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वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग 4 : महर्षि वाल्मीकि का रामायण का निर्माण करना , लव-कुश का अयोध्या में रामायण गान सुनाना

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड सर्ग 4 में महर्षि वाल्मीकि ने लव-कुश को रामायण का अध्ययन कराया। दोनों ने अयोध्या में श्रीराम और उनकी सभा के सामने मधुर स्वर में रामायण का गान सुनाया।

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वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग 4

जब महर्षि वाल्मीकि ने अपने तप, ज्ञान और दिव्य दृष्टि से रामायण महाकाव्य की रचना पूर्ण कर ली, तब उनके मन में एक महत्वपूर्ण विचार उत्पन्न हुआ। उन्होंने सोचा, 'यह महान काव्य केवल लिखने के लिये नहीं है, बल्कि इसे जन-जन तक पहुँचाना भी आवश्यक है। परन्तु कौन ऐसा योग्य और सामर्थ्यवान व्यक्ति होगा, जो इसे सही ढंग से लोगों के बीच सुना सके?' उसी समय उनकी दृष्टि अपने आश्रम में रहने वाले दो बालकों कुश और लव पर पड़ी। ये दोनों राजकुमार अत्यन्त तेजस्वी, धर्मज्ञ और विनम्र स्वभाव के थे।

उनका स्वर अत्यन्त मधुर था और वे शास्त्रों के अध्ययन में भी कुशल थे। महर्षि वाल्मीकि ने समझ लिया कि यही दोनों इस महान कार्य के लिये सर्वथा उपयुक्त हैं। तब उन्होंने दोनों भाइयों को सम्पूर्ण रामायण का अध्ययन कराया। यह वही महाकाव्य था, जिसे 'रामायण' के साथ-साथ 'पौलस्त्यवध' या 'दशाननवध' भी कहा जाता है। कुश और लव ने अत्यन्त श्रद्धा और लगन के साथ इस काव्य को कंठस्थ कर लिया। वे इसके प्रत्येक श्लोक का अर्थ, भाव और लय भली-भाँति समझते थे।

जब भी आश्रम में ऋषि-मुनियों, ब्राह्मणों और साधुओं का समागम होता, तब ये दोनों बालक उनके बीच बैठकर एकाग्रचित्त होकर रामायण का मधुर गान करते। उनकी वाणी में ऐसा आकर्षण था कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते। धीरे-धीरे उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। एक दिन वे दोनों अयोध्या नगरी की गलियों और मार्गों पर घूमते हुए रामायण का गान कर रहे थे। उनके मधुर स्वर और भावपूर्ण प्रस्तुति ने नगरवासियों को अत्यन्त प्रभावित किया। इसी समय भगवान श्रीराम की दृष्टि उन दोनों बालकों पर पड़ी।

उन्होंने उनके तेज, स्वर और प्रस्तुति को देखकर उन्हें अपने महल में बुलवाया। श्रीराम ने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया और अपने भाइयों भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न से कहा- 'ये दोनों बालक अत्यन्त तेजस्वी हैं और अद्भुत ढंग से एक सुंदर काव्य का गान करते हैं। तुम सब भी इसे ध्यानपूर्वक सुनो।' राजाज्ञा पाकर कुश और लव ने वीणा के मधुर स्वर के साथ रामायण का गान प्रारम्भ किया। उनके स्वर में लय, भाव और स्पष्टता का अद्भुत समन्वय था।

प्रत्येक शब्द इतना स्पष्ट था कि श्रोताओं को तुरंत उसका अर्थ समझ में आ जाता था। उनका गान सुनकर सभा में बैठे सभी लोग भावविभोर हो उठे। उनके शरीर में रोमांच उत्पन्न हो गया और हृदय आनंद से भर गया। स्वयं भगवान श्रीराम भी धीरे-धीरे उस गान में तन्मय हो गये। वे ध्यानपूर्वक उस कथा को सुनने लगे जो वास्तव में उनके अपने ही जीवन का वर्णन थी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1-महर्षि वाल्मीकि ने रामायण का गान करने के लिए लव-कुश को ही क्यों चुना?

लव-कुश तेजस्वी, धर्मज्ञ, विनम्र और मधुर स्वर वाले बालक थे। इसलिए महर्षि वाल्मीकि ने उन्हें रामायण के गान के लिए योग्य समझा।

2-लव-कुश ने रामायण का अध्ययन कैसे किया?

महर्षि वाल्मीकि ने दोनों भाइयों को सम्पूर्ण रामायण का अध्ययन कराया। उन्होंने श्लोकों को कंठस्थ करने के साथ उनके अर्थ, भाव और लय को भी समझा।

3-लव-कुश ने रामायण का गान सबसे पहले कहां किया?

लव-कुश आश्रम में ऋषि-मुनियों, ब्राह्मणों और साधुओं के बीच रामायण का मधुर गान करते थे। बाद में उन्होंने अयोध्या की गलियों और मार्गों में भी इसका गान किया।

4-श्रीराम ने लव-कुश को अपने महल में क्यों बुलाया?

लव-कुश का मधुर स्वर, तेज और रामायण की भावपूर्ण प्रस्तुति देखकर श्रीराम प्रभावित हुए। उन्होंने दोनों बालकों को अपने महल में बुलवाया और अपने भाइयों के साथ रामायण सुनने के लिए कहा।

5-लव-कुश का रामायण गान सुनकर श्रीराम की क्या प्रतिक्रिया हुई?

श्रीराम लव-कुश के मधुर गान में धीरे-धीरे तन्मय हो गए। वे ध्यानपूर्वक उस कथा को सुनने लगे, जिसमें उनके अपने जीवन और चरित्र का वर्णन था।

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