ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर हुआ विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों के बीच युद्ध की स्थिति बन गई। तभी एक दिव्य अग्नि स्तंभ प्रकट हुआ, जिसका आदि और अंत जानने की जिम्मेदारी दोनों को दी गई। इस परीक्षा में ब्रह्मा द्वारा बोले गए असत्य के कारण शिव ने उन्हें शाप दिया कि संसार में उनकी पूजा नहीं होगी।
ब्रह्मा और विष्णु में किस बात को लेकर विवाद हुआ?
एक बार की बात है। देवताओं को ज्ञात हुआ कि ब्रह्मा जी और विष्णु जी में किसी बात को लेकर विवाद हो गया है। जब देवता वहां पहुंचे तो उन्होंने देखा कि दोनों स्वयं को बड़ा समझने पर उतारू हो गए थे। ब्रह्मा जी का कहना था कि विष्णु ने उन्हें देखकर प्रणाम नहीं किया वही विष्णु जी का तर्क था कि वो ब्रह्मा जी से बड़े है इसलिए कायदे से तो सबसे पहले ब्रह्मा जी को उन्हें प्रणाम करना था।
दोनों की बहस इतनी अधिक बढ़ गई की अस्त्र का प्रयोग करने तक की नौबत आ गई थी। उस समय देवता भयभीत हो गए। उन्हें लगा कि अगर इस संसार के रचयिता और पालक दोनों में युद्ध हो गया तो इस ब्रह्माण्ड का क्या होगा? देवता इस प्रकार सोच ही रहे थे कि उसी समय एक दिव्य अग्नि स्तम्भ प्रकट हुआ। स्वर्ण की तरह प्रकाशमान वह स्तंभ आदि और अंत से रहित जान पड़ता था।
अग्नि स्तंभ का आदि और अंत खोजने की परीक्षा कैसे हुई?
देवताओं ने दोनों से कहा कि जो इसका आदि या अंत पता लगाएगा वही सबसे बड़ा होगा। श्री विष्णु ने स्वयं को शूकर में बदल लिया और वो नीचे की तरफ पृथ्वी को खोदने लगे और वहीं ब्रह्मा जी ने हंस का रूप धारण किया और ऊपर की ओर हवा में जाने लगे। दोनों ने बहुत कोशिश की लेकिन उस दिव्य अग्नि स्तम्भ का न कोई आदि था और ना कोई अंत था। जब थक हारकर दोनों वापिस उसी स्थान पर आने के लिए प्रेरित हुए ठीक उसी समय ब्रह्मा जी को केतकी का फूल ऊपर से नीचे गिरते हुए दिखाई दिया।
ब्रह्मा जी ने केतकी के फूल से झूठ क्यों बुलवाया?
ब्रह्मा जी ने उसे अपनी चोंच में पकड़ा और उससे पूछा कि आखिर तुम कहां से आ रहे हो? केतकी ने ब्रह्मा से कहा कि मैं इस स्तम्भ के ऊपरी सिरे पर था लेकिन वहां से फिसल गया। ब्रह्मा जी को केतकी का पूरा वाक्य समझ में आता, इससे पहले ही उनके मन में छल ने जन्म लिया।
विष्णु को पराजित करने की इच्छा उनके मन में जाग गई थी। उन्होंने केतकी को असत्य बोलने के लिए तैयार कर लिया। उधर विष्णु अपनी पराजय को स्वीकार कर चुके थे। उनके समक्ष ब्रह्मा जी अपनी महानता का बखान करने लगे कि कैसे उन्होंने इस दिव्य स्वर्ण स्तम्भ का ऊपरी हिस्सा खोज लिया और गवाह के रूप में केतकी के पुष्प को खड़ा कर दिया।
शिव ने ब्रह्मा को पूजा न होने का शाप क्यों दिया?
विष्णु ने हाथ जोड़कर जैसे ही अपनी पराजय स्वीकार की वह अग्नि स्तंभ टूटने लगा और उसके मध्य से ॐ की ध्वनि सुनाई देने लगी। आग की लपटों के बीच सबने शिव को क्रोध से भरे हुए देखा। शिव ने ब्रह्मदेव को उनकी इस हरकत के लिए जमकर फटकार लगाई और अपने त्रिशूल से प्रहार किया। शिव ने ब्रह्मा को शाप दिया कि आपने सत्य को स्वीकार नहीं किया इसलिए संसार आपको स्वीकार नहीं करेगा। आज से आपकी किसी भी देव स्थान में आपकी पूजा नहीं होगी।
साथ ही साथ शिव ने केतकी के पुष्प को भी स्वयं की सेवा से वंचित कर दिया। वहीं शिव के प्रति दक्ष की कड़वाहट बढ़ती जा रही थी। पहले तो शिव ने ब्रह्मा जी का मस्तक काट दिया था और अब शिव ने उन्हें पूजा से वंचित कर दिया था। अपने पिता के प्रति शिव का यह व्यवहार न जाने क्यों दक्ष के मन में जहर घोल रहा था।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
ब्रह्मा और विष्णु में किस बात को लेकर विवाद हुआ था?
दोनों के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ था और दोनों स्वयं को बड़ा मान रहे थे।
ब्रह्मा और विष्णु की परीक्षा किसने ली?
उनकी श्रेष्ठता का निर्णय करने के लिए दिव्य अग्नि स्तंभ के आदि और अंत का पता लगाने की परीक्षा हुई।
ब्रह्मा जी ने केतकी के फूल से क्या करवाया था?
ब्रह्मा जी ने केतकी के फूल को अपने पक्ष में असत्य गवाही देने के लिए तैयार किया था।
ब्रह्मा जी को पूजा न होने का शाप किसने दिया था?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, असत्य बोलने के कारण भगवान शिव ने ब्रह्मा जी को संसार में पूजा न होने का शाप दिया था।
केतकी के फूल को शिव की पूजा से क्यों वंचित किया गया?
केतकी के फूल ने ब्रह्मा जी के पक्ष में असत्य गवाही दी थी, इसलिए शिव ने उसे अपनी पूजा से वंचित कर दिया।








