महर्षि विश्वामित्र के वचन सुनकर नृपश्रेष्ठ महाराज दशरथ कुछ समय के लिए संज्ञाशून्य-से हो गए। उनका हृदय पुत्र-वियोग की आशंका से व्याकुल हो उठा। थोड़ी देर बाद जब उन्हें होश आया, तब वे अत्यंत दुखी और चिंतित स्वर में बोले, “हे मुनिश्रेष्ठ! मेरा कमलनयन राम अभी सोलह वर्ष का भी नहीं हुआ है।
मैं उसमें राक्षसों के साथ युद्ध करने की योग्यता नहीं देखता। यह मेरी विशाल अक्षौहिणी सेना है। मैं स्वयं इसका स्वामी और पालनकर्ता हूँ। मैं इसी सेना के साथ चलकर उन निशाचरों से युद्ध करूँगा।
मैं स्वयं धनुष धारण कर युद्धभूमि में उपस्थित रहूँगा और आपके यज्ञ की रक्षा करूँगा। जब तक इस शरीर में प्राण हैं, तब तक मैं राक्षसों से लड़ता रहूँगा। मेरा राम अभी बालक है। उसने न तो युद्ध की पूरी विद्या सीखी है, न ही वह शत्रु के बल और दुर्बलता को जानता है।
वह न अस्त्र-शस्त्रों में निपुण है और न ही युद्धकला में पारंगत। राक्षस तो छल-कपट और माया से युद्ध करते हैं। इसके अतिरिक्त, राम से वियोग हो जाने पर मैं दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता। अतः आप मेरे राम को अपने साथ न ले जाइए।”
दशरथ ने अपनी वृद्धावस्था और पुत्र-वियोग की बात क्यों कही?
राजा दशरथ आगे बोले, “मेरी आयु अब साठ हजार वर्ष हो चुकी है। इस वृद्धावस्था में मुझे बड़ी कठिनाई से पुत्र प्राप्त हुआ है। इसलिए मैं अपने राम को आपसे दूर नहीं कर सकता।” राजा दशरथ के ये वचन सुनकर महर्षि विश्वामित्र ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया, “हे महाराज! रावण नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली राक्षस है, जो महर्षि पुलस्त्य के वंश में उत्पन्न हुआ है।
उसे ब्रह्माजी से मनचाहा वरदान प्राप्त है। उसी के बल पर वह अत्यंत पराक्रमी होकर अनेक राक्षसों के साथ तीनों लोकों में उत्पात मचा रहा है। वह विश्रवा मुनि का पुत्र और कुबेर का भाई है। उसी रावण की प्रेरणा से मारीच और सुबाहु जैसे राक्षस यज्ञों में विघ्न डालते हैं।”
दशरथ रावण और मारीच-सुबाहु से क्यों डर गए?
यह सुनकर राजा दशरथ और भी चिंतित हो उठे। वे बोले, “हे मुनिवर! युद्ध में रावण का वेग तो देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, गरुड़ और नाग तक नहीं सह सकते। फिर मनुष्यों की क्या बात है! वह युद्धभूमि में बलवानों का भी बल हर लेता है। मैं अपनी सेना और पुत्रों सहित भी उसका सामना करने में समर्थ नहीं हूँ।
मारीच और सुबाहु भी साधारण राक्षस नहीं हैं। वे दैत्य सुन्द और उपसुन्द के पुत्र हैं और युद्ध में यमराज के समान भयानक हैं। यदि वही आपके यज्ञ में विघ्न डालते हैं, तो मैं अपने पुत्र को उनके सामने नहीं भेज सकता। वे अत्यंत पराक्रमी और युद्धकला में निपुण हैं।”
दशरथ के इनकार से विश्वामित्र क्यों क्रोधित हुए?
राजा दशरथ के इन वचनों को सुनकर कुशिकनन्दन महर्षि विश्वामित्र के हृदय में क्रोध की ज्वाला प्रज्वलित हो उठी। उनका तेज ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो यज्ञ की अग्नि में घी की धारा अर्पित कर दी गई हो और वह और अधिक प्रचंड होकर धधक उठी हो। महातेजस्वी विश्वामित्र का यह क्रोध केवल अपमान का नहीं, बल्कि धर्म के मार्ग में आई बाधा का था- जहाँ एक ओर कर्तव्य था, वहीं दूसरी ओर एक पिता का मोह उसे रोक रहा था।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
राजा दशरथ ने श्रीराम को विश्वामित्र के साथ भेजने से क्यों मना किया?
दशरथ को श्रीराम की कम आयु और राक्षसों की शक्ति की चिंता थी। उन्हें राम से वियोग का भी बहुत भय था।
विश्वामित्र श्रीराम को अपने साथ क्यों ले जाना चाहते थे?
विश्वामित्र अपने यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम को साथ ले जाना चाहते थे, क्योंकि मारीच और सुबाहु जैसे राक्षस यज्ञ में विघ्न डाल रहे थे।
रावण का परिचय विश्वामित्र ने दशरथ को कैसे दिया?
विश्वामित्र ने रावण को पुलस्त्य वंश में उत्पन्न अत्यंत शक्तिशाली राक्षस बताया, जिसे ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त था।
मारीच और सुबाहु कौन थे?
मारीच और सुबाहु शक्तिशाली राक्षस थे, जो रावण की प्रेरणा से यज्ञों में विघ्न डालते थे।
दशरथ के इनकार पर विश्वामित्र की क्या प्रतिक्रिया हुई?
दशरथ के इनकार से महर्षि विश्वामित्र अत्यंत क्रोधित हो गए और उनका तेज प्रचंड हो उठा।









