|| ज्ञान का महासागर ||

यज्ञ में आहुति देते समय क्यों बोला जाता है ‘स्वाहा’? जानिए पितरों के लिए ‘स्वधा’ का रहस्य

यज्ञ में आहुति देते समय ‘स्वाहा’ बोलने का क्या रहस्य है? जानिए स्वाहा का अग्निदेव से संबंध, देवताओं तक आहुति पहुंचने की कथा और पितरों के लिए ‘स्वधा’ क्यों कहा जाता है।

साझा करें:

स्वाहा और स्वधा का अंतर

आपने कभी अपने घर में या मंदिर में हवन होते हुए देखा हो तो आपने एक चीज गौर की होगी। जब भी हम किसी देवता के निमित्त हवन में आहुति डालते है तो स्वाहा शब्द का प्रयोग किया जाता है और यह आहुति अग्नि में डाली जाती है। आखिर इसके पीछे का रहस्य क्या है? देवताओं की आहुति अग्नि में ही क्यों डाली जाती है? यह स्वाहा कौन है? इसके अलावा जब हम पितरों को आहुति देते है तो स्वाहा शब्द का प्रयोग क्यों नहीं करते है? आज इस लेख में आपको इन सवालों के जवाब हम देने वाले है।

यज्ञ में ‘स्वाहा’ बोलने की शुरुआत कैसे हुई?

एक बार की बात है। सभी देवता ब्रह्मा जी के पास गए और उनसे कहने लगे कि उनकी भूख शांत नहीं हो रही है। ऐसे में ब्रह्मा जी को अचरज हुआ ! उन्होंने कहा कि मैंने मृत्यु लोक में यज्ञ की आहुति के रूप में आपके भोजन की व्यवस्था की है और मुख के रूप में अग्नि देव को नियुक्त किया है ऐसे में आपको भोजन क्यों नहीं प्राप्त हो रहा है? अग्नि देव ने ब्रह्मा जी को प्रणाम किया और उनसे अपनी बात कही।

अग्नि देव ने कहा, प्रभु ! मैं देवताओं को दिये जाने वाले भोजन का मुख तो बन गया हूं लेकिन मैं उन तक भोजन पहुंचाने में असमर्थ हूं। अग्नि देव की इस बात को सुनकर ब्रह्मा जी ने कुछ विचार किया और उन्होंने देवताओं को भोजन प्राप्त करवाने का प्रबंध किया। ब्रह्मा जी ने अपने मानस पुत्र दक्ष प्रजापति की बेटी स्वाहा से अग्नि देव का विवाह करवाया और स्वाहा ने देवताओं का भोजन प्राप्त करवाने में अग्नि देव की सहायता की।

स्वाहा ने देवताओं तक भोजन कैसे पहुंचाया?

मृत्यु लोक और स्वर्ग लोक के बीच में स्वाहा ने एक सेतु का काम किया। इसके बाद देवताओं को अग्नि देव और स्वाहा की कृपा से भोजन प्राप्त होने लगा। इसलिए यज्ञ में अग्नि ज़रूरी है क्योंकि अग्नि देवताओं का मुख है और स्वाहा बोलकर ही आहुति अर्पित की जाती है क्योंकि उसके माध्यम से ही देवताओं को भोजन प्राप्त होगा। अगर आपने आहुति देते समय स्वाहा शब्द का उच्चारण नहीं किया तो देवता को भोजन नहीं मिलता।

पितरों की आहुति में ‘स्वाहा’ की जगह ‘स्वधा’ क्यों बोला जाता है?

अब एक बड़ा प्रश्न यह भी आता है कि पितरों को दिए जाने वाले भोजन में स्वाहा शब्द का प्रयोग नहीं होता है ,वहां स्वधा बोला जाता है। इसके पीछे भी एक कारण है। दरअसल दक्ष ने अपनी एक पुत्री स्वधा का विवाह पितरों से किया था। इसलिए देवताओं और पितरों, दोनों के भोजन की व्यवस्था अलग है। अक्सर आपने देखा होगा कि जब हम अपने पितरों के निमित्त भोजन रखते है तो स्वाहा नहीं बल्कि स्वधा शब्द का प्रयोग किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1-यज्ञ में आहुति देते समय ‘स्वाहा’ क्यों बोला जाता है?

यज्ञ की आहुति देवताओं तक पहुंचाने के लिए ‘स्वाहा’ शब्द का उच्चारण किया जाता है।

2-स्वाहा कौन हैं?

पौराणिक कथाओं के अनुसार स्वाहा दक्ष प्रजापति की पुत्री और अग्निदेव की पत्नी हैं।

3-यज्ञ में अग्निदेव की क्या भूमिका है?

अग्निदेव देवताओं के मुख के रूप में यज्ञ की आहुति को देवताओं तक पहुंचाने का माध्यम बनते हैं।

4-पितरों को आहुति देते समय ‘स्वाहा’ क्यों नहीं बोला जाता?

पितरों को अर्पित भोजन में ‘स्वाहा’ के बजाय ‘स्वधा’ शब्द का प्रयोग किया जाता है।

5-स्वधा कौन हैं?

पौराणिक कथाओं के अनुसार स्वधा दक्ष प्रजापति की पुत्री हैं और उनका विवाह पितरों से हुआ था।

नवीनतम लेख

सभी लेख देखें
12 नवंबर को मंगल का सिंह राशि में गोचर : 12 राशियों पर क्या होगा असर?

ज्योतिष

12 नवंबर को मंगल का सिंह राशि में गोचर : 12 राशियों पर क्या होगा असर?

12 नवंबर 2026 को मंगल सिंह राशि में प्रवेश करेंगे। गुरु और केतु के साथ मंगल की स्थिति से 12 राशियों के करियर, धन, रिश्ते, साहस और निर्णय क्षमता पर असर पड़ेगा।

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 1, श्लोक 31: अर्जुन द्वारा युद्ध के विपरीत परिणाम का वर्णन करना

भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 1, श्लोक 31: अर्जुन द्वारा युद्ध के विपरीत परिणाम का वर्णन करना

श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 1,श्लोक 31 में अर्जुन युद्ध के विपरीत शकुन, स्वजनों के वध, अनिष्ट परिणाम और कल्याण न दिखाई देने की बात भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं।

श्रुत और श्रोतव्य भोगों का त्याग क्यों जरूरी है? समझिये

आध्यात्म

श्रुत और श्रोतव्य भोगों का त्याग क्यों जरूरी है? समझिये

भगवद्गीता में श्रुत और श्रोतव्य भोगों के त्याग का महत्व, मन की चंचलता, इच्छाओं, आसक्ति, समता, निष्काम कर्म और आत्मज्ञान के मार्ग को सरलता से समझाया गया है।

एक बालक की जिद ! पिता की उदासीनता और विष्णु का प्रसन्न होना ! अमर हुआ ध्रुव

पौराणिक कथाएं

एक बालक की जिद ! पिता की उदासीनता और विष्णु का प्रसन्न होना ! अमर हुआ ध्रुव

भगवान के भक्त ध्रुव महाराज की इस कथा में पांच वर्ष के बालक ध्रुव का अपमान, भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या, नारद से मंत्र प्राप्ति और ध्रुव तारा बनने का प्रसंग है।