एक समय महर्षि वाल्मीकि तपस्या और स्वाध्याय में लीन थे। उनके मन में एक गहन जिज्ञासा उत्पन्न हुई। वे जानना चाहते थे कि इस संसार में ऐसा कौन-सा पुरुष है, जो सभी उत्तम गुणों से युक्त हो- गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, सत्यवादी, कृतज्ञ और दृढ़प्रतिज्ञ।
इसी उद्देश्य से उन्होंने देवर्षि नारद से प्रश्न किया, 'भगवन्! इस संसार में ऐसा कौन पुरुष है, जो समस्त प्राणियों का हित करने वाला, विद्वान, सामर्थ्यवान और अत्यन्त सुन्दर हो? जो सत्य बोलने वाला, उपकार मानने वाला और अपने वचन पर अडिग रहने वाला हो? मैं ऐसे पुरुष के विषय में जानना चाहता हूँ।'
महर्षि वाल्मीकि का यह प्रश्न सुनकर तीनों लोकों के ज्ञाता नारदजी प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, 'मुनिवर! आपने जिन दुर्लभ गुणों का वर्णन किया है, वे सब एक ही पुरुष में मिलते हैं। मैं विचारपूर्वक उस पुरुष का वर्णन करता हूँ- सुनिये।'
नारदजी बोले, 'इक्ष्वाकु वंश में एक महान पुरुष उत्पन्न हुए हैं, जो ‘राम’ नाम से विख्यात हैं। वे मन को वश में रखने वाले, महाबलवान, तेजस्वी, धैर्यवान और जितेन्द्रिय हैं। वे अत्यन्त बुद्धिमान, नीति के ज्ञाता, प्रभावशाली वक्ता और शत्रुओं का संहार करने वाले हैं।'
उन्होंने आगे श्रीराम के दिव्य स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा, 'उनके कंधे विशाल और भुजाएँ अत्यन्त लम्बी हैं, जो घुटनों तक पहुँचती हैं। उनकी गर्दन शंख के समान सुडौल है, ठोड़ी पुष्ट है और मस्तक अत्यन्त सुंदर है। उनका ललाट भव्य है और उनकी चाल अत्यन्त मनोहर है। उनकी छाती चौड़ी और दृढ़ है। शरीर न अधिक लम्बा है, न छोटा- बल्कि अत्यन्त संतुलित और आकर्षक है। उनका रंग कोमल और कान्तिमान है। वे बड़े प्रतापी हैं और उनकी आँखें बड़ी-बड़ी एवं तेजस्वी हैं।'
नारदजी ने केवल बाह्य रूप ही नहीं, बल्कि श्रीराम के आन्तरिक गुणों का भी अत्यन्त सुन्दर वर्णन किया। वह बोले, 'वे समस्त शास्त्रों के ज्ञाता हैं, उनकी स्मरणशक्ति अद्भुत है और वे अत्यन्त प्रतिभाशाली हैं। वे उदार हृदय वाले, मधुर भाषी और सबके प्रिय हैं।
जैसे नदियाँ समुद्र में जाकर मिलती हैं, उसी प्रकार सज्जन पुरुष सदा राम के पास आते रहते हैं। वे सभी के प्रति समान भाव रखते हैं और उनका दर्शन सदैव आनंद देने वाला होता है। बल में वे भगवान विष्णु के समान हैं, सौम्यता में चन्द्रमा के समान, क्रोध में कालाग्नि के समान और क्षमा में पृथ्वी के समान हैं। त्याग में वे कुबेर के समान और सत्यपालन में धर्मराज के समान हैं।'
इस प्रकार नारदजी ने श्रीराम के दिव्य गुणों का अत्यन्त प्रभावशाली वर्णन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि श्रीराम केवल एक महान राजा ही नहीं, बल्कि आदर्श पुरुष के रूप में सम्पूर्ण मानवता के लिये उदाहरण हैं। अन्त में नारदजी ने संक्षेप में सम्पूर्ण रामायण का भी वर्णन किया, जिससे महर्षि वाल्मीकि के हृदय में श्रीराम के जीवन को विस्तार से लिखने की प्रेरणा जागृत हुई।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड के प्रथम सर्ग में क्या वर्णन है?
बालकाण्ड के प्रथम सर्ग में महर्षि वाल्मीकि द्वारा नारदजी से आदर्श पुरुष के विषय में पूछने और नारदजी द्वारा श्रीराम के गुणों का वर्णन करने का प्रसंग है।
2-महर्षि वाल्मीकि ने नारदजी से क्या पूछा था?
वाल्मीकि मुनि ने ऐसे पुरुष के बारे में पूछा था जो गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, सत्यवादी, कृतज्ञ, दृढ़प्रतिज्ञ और सभी प्राणियों का हित करने वाला हो।
3-नारदजी ने आदर्श पुरुष के रूप में किसका वर्णन किया?
नारदजी ने इक्ष्वाकु वंश में जन्मे श्रीराम को उन सभी उत्तम गुणों से युक्त आदर्श पुरुष के रूप में बताया।
4-नारदजी ने श्रीराम के किन गुणों का वर्णन किया?
उन्होंने श्रीराम की वीरता, धैर्य, बुद्धिमत्ता, नीति-ज्ञान, सत्यपालन, क्षमा, त्याग, मधुर वाणी और सभी के प्रति समान भाव सहित अनेक गुणों का वर्णन किया।
5-नारदजी के वर्णन से वाल्मीकि मुनि को क्या प्रेरणा मिली?
नारदजी द्वारा श्रीराम के चरित्र और सम्पूर्ण रामायण का संक्षिप्त वर्णन सुनकर महर्षि वाल्मीकि के हृदय में श्रीराम के जीवन को विस्तार से लिखने की प्रेरणा जागृत हुई।









