एक दिन महर्षि वाल्मीकि अपने शिष्य भरद्वाज के साथ आश्रम से निकलकर तमसा नदी के तट पर पहुँचे। यह नदी गंगाजी के समीप ही बहती थी। उस स्थान का जल अत्यन्त निर्मल और शांत था। उसे देखकर वाल्मीकि जी ने भरद्वाज से कहा, 'देखो, इस नदी का जल कितना स्वच्छ है, ठीक वैसे ही जैसे किसी सत्पुरुष का मन निर्मल होता है।'
इसके बाद वे अपने शिष्य से वल्कल वस्त्र लेकर नदी के किनारे विचरण करने लगे। उसी समय उनकी दृष्टि पास ही विचर रहे क्रौञ्च पक्षियों के एक जोड़े पर पड़ी। वे दोनों अत्यन्त प्रेमपूर्वक साथ-साथ विचरण कर रहे थे।
अचानक एक शिकारी वहाँ आया और उसने उस जोड़े में से नर पक्षी को बाण मारकर गिरा दिया। वह पक्षी रक्त से लथपथ होकर भूमि पर गिर पड़ा और तड़पने लगा। अपने प्रिय साथी को इस प्रकार मरते देख मादा क्रौञ्ची अत्यन्त दुःख से विलाप करने लगी।
उस करुण दृश्य को देखकर महर्षि वाल्मीकि का हृदय द्रवित हो उठा। उनके भीतर करुणा के साथ क्रोध भी उत्पन्न हुआ और उनके मुख से स्वतः एक शाप निकल पड़ा, 'हे निषाद! तूने प्रेम में मग्न इस क्रौञ्च पक्षी का वध किया है, अतः तुझे कभी भी शांति और प्रतिष्ठा प्राप्त न हो।'
यह शाप सामान्य वाणी नहीं थी। यह एक विशेष छन्द में बँधा हुआ था-एक श्लोक के रूप में। यह देखकर स्वयं वाल्मीकि भी आश्चर्यचकित हो गये। उनके शिष्य भरद्वाज ने भी इसे अद्भुत बताया। आश्रम लौटकर भी वाल्मीकि जी का मन उसी श्लोक में लगा रहा। वे बार-बार उसी का चिंतन करते रहे।
तभी अचानक चतुर्मुख ब्रह्माजी उनके आश्रम में प्रकट हुए। महर्षि वाल्मीकि ने उनका विधिपूर्वक स्वागत किया। पाद्य, अर्घ्य और आसन देकर उनका पूजन किया। फिर उन्होंने ब्रह्माजी को क्रौञ्च-वध की पूरी घटना सुनाई और यह भी बताया कि उनके मुख से निकला वचन श्लोक के रूप में था, जो उन्हें आश्चर्य में डाल रहा है।
तब ब्रह्माजी ने मुस्कराकर कहा, 'हे वाल्मीकि! यह सब मेरी ही प्रेरणा से हुआ है। तुम्हारे मुख से जो श्लोक निकला है, वह व्यर्थ नहीं है। अब तुम इसी छन्द में श्रीराम के सम्पूर्ण चरित्र का वर्णन करो।'
उन्होंने आगे कहा- 'श्रीराम इस संसार के सर्वश्रेष्ठ धर्मात्मा और आदर्श पुरुष हैं। जब तक इस पृथ्वी पर पर्वत और नदियाँ विद्यमान रहेंगे, तब तक रामायण की कथा का प्रचार होता रहेगा। तुम्हारी रचना अमर होगी।' यह कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये।
उनके जाने के बाद महर्षि वाल्मीकि के मन में दृढ़ संकल्प उत्पन्न हुआ कि वे उसी श्लोक छन्द में श्रीराम के सम्पूर्ण जीवन का वर्णन करेंगे। तदनन्तर उन्होंने भगवान श्रीराम के चरित्र को आधार बनाकर एक महान महाकाव्य की रचना की।
यही दिव्य ग्रंथ आगे चलकर 'वाल्मीकि रामायण' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस काव्य में भाषा, व्याकरण, समास, संधि और शब्द-विन्यास का अत्यन्त सुंदर और शास्त्रीय ढंग से प्रयोग किया गया है। यह केवल एक कथा नहीं, बल्कि धर्म, आदर्श और जीवन-मूल्यों का अमूल्य ग्रंथ है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-बालकाण्ड सर्ग 2 में महर्षि वाल्मीकि के साथ क्या घटना हुई?
तमसा नदी के तट पर क्रौञ्च पक्षियों के जोड़े में से नर पक्षी का एक शिकारी ने वध कर दिया। इस करुण घटना से वाल्मीकि जी संतप्त हो उठे।
2-महर्षि वाल्मीकि के मुख से श्लोक कैसे निकला?
क्रौञ्च पक्षी की हत्या देखकर उनके हृदय में करुणा और क्रोध उत्पन्न हुआ। इसी भावावेश में उनके मुख से विशेष छन्द में एक श्लोक स्वतः निकल पड़ा।
3-ब्रह्माजी ने वाल्मीकि जी को क्या आदेश दिया?
ब्रह्माजी ने उन्हें उसी छन्द में भगवान श्रीराम के सम्पूर्ण चरित्र का वर्णन करते हुए महाकाव्य की रचना करने का आदेश दिया।
4-ब्रह्माजी ने रामायण के बारे में क्या कहा?
ब्रह्माजी ने कहा कि जब तक पृथ्वी पर पर्वत और नदियाँ विद्यमान रहेंगे, तब तक रामायण की कथा का प्रचार होता रहेगा और वाल्मीकि की रचना अमर रहेगी।
5-वाल्मीकि रामायण की रचना का आधार क्या बना?
महर्षि वाल्मीकि ने भगवान श्रीराम के जीवन और चरित्र को आधार बनाकर उसी श्लोक छन्द में महान महाकाव्य की रचना की, जो आगे चलकर ‘वाल्मीकि रामायण’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।









