उधर महामना राजा दशरथ का यज्ञ सम्पन्न होने पर देवतागण अपना-अपना भाग ग्रहण करके जैसे आये थे, वैसे ही अपने-अपने लोकों को लौट गये। सभी अतिथियों को यथोचित सम्मान देकर विदा करने के पश्चात् राजा दशरथ, अपने मनोरथ की सिद्धि से प्रसन्न होकर, पुत्रोत्पत्ति की प्रतीक्षा में वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे।
श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म-
यज्ञ की समाप्ति के बाद जब छह ऋतुएँ व्यतीत हो गयीं, तब बारहवें मास में चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को, पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में, महारानी कौसल्या ने दिव्य लक्षणों से युक्त, समस्त लोकों द्वारा वन्दित जगदीश्वर श्रीराम को जन्म दिया। उस समय सूर्य, मंगल, शनि, गुरु और शुक्र- ये पाँचों ग्रह अपने-अपने उच्च स्थानों में स्थित थे और लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति विराजमान थे।
इसके पश्चात् कैकेयी के गर्भ से सत्यपराक्रमी भरत का जन्म हुआ, जो भगवान् विष्णु के चतुर्थांश से भी न्यून अंश से प्रकट हुए थे और समस्त सद्गुणों से सम्पन्न थे। तत्पश्चात् रानी सुमित्रा ने दो पुत्रों- लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया।
ये दोनों वीर भगवान् विष्णु के अर्धांश से युक्त और समस्त अस्त्रविद्याओं में निपुण थे। भरत का जन्म पुष्य नक्षत्र और मीन लग्न में हुआ, जबकि सुमित्रा के दोनों पुत्र आश्लेषा नक्षत्र और कर्क लग्न में उत्पन्न हुए। उस समय सूर्य भी अपने उच्च स्थान पर स्थित थे।
चारों राजकुमारों के जन्म पर अयोध्या में कैसे मना उत्सव?
अयोध्या में इस शुभ अवसर पर महान् उत्सव मनाया गया। नगर की गलियाँ और मार्ग जनसमूह से परिपूर्ण हो उठे। नट और नर्तक अपनी-अपनी कलाओं का प्रदर्शन करने लगे। राजा दशरथ ने सूत, मागध और वन्दीजनों को उदारतापूर्वक पुरस्कार प्रदान किये तथा ब्राह्मणों को धन और सहस्रों गौएँ दान में दीं।
ग्यारह दिन व्यतीत होने पर महाराज ने बालकों का नामकरण संस्कार सम्पन्न कराया। उस समय महर्षि वसिष्ठ ने प्रसन्नतापूर्वक चारों बालकों के नाम निर्धारित किये। ज्येष्ठ पुत्र का नाम ‘राम’ रखा, जो स्वयं परमात्मा स्वरूप थे; कैकेयी के पुत्र का नाम ‘भरत’ रखा; और सुमित्रा के दोनों पुत्रों के नाम ‘लक्ष्मण’ और ‘शत्रुघ्न’ रखे गये।
महर्षि वसिष्ठ ने समय-समय पर राजा से इन बालकों के जातकर्म आदि समस्त संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न कराये। उन चारों में श्रीरामचन्द्रजी ज्येष्ठ होने के साथ-साथ अपने कुल की कीर्ति को बढ़ाने वाले ध्वज के समान थे और वे अपने पिता की प्रसन्नता के कारण बने रहते थे। लक्ष्मण बाल्यकाल से ही श्रीराम के प्रति अत्यन्त अनुरक्त थे। वे अपने प्रिय भ्राता श्रीराम की सेवा में सदा तत्पर रहते और उनका मनोभाव जानकर उनके साथ ही रहते थे।
जब श्रीराम घोड़े पर आरूढ़ होकर शिकार के लिये जाते, तब लक्ष्मण धनुष धारण कर उनकी रक्षा करते हुए पीछे-पीछे चलते थे। इसी प्रकार शत्रुघ्न अपने ज्येष्ठ भ्राता भरत के प्रति अत्यन्त अनुराग रखते थे और उन्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय मानते थे; भरत भी शत्रुघ्न को उसी प्रकार स्नेह करते थे।
इन चारों भाग्यशाली और प्रिय पुत्रों से राजा दशरथ को अत्यन्त हर्ष प्राप्त होता था, जैसे ब्रह्माजी को चार दिक्पालों से प्रसन्नता होती है। जब ये सभी बालक बड़े हुए, तब वे समस्त सद्गुणों से सम्पन्न हो गये। वे लज्जाशील, यशस्वी, सर्वज्ञ और दूरदर्शी थे।
महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ के दरबार में क्यों आए?
