एक बार की बात है द्वापर युग में सुमति नाम से प्रसिद्ध राजा हुए थे। उनका जन्म चंद्र वंश में हुआ था। वो लक्ष्मी से संपन्न और सात द्वीपों के एकमात्र सम्राट थे। उनका मन हमेशा धर्म में लगा रहता था, सत्यवादी थे और सब प्रकार की संपत्तियों से सुशोभित थे। उनकी जो पत्नी थी उसका नाम सत्यवती था।
वह पतिव्रता थी पति में ही उसके प्राण बसते थे। वह परम सौभाग्यशाली सभी शुभ लक्षणों से सुशोभित थी। एक बार विभाण्डक मुनि उस विख्यात राजा रानी को देखने के लिए अपने बहुत से शिक्षकों के साथ वहां आए। विभाण्डक मुनि को देखकर के राजा बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उन्हें आसन पर बिठाया। उनका सत्कार किया और महर्षि का आदर पूर्वक सम्मान किया।
इसके बाद विभाण्डक ऋषि ने उस राजा से पूछा कि आप मुझे यह बताइए कि भगवान विष्णु को संतुष्ट करने के बहुत से पुराण थे जिनका भी तुम पाठ कर सकते थे लेकिन इस माघ मास में सब प्रकार से प्रयत्नशील होकर तुम पति-पत्नी जो रामायण के परायण में लगे हुए हो ! तुम्हारी साध्वी पत्नी भी सदा श्री रामचंद्र भगवान की आराधना में लगी रहती है इसका कारण क्या है ?इसके जवाब में सुमति, विभाण्डक ऋषि को अपने पिछले जन्म की कथा सुनाते हैं जिसमें वह क्षुद्र हुआ करते थे।
राजा ने कहा कि मैं पिछले जन्म में ही मालति नाम का शूद्र था और कुमार्ग पर चलता था। गाय की हत्या करता, ब्राह्मण की हत्या करता और उन लोगों के घरों में चोरी करता। किसी प्रकार से मैं अपना जीवन यापन व्यतीत कर रहा था। मैं कुछ काल तक घर में रहा फिर बड़े लोगों की आज्ञा का उल्लंघन करने के कारण मेरे सभी भाई बंधुओं ने मुझे छोड़ दिया और मैं जंगल में आ गया।
वहां में मृगों का मांस खाकर रहता और कांटे बिछा कर लोगों के आने जाने का मार्ग अवरुद्ध करता एवं उनको लूट लेता। इस प्रकार भूखा प्यासा, एक दिन निद्रा से झूमता हुआ महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में आ गया। उस आश्रम के निकट एक सरोवर था जिसमें नाना प्रकार के पक्षी विचरण कर रहे थे।
वहां जाकर मैंने पानी पिया और मेरी थकावट दूर हो गई और मैंने अपनी भूख शांत की। फिर लकड़ियों द्वारा एक सुंदर घर बनाया। मैं उसी में शिकारी की प्रवृत्ति का आश्रय लेकर नाना प्रकार की जानवरों को मारता और उनका मांस खाता और 20 वर्षों तक मैं ऐसे ही जीवित रहा। उसके बाद यह जो मेरी पत्नी सत्यवती है वह मेरे पास आई। पूर्व जन्म में इसका नाम काली था और वह निषाद कुल की कन्या थी।
मैं जब उससे मिला तो हमने पति पत्नी के रूप में एक दूसरे को स्वीकार किया और जानवरों को मार कर अपना जीवन निर्वाह करने लगे। एक दिन हम दोनों श्री रामचंद्र की कृपा से वशिष्ठ के आश्रम में गए। वहां देव ऋषियों का समाज जुटा हुआ था वहां माघ मास में प्रतिदिन ब्राह्मण लोग रामायण का पाठ करते हुए दिखाई देते थे।
फिर भगवान श्री राम की कृपा से बिना हमारी इच्छा के ही हमारे कानों में लगातार 9 दिन तक भक्ति पूर्वक रामायण की कथाएं जाती रही। हमारा अंतःकरण शुद्ध हुआ। हमारी आत्मा पवित्र हुई। उस राम कथा को सुन कर के हम दोनों को बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई। हे मुनि ! उसी समय हम दोनों की मृत्यु हो गई लेकिन हमारे उस कर्म से भगवान मधुसूदन का मन प्रसन्न हो गया था इसलिए उन्होंने हमें लेने के लिए अपने दूत भेजे।
हम दोनों को विमान में बिठाकर भगवान के बैकुंठ धाम में ले गए। श्री हरि विष्णु के धाम में निवास करके हम लोग ब्रह्म लोक में आ गए। उसके बाद हम लोग इंद्रलोक में आ गए और उत्तम भोग भोगने के पश्चात हम इस पृथ्वी पर आज राजा सुमति और सत्यवती हुए। हे मुनि! रामायण का श्रवण करने पर ही हमें ऐसा फल प्राप्त हुआ है। यह कथा ऐसी है जो जन्म, ज़रा और मृत्यु का नाश करने वाली है। विवश होकर भी जो पाप कर्म किया जाता है वह रामायण के श्रवण से माफ़ हो जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-राजा सुमति कौन थे?
राजा सुमति चंद्रवंश में जन्मे धर्मपरायण और सत्यवादी सम्राट थे। उनकी पत्नी का नाम सत्यवती था, जो पतिव्रता और भगवान श्रीराम की भक्त थीं।
2-पिछले जन्म में राजा सुमति कौन थे?
कथा के अनुसार, पिछले जन्म में राजा सुमति का नाम मालति था और वे शूद्र कुल में जन्मे थे। उनका जीवन हिंसा, चोरी और अन्य पाप कर्मों में बीतता था।
3-सुमति और सत्यवती ने रामायण का श्रवण कैसे किया?
पूर्व जन्म में मालति और काली वशिष्ठ आश्रम पहुंचे थे, जहां माघ मास में ब्राह्मणों द्वारा रामायण का पाठ किया जा रहा था। उन्होंने लगातार नौ दिनों तक रामायण की कथा सुनी।
4-रामायण का श्रवण करने से सुमति और सत्यवती को क्या फल मिला?
कथा के अनुसार, रामायण सुनने से उनका अंतःकरण शुद्ध हुआ। मृत्यु के बाद भगवान के दूत उन्हें विमान से बैकुंठ ले गए और बाद में वे पृथ्वी पर राजा सुमति और सत्यवती के रूप में जन्मे।
5-इस कथा से रामायण श्रवण की क्या महिमा बताई गई है?
इस कथा में रामायण के श्रवण को पवित्र और कल्याणकारी बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धा से रामकथा सुनने से मनुष्य के पाप कर्मों का प्रायश्चित होता है और आध्यात्मिक कल्याण का मार्ग खुलता है।









