हम इस सम्पूर्ण रामायण का आदि से अन्त तक गान करेंगे। यह कथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने वाली है, अतः आप सब एकाग्र होकर इसका श्रवण करें।’ इसके बाद वे अयोध्या नगरी का वर्णन आरम्भ करते हैं। सरयू नदी के तट पर बसा हुआ कोशल देश अत्यन्त समृद्ध, सुखी और धन-धान्य से परिपूर्ण था। उसी पावन भूमि पर स्थित थी अयोध्या नगरी, जो समस्त लोकों में विख्यात थी। इस दिव्य पुरी का निर्माण स्वयं प्रजापति मनु ने किया था।
यह नगरी अत्यन्त विशाल थी- बारह योजन लम्बी और तीन योजन चौड़ी। इसकी रचना इतनी सुन्दर और सुव्यवस्थित थी कि दूर-दूर तक उसका वैभव प्रसिद्ध था। अयोध्या के राजमार्ग अत्यन्त भव्य थे। मुख्य मार्ग के दोनों ओर वृक्षों की पंक्तियाँ थीं, जो उसे अन्य मार्गों से अलग और विशेष बनाती थीं। जैसे स्वर्ग में इन्द्र की अमरावती नगरी शोभायमान होती है, उसी प्रकार पृथ्वी पर अयोध्या अपनी दिव्यता और वैभव से अनुपम थी। राजा दशरथ ने धर्म और न्याय के आधार पर इस नगरी को और अधिक विकसित किया था। उनके शासन में अयोध्या केवल एक नगर नहीं, बल्कि आदर्श राज्य का प्रतीक बन चुकी थी।
उस पुरी में सूत और मागध जैसे विद्वान लोग रहते थे, जो वंशावली और स्तुति का गान करते थे। नगर में नाटक-मण्डलियाँ थीं, जहाँ स्त्रियाँ ही नृत्य और अभिनय करती थीं। यह उस समय की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रमाण था। चारों ओर सुन्दर उद्यान, आम्र-वाटिकाएँ और हरियाली से भरे वन थे। साखू के वृक्षों ने मानो उस नगरी को चारों ओर से घेर रखा था। भूमि समतल और उपजाऊ थी, जिससे वहाँ अन्न की कभी कमी नहीं होती थी। अयोध्या का जल अत्यन्त मधुर और स्वादिष्ट था मानो ईख का रस हो।
वहाँ का अन्न उत्तम कोटि का था और जीवन पूर्णतः समृद्ध था। इस नगरी की सबसे बड़ी विशेषता थी उसके निवासी। वहाँ अग्निहोत्री, वेदों के ज्ञाता, शम-दम से युक्त और उच्च चरित्र वाले ब्राह्मण निवास करते थे। वे सत्यप्रिय, दानी और धर्मपरायण थे। उनके कारण अयोध्या केवल समृद्ध ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यन्त ऊँची थी। महर्षि और तपस्वी उस नगरी को सुशोभित करते थे, और राजा दशरथ उनके संरक्षण में धर्मपूर्वक राज्य का पालन करते थे।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-अयोध्या नगरी का निर्माण किसने किया था?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, अयोध्या नगरी का निर्माण स्वयं प्रजापति मनु ने किया था। यह सरयू नदी के तट पर स्थित कोशल देश की प्रसिद्ध राजधानी थी।
2-प्राचीन अयोध्या कितनी बड़ी थी?
वाल्मीकि रामायण के इस प्रसंग में अयोध्या को बारह योजन लंबी और तीन योजन चौड़ी बताया गया है। नगरी की रचना अत्यन्त सुव्यवस्थित और भव्य थी।
3-राजा दशरथ के समय अयोध्या की क्या विशेषताएं थीं?
अयोध्या में भव्य राजमार्ग, वृक्षों की कतारें, उद्यान, आम्र-वाटिकाएं, हरियाली, उत्तम अन्न और मधुर जल उपलब्ध था। नगर समृद्ध और सुव्यवस्थित बताया गया है।
4-अयोध्या में किस प्रकार के लोग रहते थे?
अयोध्या में वेदों के ज्ञाता, अग्निहोत्री, शम-दम से युक्त, सत्यप्रिय, दानी और धर्मपरायण ब्राह्मण रहते थे। महर्षि और तपस्वी भी नगरी की शोभा बढ़ाते थे।
5-लव-कुश ने अयोध्या का वर्णन क्यों किया था?
लव-कुश रामायण का गान करते हुए इक्ष्वाकु वंश और उसकी गौरवशाली राजधानी अयोध्या का वर्णन करते हैं। उन्होंने अयोध्या की समृद्धि, वैभव और धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन को भी कथा का हिस्सा बनाया।