ऐसे तेजस्वी और प्रभावशाली पुत्रों की प्राप्ति से राजा दशरथ ब्रह्मा के समान अत्यन्त प्रसन्न रहते थे। एक दिन धर्मात्मा राजा दशरथ अपने पुरोहित और बन्धु-बान्धवों के साथ बैठकर अपने पुत्रों के विवाह के विषय में विचार कर रहे थे। उसी समय सभा में महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र पधारे। द्वारपालों ने आकर सूचना दी, ‘कुशिकवंशी गाधिपुत्र विश्वामित्र पधारे हैं।’ यह सुनते ही राजा दशरथ सावधान होकर उठ खड़े हुए।
उन्होंने अपने पुरोहित के साथ अत्यन्त हर्षपूर्वक उनकी अगवानी की, जैसे देवराज इन्द्र ब्रह्माजी का स्वागत करते हैं। विश्वामित्रजी कठोर व्रत का पालन करने वाले महान् तपस्वी थे। उनका तेज प्रज्वलित अग्नि के समान दीप्तिमान था। उनका दर्शन करते ही राजा का मुख प्रसन्नता से खिल उठा और उन्होंने विधिपूर्वक अर्घ्य अर्पित किया।
राजा दशरथ ने विश्वामित्र का किस प्रकार स्वागत किया?
राजा का अर्घ्य शास्त्रीय विधि के अनुसार स्वीकार करके महर्षि ने उनका कुशल-क्षेम पूछा। तत्पश्चात् उन्होंने वसिष्ठजी तथा अन्य उपस्थित ऋषियों से भी मिलकर उनका यथोचित अभिवादन किया और कुशल समाचार जाना।
इसके बाद प्रसन्नचित्त और उदार हृदय वाले राजा दशरथ ने पुलकित होकर महर्षि विश्वामित्र की स्तुति करते हुए कहा, ‘जैसे किसी मरणधर्मा मनुष्य को अमृत की प्राप्ति हो जाये, निर्जल प्रदेश में वर्षा हो जाये, संतानहीन को पुत्र प्राप्त हो जाये, खोयी हुई निधि पुनः मिल जाये या किसी महान् उत्सव से हर्ष उत्पन्न हो- वैसा ही आपका यहाँ आगमन हुआ है। मैं इसे अत्यन्त शुभ मानता हूँ। आपका हार्दिक स्वागत है। आपके मन में जो भी अभिलाषा हो, मैं उसे प्रसन्नतापूर्वक पूर्ण करूँगा।’
राजा ने आगे कहा, ‘पूर्वकाल में आप राजर्षि के रूप में विख्यात थे, और अपनी महान् तपस्या के प्रभाव से आपने ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त किया है। इस प्रकार आप दोनों ही रूपों में मेरे लिये पूजनीय हैं। आपका यह आगमन मेरे लिये अत्यन्त पवित्र और अद्भुत है।’ राजा के ये विनम्र, हृदय और कानों को सुख देने वाले वचन सुनकर महान् गुण और यश से सम्पन्न, शम-दमादि सद्गुणों से युक्त महर्षि विश्वामित्र अत्यन्त प्रसन्न हुए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
श्रीराम का जन्म किस तिथि को हुआ था?
श्रीराम का जन्म चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में हुआ था।
राजा दशरथ के चारों पुत्रों के नाम क्या थे?
राजा दशरथ के चार पुत्रों के नाम श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न थे।
श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का नामकरण किसने किया था?
महर्षि वसिष्ठ ने चारों राजकुमारों का नामकरण संस्कार किया था।
लक्ष्मण और शत्रुघ्न किसके प्रति विशेष रूप से अनुरक्त थे?
लक्ष्मण श्रीराम के प्रति अत्यंत अनुरक्त थे, जबकि शत्रुघ्न भरत को अत्यंत प्रिय मानते थे।
महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ के दरबार में कब पहुंचे?
चारों राजकुमारों के बड़े होने के बाद एक दिन जब राजा दशरथ अपने पुत्रों के विवाह के विषय में विचार कर रहे थे, उसी समय महर्षि विश्वामित्र उनके दरबार में पहुंचे।









