अश्वमेध यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद राजा दशरथ की पुत्र प्राप्ति की इच्छा पूरी करने के लिए ऋष्यशृंग ने पुत्रेष्टि यज्ञ आरम्भ किया। इसी समय देवताओं ने ब्रह्माजी के सामने रावण के अत्याचारों की पीड़ा रखी और उसके वध का उपाय पूछा। ब्रह्माजी ने बताया कि मनुष्य ही रावण का वध कर सकता है, जिसके बाद भगवान विष्णु ने दशरथ के पुत्र रूप में अवतार लेने का संकल्प किया।
पुत्रेष्टि यज्ञ का ऋष्यशृंग ने किया आरम्भ-
अश्वमेध यज्ञ की पूर्णाहुति के पश्चात् भी महाराज दशरथ के हृदय में एक ही अभिलाषा शेष थी- पुत्र प्राप्ति की। इसी उद्देश्य से महात्मा ऋष्यशृंग, जो अत्यन्त मेधावी और वेदों के परम ज्ञाता थे, कुछ समय के लिये गम्भीर ध्यान में लीन हो गये। वे अपने कर्तव्य का सूक्ष्म विचार कर रहे थे। जब उनका ध्यान पूर्ण हुआ, तब उन्होंने राजा दशरथ से कहा, ‘राजन्! मैं अथर्ववेद के मंत्रों द्वारा पुत्र-प्राप्ति के लिये पुत्रेष्टि नामक यज्ञ करूँगा। यदि इसे वेदोक्त विधि से सम्पन्न किया गया, तो यह यज्ञ अवश्य सफल होगा।’
यह सुनकर राजा दशरथ के हृदय में आशा की एक नई किरण जाग उठी। ऋष्यशृंग ने तत्काल पुत्रेष्टि यज्ञ का आरम्भ किया। शास्त्रों में बतायी गयी विधि के अनुसार वे अग्नि में आहुतियाँ देने लगे। यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित थी और उसके साथ ही वातावरण में वैदिक मंत्रों की दिव्य ध्वनि गूँज रही थी। इस यज्ञ की महिमा ऐसी थी कि देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षि सभी अपने-अपने भाग को ग्रहण करने के लिये वहाँ एकत्र हो गये। मानो स्वर्ग और पृथ्वी के बीच की दूरी उस क्षण मिट गयी हो। उसी समय देवताओं के मन में एक पीड़ा जाग उठी।
ब्रह्माजी ने रावण वध का उपाय कैसे बताया?
वे सब एकत्र होकर ब्रह्माजी के पास गये और विनम्र स्वर में बोले, ‘प्रभो! रावण नाम का एक भयंकर राक्षस आपके वरदान के कारण अत्यन्त बलशाली हो गया है। वह हमें और समस्त लोकों को कष्ट दे रहा है। ऋषियों, गन्धर्वों, यक्षों और ब्राह्मणों का अपमान करता है। उसका अहंकार इतना बढ़ गया है कि वह स्वयं को अजेय समझता है। उससे हम सब भयभीत हैं। कृपया उसके वध का कोई उपाय बताइये।’ देवताओं की यह व्यथा सुनकर ब्रह्माजी कुछ क्षणों के लिये विचार में पड़ गये।
फिर उन्होंने कहा, ‘जब रावण ने मुझसे वर माँगा था, तब उसने देवताओं, दानवों, यक्षों और गन्धर्वों से अवध्य होने का वर माँगा था। मैंने उसे यह वर प्रदान कर दिया। किन्तु उसने मनुष्यों को तुच्छ समझकर उनसे अवध्य होने का वर नहीं माँगा। अतः अब उसका वध केवल मनुष्य के द्वारा ही सम्भव है।’ उसी समय एक अद्भुत दृश्य उपस्थित हुआ। आकाश में गरुड़ पर सवार, मेघों के ऊपर स्थित सूर्य के समान तेजस्वी भगवान विष्णु वहाँ प्रकट हुए। उनके शरीर पर पीताम्बर शोभायमान था और उनके हाथों में शंख, चक्र और गदा दमक रहे थे। उनका तेज ऐसा था कि समस्त दिशाएँ आलोकित हो उठीं।
भगवान विष्णु ने दशरथ के पुत्र रूप में अवतार लेने का संकल्प किया-
देवताओं ने विनम्र भाव से उनकी स्तुति करते हुए कहा, ‘भगवन्! अयोध्या के राजा दशरथ धर्मात्मा, उदार और तेजस्वी हैं। उनकी तीन रानियाँ हैं, जो ह्री, श्री और कीर्ति के समान गुणों से युक्त हैं। आप अपने चार अंशों में विभक्त होकर उनके यहाँ पुत्ररूप में अवतार ग्रहण कीजिये और रावण का संहार कीजिये।’ देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर कहा, ‘तुम सब भय को त्याग दो। मैं मनुष्य रूप में अवतार लेकर रावण और उसके समस्त बन्धु-बान्धवों का संहार करूँगा। मैं पृथ्वी पर रहकर दीर्घकाल तक धर्म की स्थापना करूँगा और तुम सबको भयमुक्त करूँगा।’
भगवान के इन वचनों को सुनकर देवताओं के हृदय में अपार प्रसन्नता छा गयी। इसके बाद भगवान विष्णु ने अपने दिव्य स्वरूप को चार भागों में विभक्त करने का निश्चय किया। उन्होंने ठान लिया कि वे महाराज दशरथ के पुत्र रूप में जन्म लेंगे और इस प्रकार रावण के अत्याचार का अंत करेंगे। देवता, ऋषि, गन्धर्व, रुद्र और अप्सराएँ सभी भगवान की स्तुति करने लगे।
वे बोले, ‘प्रभो! रावण अत्यन्त अहंकारी और क्रूर है। वह सम्पूर्ण जगत् को दुःख दे रहा है। आप उसका संहार करके संसार को शांति प्रदान करें और फिर अपने परमधाम वैकुण्ठ में पधारें।’ इस प्रकार देवताओं की प्रार्थना, ब्रह्मा की योजना और भगवान विष्णु के संकल्प से एक महान दिव्य घटना की नींव रखी गयी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग 15 में क्या हुआ?
इस सर्ग में ऋष्यशृंग द्वारा राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ का आरम्भ और रावण वध के लिए भगवान विष्णु के अवतार का संकल्प वर्णित है।
2-ऋष्यशृंग ने दशरथ के लिए कौन-सा यज्ञ शुरू किया था?
ऋष्यशृंग ने राजा दशरथ की पुत्र प्राप्ति की इच्छा पूरी करने के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ का आरम्भ किया था।
3-रावण का वध मनुष्य के हाथों ही क्यों संभव था?
पौराणिक कथाओं के अनुसार रावण ने ब्रह्माजी से देवताओं, दानवों, यक्षों और गन्धर्वों से अवध्य होने का वर माँगा था, लेकिन मनुष्यों को उसने तुच्छ समझकर इस वर में शामिल नहीं किया था।
4-भगवान विष्णु ने दशरथ के यहाँ जन्म लेने का संकल्प क्यों किया?
भगवान विष्णु ने रावण और उसके अत्याचारों का अंत करने तथा धर्म की स्थापना के लिए दशरथ के पुत्र रूप में अवतार लेने का संकल्प किया।
5-भगवान विष्णु ने दशरथ के कितने पुत्रों के रूप में अवतार लेने का निश्चय किया?
पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु ने अपने दिव्य स्वरूप को चार भागों में विभक्त करके राजा दशरथ के यहाँ चार पुत्रों के रूप में जन्म लेने का संकल्प किया।









