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वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग 19 : विश्वामित्र के मुख से श्रीराम को साथ ले जाने की माँग सुनकर राजा दशरथ का दुःखित एवं मूर्च्छित होना

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग 19 में विश्वामित्र राजा दशरथ से यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम को साथ ले जाने की मांग करते हैं, जिसे सुनकर दशरथ पुत्र-वियोग के भय से मूर्छित हो जाते हैं।

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Valmiki Ramayan Bal Kand Sarg 19

महातेजस्वी महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ के सामने उपस्थित होकर गंभीर स्वर में बोले, “हे नृपश्रेष्ठ! अब मेरे हृदय में जो बात है, उसे ध्यानपूर्वक सुनिए और उसे पूर्ण करने का निश्चय कीजिए। आपने पहले ही मेरे कार्य की सिद्धि का वचन दिया है, अतः अब अपनी उस प्रतिज्ञा को सत्य सिद्ध कीजिए।

मैं एक विशेष नियम के साथ यज्ञ का अनुष्ठान कर रहा हूँ, किंतु उसमें बार-बार विघ्न पड़ रहा है। दो मायावी राक्षस मारीच और सुबाहु मेरे यज्ञ को नष्ट कर देते हैं। वे अत्यंत बलवान और रूप बदलने में समर्थ हैं। उन्होंने मेरी यज्ञवेदी पर रक्त और मांस की वर्षा करके उसे अपवित्र कर दिया।

इस प्रकार, जब मेरा अनुष्ठान लगभग पूर्ण होने को होता है, तब वे उसे नष्ट कर देते हैं। इससे मेरा सारा परिश्रम व्यर्थ हो गया और मैं निराश होकर वहाँ से चला आया।”

विश्वामित्र ने श्रीराम को अपने साथ ले जाने की मांग क्यों की?

महर्षि ने आगे कहा,“हे राजन! आप अपने ज्येष्ठ पुत्र, सत्यपराक्रमी और शूरवीर श्रीराम को मेरे साथ भेज दीजिए। मैं उन्हें अनेक प्रकार के श्रेष्ठ लाभ प्रदान करूँगा इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। उन राक्षसों की सामर्थ्य श्रीराम के सामने कुछ भी नहीं है; वे उनके सामने टिक नहीं पाएँगे।

आप पुत्र-स्नेह को अपने निर्णय के मार्ग में बाधा न बनने दें। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि वे दोनों राक्षस श्रीराम के हाथों मारे जाएँगे। यदि आप इस पृथ्वी पर धर्म और यश को स्थिर रखना चाहते हैं, तो श्रीराम को मेरे साथ भेजना ही उचित होगा।

राजा दशरथ की क्या दशा हुई?

यदि आपके गुरु वशिष्ठ और मंत्रीगण भी इसकी अनुमति दें, तो आप अपने कमलनयन पुत्र को मेरे साथ विदा कर दीजिए। यह यज्ञ अब केवल दस दिनों में पूर्ण होगा, और इतने समय के लिए ही मैं श्रीराम को अपने साथ ले जाना चाहता हूँ।” इस प्रकार धर्म, अर्थ और मर्यादा से युक्त वचन कहकर परमबुद्धिमान विश्वामित्र मौन हो गए।

महर्षि के ये वचन सुनकर महाराज दशरथ का हृदय व्याकुल हो उठा। अपने प्रिय पुत्र से वियोग की आशंका ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। वे इस दुख को सहन न कर सके -उनका शरीर काँपने लगा और वे अचानक मूर्छित होकर गिर पड़े।

कुछ समय बाद जब उन्हें होश आया, तो वे अत्यंत व्यथित और भयभीत हो उठे। विश्वामित्र के शब्द उनके हृदय को विदीर्ण कर रहे थे। उनके मन में गहरा विषाद छा गया।

वे अपने आसन पर स्थिर नहीं रह सके और पुनः असहाय होकर डगमगा गए। राजा दशरथ, जो महान धैर्य और बुद्धि के धनी थे, इस समय एक साधारण पिता बन गए थे- जिसका हृदय अपने पुत्र के वियोग की कल्पना से ही टूटने लगा था।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

विश्वामित्र राजा दशरथ के पास क्यों आए थे?

विश्वामित्र अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राजा दशरथ से श्रीराम को अपने साथ ले जाने की अनुमति मांगने आए थे।

विश्वामित्र के यज्ञ में कौन विघ्न डाल रहे थे?

मारीच और सुबाहु नामक मायावी राक्षस विश्वामित्र के यज्ञ में बार-बार विघ्न डाल रहे थे।

विश्वामित्र श्रीराम को कितने समय के लिए साथ ले जाना चाहते थे?

विश्वामित्र ने कहा कि उनका यज्ञ दस दिनों में पूरा होगा और वे श्रीराम को इतने ही समय के लिए साथ ले जाना चाहते हैं।

श्रीराम को साथ भेजने की बात सुनकर दशरथ क्यों मूर्छित हो गए?

दशरथ को अपने प्रिय ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम से वियोग का भय सताने लगा। इसी दुख और चिंता के कारण वे मूर्छित होकर गिर पड़े।

विश्वामित्र ने श्रीराम को राक्षसों के सामने भेजना क्यों उचित माना?

विश्वामित्र को विश्वास था कि श्रीराम अत्यंत शूरवीर हैं और मारीच तथा सुबाहु जैसे राक्षस उनके सामने टिक नहीं पाएँगे।

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