मुनीश्वर सन्तकुमार ने देवऋषि नारद से रामायण के श्रवण की विधि, उसकी महिमा और उसको सुनने से क्या फल प्राप्त होते हैं यह पूछा। इस प्रश्न के जवाब में नारद जी बोले, रामायण कथा का अनुष्ठान करने वाले वक्ता और श्रोता को भक्ति भाव से भावित होकर इस विधान का पालन करना चाहिए। उस विधि का पालन करने से करोड़ों पाप नष्ट हो जाते हैं। चैत्र, माघ तथा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को कथा का आरंभ करना चाहिए। पहले स्वस्तिवाचन करके संकल्प लें कि हम 9 दिनों तक रामायण की इस कथा को सुनेंगे।
अपनी इंद्रियों को संयम में रखकर भाई बंधुओं के साथ यह कथा सुननी चाहिए। प्रतिदिन देवताओं का पूजन करके संकल्प पूर्वक भक्ति भाव से रामायण ग्रंथ की पूजा करनी चाहिए। व्रती पुरुष आवाहन,आसन, गंध, पुष्प आदि के द्वारा "ओम नमो नारायणाय" इस मंत्र से भक्ति परायण करके पूजन करें। इस प्रकार जो मन और इंद्रियों को संयम में रखकर रामायण की विधि का अनुष्ठान करता है वो भगवान विष्णु के धाम में जाता है।
वहां से लौटकर फिर कभी इस संसार में नहीं आता। गंगा के समान तीर्थ नहीं है, माता के समान गुरु नहीं है, भगवान विष्णु के समान कोई देवता नहीं है और रामायण से बढ़कर कोई उत्तम महाकाव्य नहीं है। रामायण कथा के अंत में जो वाचक है उसे दक्षिणा सहित गाय का दान करना चाहिए, उन्हें रामायण की पुस्तक वस्त्र और आभूषण भेंट करने चाहिए। जो वाचक को रामायण की पुस्तक देता है वह श्री हरि विष्णु के धाम में चला जाता है वहां जाकर उसे कभी शोक नहीं करना पड़ता।
रामायण श्रवण की महिमा और मिलने वाले फल-
पंचमी तिथि को रामायण की अमृतमयी कथा को प्रारंभ करने से, उसे सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। यदि कोई मनुष्य 2 बार इस कथा को सुनना है तो उससे यज्ञ का फल प्राप्त होता है। अगर कोई मनुष्य इस रामायण को तीन बार सुनता है तो अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त करता है। जो 4 बार इस रामायण को सुनता है वह परम पुण्य फल का भागी होता है।
जो महान पुरुष 5 बार रामायण की कथा सुनता है उसे बहुत पुण्य प्राप्त होता है। जो 6 बार रामायण की कथा को सुनता है वह भगवान विष्णु के धाम को प्राप्त होता है। हे मुनीश्वर, जो मनुष्य 8 बार रामायण की कथा सुनता है उसे यज्ञ का 5 गुना फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य शांत चित्त और इंद्रियों को संयम में रखकर रामायण का अनुष्ठान करता है वह परमानंद धाम यानी कि बैकुंठ लोक में चला जाता है।
जो प्रतिदिन रामायण का पाठ अथवा श्रवण करता है, गंगा नहाता है, धर्म मार्ग का उपदेश देता है ऐसे लोग संसार सागर से मुक्त ही हैं इसमें कोई संशय नहीं है। रामायण की कथा का श्रवण करना चाहिए। जो महात्मा ऐसा करते हैं वे कृतज्ञ हैं। श्री राम का नाम केवल श्री राम का नाम ही जीवन है। कलयुग में किसी और उपाय से जीवो की सद्गति नहीं होती बिल्कुल नहीं होती।
रामायण की कथा कहने वाले को अपनी यथाशक्ति के अनुसार गाय, वस्त्र, सोना, रामायण की पुस्तक आदि वस्तुएं देनी चाहिए। श्रीराम के चरित्र का श्रवण करने पर मनुष्य के संपूर्ण श्रेय की वृद्धि होती है। उसे न तो अग्नि की बाधा प्राप्त होती है, ना ही चोर का भय होता है।
वह इस जन्म में उपार्जित किए हुए समस्त पापों से तत्काल मुक्त हो जाता है। वह इस शरीर का अंत होने पर अपने साथ पीढ़ियों के साथ मोक्ष का भागी होता है। जो प्रतिदिन श्री राम का कीर्तन सुनते हैं उनके लिए तीर्थ सेवन, गाय का दान, तपस्या, यज्ञ की क्या आवश्यकता है? चैत्र, माघ और कार्तिक मास में रामायण की अमृत कथा का नवाह परायण सुनना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-रामायण का श्रवण कब आरंभ करना चाहिए?
रामायण कथा का अनुष्ठान चैत्र, माघ और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि से आरंभ करने की बात कही गई है।
2-रामायण श्रवण के दौरान किन नियमों का पालन करना चाहिए?
कथा सुनने वाले को मन और इंद्रियों को संयम में रखते हुए भक्ति भाव से कथा सुननी चाहिए। प्रतिदिन देवताओं का पूजन और रामायण ग्रंथ की पूजा करने का विधान बताया गया है।
3-रामायण का नवाह पारायण कितने दिनों का होता है?
रामायण कथा का नवाह पारायण नौ दिनों तक करने का विधान बताया गया है। कथा आरंभ करते समय नौ दिनों तक श्रवण करने का संकल्प लिया जाता है।
4-रामायण सुनने से क्या फल प्राप्त होता है?
प्रस्तुत कथा के अनुसार रामायण का श्रद्धापूर्वक श्रवण करने से पापों से मुक्ति, पुण्य की प्राप्ति और भगवान विष्णु के धाम की प्राप्ति जैसे फल बताए गए हैं।
5-रामायण कथा के वाचक को क्या देना चाहिए?
रामायण कथा के अंत में अपनी सामर्थ्य के अनुसार वाचक को गाय, वस्त्र, सोना, रामायण की पुस्तक और अन्य वस्तुएं दक्षिणा सहित भेंट करने का विधान बताया गया है।









