प्राचीन काल में एक कलिक का नाम का शिकारी था। वह सदा पराई स्त्री और पराए धन के अपहरण में ही लगा रहता था। सदैव दूसरों की निंदा करना उसका रोज का काम था। सभी प्रकार के जीव जंतुओं को पीड़ा देता था। न जाने कितने ब्राह्मणों और कितने गाय की उसने हत्या की। उसके पाप की गणना करोड़ों वर्षों में भी नहीं की जा सकती थी। एक समय वह महापापी शिकारी जो जीव जंतुओं के लिए यमराज के समान भयंकर था एक नगर में गया। वह नगर सब प्रकार के वैभव से संबंध था।
युवतियों द्वारा परिपूर्ण था। वहां स्वच्छ जल स्वच्छ हवा थी। सरोवर से युक्त और नाना प्रकार की दुकानें थी। वह नगर देवताओं के समान लग रहा था। वह नगर ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई देवता यहां निवास करते हो। उस नगर के एक बगीचे में भगवान श्री रामचंद्र जी का सुंदर मंदिर था जो सोने के अनेक कलश से ढका हुआ था। उसे देखकर शिकारी को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने मन ही मन विचार किया कि यहां से मैं बहुत सोना चुरा कर ले जाऊंगा।
ऐसा निश्चय करके सदैव चोरी पर निर्भर रहने वाला वह श्री राम जी के मंदिर में गया। उस मंदिर में उसने उतंग मुनि का दर्शन किया जो तपस्या की निधि थे। उत्तंग मुनि उस मंदिर में अकेले ही रहते थे। उनके हृदय में सबके लिए प्रेम था।
उन्हें वहां उपस्थित देखकर शिकारी ने सोचा की चोरी में विघ्न पड़ सकता है इसलिए जब आधी रात हुई तब उसने चोरी करने का विचार किया। चोरी में लिप्त उस शिकारी ने आधी रात को उत्तंग मुनि की छाती को अपने पैर से दबा दिया और अपने हाथ से उनका गला पकड़ लिया और तलवार उठा कर उन्हें मार डालने का प्रयास करने लगा। जब उत्तंग मुनि ने देखा कि वह शिकारी मुझे मारना चाहता है तो उस शिकारी से इस प्रकार बोले।
उन्होंने कहा कि मनुष्य पराए धन का अपहरण करके अपनी स्त्री आदि का पोषण करता है वह किस काम का है? दरअसल, अंत में उन सब को छोड़कर वह अकेला ही नरक में जाता है। मेरी माता, मेरे पिता, मेरी पत्नी, मेरा पुत्र, मेरा घर इस प्रकार की ममता व्यर्थ ही प्राणियों को कष्ट देती रहती है।
मनुष्य जब तक कमा कर धन देता है तभी तक लोग उसके भाई बंधु बने रहते हैं और उसके कमाए हुए धन को सारे बंधु बांधव सदा भोगते रहते हैं किंतु मूर्ख मनुष्य अपने किए हुए पाप के फलस्वरुप दुख को अकेला ही भोगता है।
उत्तंग मुनि की यह बातें सुनकर उस शिकारी को डर लगने लगा। वह भय से व्याकुल हो गया और मुनि के चरणों में गिरकर कहने लगा कि हे प्रभु ! मेरे अपराधों को क्षमा कर दीजिए। प्रभु मेरी बुद्धि सदा पाप में ही डूबी रहती थी। मैंने सदैव पाप का ही आचरण किया है।
हे प्रभु ! मेरा उद्धार किस प्रकार होगा? उत्तंग मुनि बोले कि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में तुम्हें भक्ति भाव से आदर पूर्वक रामायण की कथा सुननी चाहिए। रामायण के श्रवण मात्र से मनुष्य समस्त पापों से छुटकारा पा जाता है। उस समय उस कलिक नाम की शिकारी के सारे पाप नष्ट हो गए और वह रामायण की कथा सुनकर तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो गया।
इसीलिए कहा गया है कि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में रामायण की कथा सुननी चाहिए। क्योंकि रामायण हितकारक है। इसके द्वारा भगवान की पूजा करने वाला पुरुष मन से जो भी चाहता है उसे निसंदेह प्राप्त कर लेता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-कलिक नाम का शिकारी कौन था?
कलिक एक अत्यंत पापी शिकारी था, जो चोरी, हिंसा, जीव हत्या और पराई स्त्री तथा धन के अपहरण में लिप्त रहता था।
2-कलिक शिकारी की मुलाकात उत्तंग मुनि से कैसे हुई?
कलिक चोरी करने के उद्देश्य से भगवान श्रीराम के मंदिर में गया था। वहां उसकी मुलाकात मंदिर में रहने वाले तपस्वी उत्तंग मुनि से हुई।
3-उत्तंग मुनि ने कलिक शिकारी को क्या उपदेश दिया?
उत्तंग मुनि ने समझाया कि मनुष्य दूसरों के लिए पाप करके धन अर्जित करता है, लेकिन उसके पापों का फल उसे स्वयं ही भोगना पड़ता है।
4-कलिक शिकारी का उद्धार कैसे हुआ?
उत्तंग मुनि के निर्देश पर कलिक ने चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में भक्तिभाव से रामायण की कथा सुनी। कथा के प्रभाव से उसके पाप नष्ट हो गए।
5-चैत्र मास में रामायण श्रवण की क्या महिमा बताई गई है?
इस कथा में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में रामायण श्रवण को अत्यंत पुण्यकारी बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इससे पापों का नाश और भगवान की कृपा प्राप्त होती है।









