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वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड , सर्ग 16 : श्रीहरि का अवतार संकल्प और पुत्रेष्टि यज्ञ से मिली दिव्य खीर

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग 16 में रावण वध के लिए भगवान विष्णु के मनुष्य रूप में अवतार लेने का संकल्प, दशरथ की पुत्रेष्टि यज्ञ और दिव्य खीर मिलने का प्रसंग है।

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Valmiki Ramayan Balkand Sarg 16

देवताओं की प्रार्थना सुनकर भी सर्वव्यापी भगवान नारायण ने अत्यन्त मधुर वचन कहे। वे सब कुछ जानते हुए भी लीला करते हुए बोले, ‘रावण के वध का कौन-सा उपाय है, जिससे मैं उस दुष्ट निशाचर का अंत कर सकूँ, जो महर्षियों के लिये कण्टक बना हुआ है?’

देवताओं ने विनम्र होकर उत्तर दिया, ‘प्रभो! आप मनुष्य रूप धारण कर उसे युद्ध में मार डालिये। जब उसने ब्रह्माजी से वरदान माँगा था, तब उसने मनुष्यों को तुच्छ समझकर उनसे अवध्य होने का वर नहीं माँगा। इसी कारण उसका वध केवल मनुष्य के हाथ से ही सम्भव है।’

उन्होंने आगे कहा, ‘वह अत्यन्त अहंकारी और अत्याचारी हो गया है। तीनों लोकों को पीड़ा देता है, स्त्रियों का अपहरण करता है और धर्म का नाश कर रहा है। अब उसका अंत केवल आपके अवतार से ही सम्भव है।’ देवताओं की यह बात सुनकर भगवान विष्णु ने मन ही मन अवतार लेने का निश्चय किया।

उन्होंने सोचा कि वे अयोध्या के महाराज दशरथ को ही अपना पिता बनाएँगे। यह निश्चय करके उन्होंने ब्रह्माजी की अनुमति ली और देवताओं तथा ऋषियों के समक्ष से अन्तर्धान हो गये।

पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रकट हुआ दिव्य पुरुष और मिली खीर-

उधर पृथ्वी पर पुत्रेष्टि यज्ञ अपने चरम पर था। उसी समय यज्ञकुण्ड की प्रज्वलित अग्नि से एक अद्भुत और तेजस्वी पुरुष प्रकट हुआ। उसका स्वरूप अत्यन्त विशाल और प्रभावशाली था। उसका तेज सूर्य के समान था और वह अग्नि की लपटों की भाँति देदीप्यमान हो रहा था। उसके हाथ में जाम्बूनद सुवर्ण से बनी एक बड़ी परात थी, जो चाँदी के ढक्कन से ढँकी हुई थी।

उस परात में दिव्य खीर भरी हुई थी, जिसकी सुगंध और तेज अलौकिक थे। उस दिव्य पुरुष ने महाराज दशरथ की ओर देखकर कहा, ‘राजन्! मुझे प्रजापतिलोक का पुरुष जानो। मैं प्रजापति की आज्ञा से यहाँ आया हूँ। तुमने देवताओं की आराधना की है, इसीलिये तुम्हें यह दिव्य वस्तु प्राप्त हुई है।

यह खीर संतान प्रदान करने वाली है। तुम इसे अपनी योग्य रानियों को दो। इसके सेवन से तुम्हें वे पुत्र प्राप्त होंगे, जिनकी तुम अभिलाषा रखते हो।’ यह वचन सुनकर महाराज दशरथ अत्यन्त प्रसन्न हो उठे। उनका हृदय आनन्द से भर गया, मानो किसी निर्धन को अचानक अपार धन प्राप्त हो गया हो। उन्होंने श्रद्धा के साथ उस दिव्य खीर को स्वीकार किया। इसके बाद वह तेजस्वी पुरुष अपना कार्य पूर्ण करके उसी प्रकार अदृश्य हो गया, जैसे वह प्रकट हुआ था। अब राजा दशरथ ने अत्यन्त सोच-विचारकर उस खीर का वितरण किया।

दशरथ ने कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी को खीर कैसे बांटी?

उन्होंने आधी खीर महारानी कौसल्या को दी। शेष आधे भाग का आधा रानी सुमित्रा को अर्पित किया। फिर जो खीर बची, उसका आधा भाग उन्होंने कैकेयी को दिया और अन्त में जो थोड़ा भाग शेष रह गया, उसे भी उन्होंने पुनः सुमित्रा को ही दे दिया। इस प्रकार तीनों रानियों ने उस दिव्य खीर का सेवन किया। कुछ ही समय में तीनों महारानियाँ गर्भवती हो गयीं। उनके गर्भ सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी थे। यह केवल सामान्य गर्भ नहीं था, बल्कि एक दिव्य योजना का प्रारम्भ था।

तीनों रानियों के गर्भवती होने पर दशरथ क्यों हुए अत्यंत प्रसन्न?

जब महाराज दशरथ ने अपनी रानियों को गर्भवती देखा, तो उनका हृदय अपार प्रसन्नता से भर उठा। उन्हें लगा कि उनका जीवन सफल हो गया है और उनका मनोरथ पूर्ण हो चुका है। उनकी प्रसन्नता का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। जैसे स्वर्ग में देवता भगवान श्रीहरि की पूजा कर प्रसन्न होते हैं, वैसे ही पृथ्वी पर देवताओं, सिद्धों और महर्षियों से सम्मानित होकर राजा दशरथ अत्यन्त संतुष्ट और आनन्दित थे। यही वह पावन क्षण था, जब भगवान के अवतार की भूमिका पूर्ण रूप से तैयार हो चुकी थी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1-रावण का वध मनुष्य के हाथों ही क्यों होना था?

रावण ने ब्रह्माजी से वरदान लेते समय मनुष्यों से अवध्य होने का वर नहीं मांगा था। इसलिए उसका वध मनुष्य के हाथ से संभव था।

2-भगवान विष्णु ने किसे अपना पिता बनाने का निश्चय किया?

भगवान विष्णु ने अयोध्या के महाराज दशरथ को अपना पिता बनाने का निश्चय किया।

3-पुत्रेष्टि यज्ञ से दशरथ को क्या प्राप्त हुआ?

पुत्रेष्टि यज्ञ की अग्नि से प्रकट हुए दिव्य पुरुष ने महाराज दशरथ को संतान प्रदान करने वाली दिव्य खीर दी।

4-दशरथ ने दिव्य खीर तीनों रानियों को कैसे बांटी?

आधी खीर कौसल्या को, शेष आधे का आधा सुमित्रा को, फिर बची खीर का आधा कैकेयी को और अंत में बचा हुआ भाग सुमित्रा को दिया गया।

5-दिव्य खीर खाने के बाद क्या हुआ?

तीनों रानियां गर्भवती हुईं और इसी के साथ भगवान के अवतार की दिव्य योजना आगे बढ़ी।

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