राजा दशरथ के वचनों में पुत्र के प्रति अगाध स्नेह झलक रहा था। उनके हर शब्द में राम के प्रति प्रेम और चिंता भरी हुई थी। परन्तु जब महर्षि विश्वामित्र ने यह सब सुना, तो वे अत्यंत कुपित हो उठे और गंभीर स्वर में बोले, “राजन! पहले आपने मेरी माँगी हुई वस्तु देने की प्रतिज्ञा की थी, और अब उसी से पीछे हटना चाहते हैं।
यह आचरण रघुवंशियों के योग्य नहीं है। प्रतिज्ञा का त्याग तो इस महान् कुल के पतन का संकेत है। यदि आपको यही उचित लगता है, तो मैं जैसे आया था, वैसे ही लौट जाता हूँ। अब आप अपनी प्रतिज्ञा को असत्य करके अपने हितैषियों के साथ सुखपूर्वक रहिए।”
महर्षि के इन कठोर वचनों के साथ ही उनका क्रोध प्रकट हुआ। उनके रोष से मानो पूरी पृथ्वी काँप उठी और देवताओं के हृदय में भी भय व्याप्त हो गया। ऐसा प्रतीत होने लगा कि उनका क्रोध समस्त संसार को विचलित कर देगा।
तभी धैर्य और तप के प्रतीक महर्षि वसिष्ठ आगे बढ़े। उन्होंने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए राजा दशरथ को शांतिपूर्वक समझाना आरम्भ किया, “हे राजन! आप इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए हैं, जो धर्म का प्रतीक माना जाता है। आपको अपने धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।
जो मनुष्य ‘मैं यह कार्य करूँगा’ कहकर भी अपने वचन का पालन नहीं करता, उसके यज्ञ, दान और अन्य पुण्य कर्म निष्फल हो जाते हैं। अतः आपको अपने वचन का पालन करते हुए श्रीराम को महर्षि विश्वामित्र के साथ भेज देना चाहिए।
यह श्रीराम और महर्षि विश्वामित्र- दोनों ही साक्षात् धर्म की मूर्ति हैं। वे बल, विद्या और तप तीनों में अद्वितीय हैं। तीनों लोकों में जितने भी अस्त्र-शस्त्र हैं, उनका ज्ञान इन्हें है। मेरे अतिरिक्त कोई भी इनके इस ज्ञान को पूर्णतः नहीं जानता। देवता, ऋषि, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर और महान नाग भी इनके प्रभाव को नहीं समझ सकते।”
वसिष्ठजी ने आगे कहा- “ये सभी दिव्य अस्त्र प्रजापति कृशाश्व के धर्मात्मा पुत्र हैं। पूर्वकाल में प्रजापति ने इन्हें कुशिकनन्दन विश्वामित्र को समर्पित किया था। प्रजापति दक्ष की दो कन्याएँ जया और सुप्रभा हैं, जिन्होंने सौ दिव्य अस्त्र-शस्त्रों को उत्पन्न किया।
जया के पचास पुत्र हैं, जो अत्यंत शक्तिशाली और रूपरहित हैं-वे असुरों की सेनाओं का नाश करने के लिए उत्पन्न हुए हैं। सुप्रभा के भी पचास पुत्र हैं, जिन्हें ‘संहार’ कहा जाता है। वे अत्यंत बलवान और दुर्जेय हैं, जिन पर विजय पाना किसी के लिए सरल नहीं है।
महर्षि विश्वामित्र इन सभी अस्त्रों के ज्ञाता हैं। इतना ही नहीं, वे नए अस्त्रों की रचना करने में भी समर्थ हैं। उनके लिए भूत और भविष्य की कोई बात अज्ञात नहीं है।” वसिष्ठजी ने अंत में स्पष्ट कहा, “हे रघुनन्दन! आपको किसी प्रकार का संदेह नहीं करना चाहिए। महर्षि विश्वामित्र स्वयं उन राक्षसों का संहार करने में समर्थ हैं, परंतु वे आपके पुत्र के कल्याण और उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए ही उसे अपने साथ ले जाना चाहते हैं।”
महर्षि वसिष्ठ के इन तर्कपूर्ण और धर्मयुक्त वचनों ने राजा दशरथ के हृदय का संशय दूर कर दिया। उनका मन शांत हो गया और वे प्रसन्नता से भर उठे। उन्होंने विचार किया कि यह केवल एक पिता का मोह था, जो उनके कर्तव्य के मार्ग में बाधा बन रहा था।
अब उन्हें यह स्पष्ट प्रतीत हुआ कि श्रीराम का महर्षि विश्वामित्र के साथ जाना ही उचित है। यह निर्णय न केवल उनके वचन की रक्षा करेगा, बल्कि राम के जीवन के महान् उद्देश्य की ओर भी एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा। इस प्रकार, रघुकुल के इस महान राजा ने अपने व्यक्तिगत स्नेह पर धर्म और कर्तव्य को वरीयता दी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग 21 में विश्वामित्र क्यों क्रोधित हुए?
राजा दशरथ द्वारा श्रीराम को उनके साथ भेजने से पीछे हटने पर महर्षि विश्वामित्र क्रोधित हुए।
वसिष्ठ ने राजा दशरथ को क्या समझाया?
वसिष्ठ ने उन्हें अपने वचन का पालन करने और धर्म के मार्ग पर चलते हुए श्रीराम को विश्वामित्र के साथ भेजने की सलाह दी।
विश्वामित्र को किन अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान था?
वसिष्ठ के अनुसार महर्षि विश्वामित्र तीनों लोकों के अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता थे और नए अस्त्रों की रचना करने में भी समर्थ थे।
जया और सुप्रभा के पुत्र कौन थे?
पौराणिक कथाओं के अनुसार जया के पचास और सुप्रभा के पचास पुत्र दिव्य अस्त्र-शस्त्रों के रूप में बताए गए हैं।
दशरथ ने अंत में श्रीराम को विश्वामित्र के साथ क्यों भेजा?
वसिष्ठ के धर्मयुक्त तर्क सुनकर दशरथ का संशय दूर हुआ और उन्होंने समझा कि पुत्र-मोह से ऊपर उठकर धर्म तथा अपने वचन का पालन करना उचित है।









