सरयू नदी के उत्तर तट पर महाराज दशरथ का अश्वमेध यज्ञ विधिपूर्वक सम्पन्न होने लगा। यज्ञ में महर्षियों और ब्राह्मणों ने शास्त्रानुसार सभी कर्म पूरे किए और महारानी कौसल्या ने यज्ञ के मुख्य अश्व का संस्कार किया। यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद ऋष्यशृंग ने राजा दशरथ को चार पुत्रों की प्राप्ति का आशीर्वाद दिया।
सरयू तट पर चरम पर पहुँचा महाराज दशरथ का अश्वमेध यज्ञ-
सरयू नदी के उत्तर तट पर महाराज दशरथ का अश्वमेध यज्ञ अपने चरम पर था। यज्ञमण्डप में वैदिक मंत्रों की पवित्र ध्वनि गूँज रही थी और वातावरण में एक अलौकिक शांति व्याप्त थी। ऋष्यशृंग को आगे रखकर सभी महर्षि और ब्राह्मण विधिपूर्वक यज्ञ के कर्मों में लगे हुए थे। ऐसा प्रतीत होता था मानो स्वयं देवता भी इस महान अनुष्ठान के साक्षी बनकर उपस्थित हों। देश-देश से आये स्त्री-पुरुषों का सत्कार अत्यन्त आदर और प्रेम से किया जा रहा था। किसी को भी अभाव का अनुभव नहीं था।
सभी को उत्तम अन्न, पेय और वस्त्र प्रदान किये जा रहे थे। यज्ञ में सम्मिलित ब्राह्मण अत्यन्त विद्वान थे और उनके साथ अनेक शिष्य तथा सेवक उपस्थित थे। सम्पूर्ण आयोजन वैभव, व्यवस्था और पवित्रता का अद्भुत संगम था। इसी बीच वह पवित्र क्षण आया, जब महारानी कौसल्या ने यज्ञ के मुख्य अश्व का संस्कार किया।
उन्होंने शास्त्रानुसार प्रोक्षण आदि विधियों से अश्व को शुद्ध किया और अत्यन्त श्रद्धा के साथ तीन तलवारों से उसका स्पर्श किया। यह केवल एक क्रिया नहीं थी, बल्कि धर्म और मर्यादा के पालन का प्रतीक थी। इसके बाद कौसल्या ने स्थिर चित्त से उस अश्व के समीप एक रात निवास किया, जिससे यज्ञ की मर्यादा पूर्ण हो सके।
यज्ञ की पूर्णाहुति और चारों दिशाओं का दान-
यज्ञ के सभी अंग पूर्ण होने लगे। सोलहों ऋत्विज् ब्राह्मणों ने हवनीय पदार्थों को विधिवत अग्नि में अर्पित करना आरम्भ किया। मंत्रों की गूंज और अग्नि की लपटों के साथ वातावरण दिव्यता से भर गया। प्रत्येक आहुति के साथ ऐसा अनुभव होता था कि यज्ञ अपने परम उद्देश्य की ओर बढ़ रहा है।
अन्ततः सभी विधियों के पूर्ण होने पर वह महान अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न हुआ। यज्ञ की पूर्णाहुति के पश्चात् महाराज दशरथ ने अपनी उदारता और धर्मनिष्ठा का अद्भुत परिचय दिया। उन्होंने होता को पूर्व दिशा का राज्य, अध्वर्यु को पश्चिम दिशा, ब्रह्मा को दक्षिण दिशा और उद्गाता को उत्तर दिशा का सम्पूर्ण क्षेत्र दान में दे दिया। यह वही परम्परा थी, जिसका पालन प्राचीन काल से होता आया था।
ब्राह्मणों को दान देकर दशरथ ने दिखाई उदारता-
किन्तु ब्राह्मणों ने अत्यन्त विनम्रता से कहा कि वे पृथ्वी का पालन करने में समर्थ नहीं हैं, अतः उन्हें भूमि की आवश्यकता नहीं है। तब राजा ने उन्हें दस लाख गौएँ, दस करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ और उससे भी अधिक रजत मुद्राएँ प्रदान कीं। इसके बाद भी उन्होंने अन्य ब्राह्मणों को एक करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ बाँटीं।
जब समस्त धन दान कर दिया गया और कुछ भी शेष नहीं रहा, तभी एक दरिद्र ब्राह्मण वहाँ आ पहुँचा। उसने भी दान की याचना की। उस समय भी महाराज दशरथ ने उसे निराश नहीं किया। उन्होंने अपने हाथ का आभूषण उतारकर उसे दे दिया। यह दृश्य उनके त्याग और उदारता का सर्वोच्च प्रमाण था।
ऋष्यशृंग ने दिया चार पुत्रों की प्राप्ति का आशीर्वाद-
इस प्रकार यज्ञ की पूर्णाहुति के साथ महाराज दशरथ का हृदय अत्यन्त प्रसन्न हो उठा। यह यज्ञ उनके सभी पापों का नाश करने वाला और उन्हें उच्च लोकों का अधिकारी बनाने वाला सिद्ध हुआ। तभी द्विजश्रेष्ठ ऋष्यशृंग ने मधुर वाणी में उन्हें आशीर्वाद दिया, ‘राजन्! आपको चार पुत्र प्राप्त होंगे, जो आपके वंश की मर्यादा को आगे बढ़ाने वाले होंगे।’
यह वचन सुनते ही महाराज दशरथ का हृदय आनन्द से भर गया। उन्होंने श्रद्धापूर्वक ऋष्यशृंग को प्रणाम किया। उनके मन में अब कोई चिंता शेष नहीं रही थी। केवल एक मधुर प्रतीक्षा थी, उस दिव्य क्षण की, जब उनके घर जन्म लेंगे वे पुत्र, जो आगे चलकर सम्पूर्ण जगत् का कल्याण करेंगे।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग 14 में किस यज्ञ का वर्णन है?
इस सर्ग में महाराज दशरथ द्वारा किए गए अश्वमेध यज्ञ की विधियों, पूर्णाहुति और उसके बाद दिए गए दान का वर्णन है।
2-महारानी कौसल्या ने यज्ञ के अश्व के साथ क्या किया?
उन्होंने शास्त्रानुसार यज्ञ के मुख्य अश्व का संस्कार किया और उसके समीप एक रात निवास किया।
3-महाराज दशरथ ने यज्ञ के बाद क्या दान दिया?
उन्होंने ऋत्विजों और ब्राह्मणों को राज्य के विभिन्न क्षेत्रों, गौओं, स्वर्ण मुद्राओं, रजत मुद्राओं और अन्य धन-संपत्ति का दान दिया।
4-ऋष्यशृंग ने राजा दशरथ को क्या आशीर्वाद दिया?
ऋष्यशृंग ने राजा दशरथ को चार पुत्रों की प्राप्ति का आशीर्वाद दिया, जो उनके वंश की मर्यादा को आगे बढ़ाने वाले थे।
5-अश्वमेध यज्ञ के बाद राजा दशरथ के मन में क्या भाव था?
यज्ञ की पूर्णाहुति और ऋष्यशृंग के आशीर्वाद के बाद राजा दशरथ अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें अपने पुत्रों के जन्म की प्रतीक्षा रहने लगी।









