|| ज्ञान का महासागर ||

शेषनाग कैसे बने श्री विष्णु के सेवक! अपनी माता कद्रू का शेषनाग ने त्याग क्यों किया था?

शेषनाग ने अपनी माता कद्रू का त्याग क्यों किया और कैसे भगवान विष्णु की सेवा प्राप्त की? जानिए अनंत शेष की तपस्या, वरदान, पृथ्वी धारण और विष्णु शैया बनने की कथा।

साझा करें:

Sheshnag Bhagwan Vishnu Sevak

हमारे हिन्दू धर्म में श्री हरि विष्णु देवताओं के स्वामी कहे जाते है और वो क्षीर सागर में निवास करते हैं। इसके साथ ही, शेषनाग, भगवान विष्णु के साथ क्षीर सागर में ही रहते हैं और श्री हरि और माता लक्ष्मी क्षीर सागर में शेषनाग के आसन पर ही निवास करते हैं। उनका एक नाम अनंत भी है क्योंकि उनके अनंत सिर है।

पौराणिक कथाओं में जब भी सर्पों का वर्णन आता है तो शेषनाग का नाम सबसे पहले लिया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि वो सर्पों के अग्रज है।

कद्रू और विनता, जो दक्ष प्रजापति की पुत्रियां थी उनका विवाह ऋषि कश्यप से हुआ था। कद्रू से 1000 नाग पैदा हुए और विनता ने गरुड़ और अरुण को जन्म दिया था।

शेषनाग कद्रू के पुत्र है और वासुकी, तक्षक, कालिया, पद्म , महापद्म , धनञ्जय , शन्ख सब इनके छोटे भाई है। वासुकि को शंकर जी अपने गले में धारण करते है वही बाकी सर्प नाग लोक में निवास करते है।

राम और कृष्ण अवतार में शेषनाग ने कौन-से रूप धारण किए?

शेषनाग भगवान विष्णु की सेवा में रहते है और श्री विष्णु भी इन्हे बेहद प्रेम करते है। जब श्री विष्णु ने राम अवतार लिया तो शेषनाग जी ने लक्ष्मण का अवतार लिया था। द्वापर में जब कृष्ण का अवतार हुआ तो शेषनाग ने बलराम जी का अवतार लिया। जब कंस के कारागार में कृष्ण का जन्म हुआ तो वासुदेव उन्हें नन्द गाँव लेकर जा रहे थे। उस समय भीषण बारिश हो रही थी और यमुना उफान पर आ गई थी। उस समय शेषनाग जी ने अपने फनों का विस्तार किया और वासुदेव जी की रक्षा की थी।

शेषनाग ने अपनी माता कद्रू का त्याग क्यों किया?

शेषनाग जी के विष्णु जी की शैया बनने की कथा भी रोचक है। दरअसल, एक बार कद्रू ने छल से विनता को शर्त में हरा दिया था और उसे अपनी दासी बना लिया था। अपनी माँ को दासत्व से मुक्त करने के लिए गरुड़ को देवताओं से अमृत लाना पड़ा था जहां उनके और देवताओं के बीच युद्ध भी हुआ था। जब शेषनाग को यह सब पता चला तो उन्होंने अपनी मां को खूब खरी खोटी सुनाई और उनका त्याग कर दिया था।

तपस्या के बाद शेषनाग को कौन-से वरदान मिले?

गंधमादन पर्वत पर उन्होंने भारी तप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें दो वरदान दिये। पहला तो उन्हें श्री विष्णु का साथ मिला और दूसरा पृथ्वी को धारण करने का कार्य भी उन्हें प्राप्त हुआ।

ब्रह्मा जी ने शेषनाग से कहा कि पृथ्वी अपनी धुरी पर स्थिर नहीं है इसलिए आप इसे अपने फन पर धारण करें जिसके बाद शेषनाग ने ब्रह्मा जी की इस आज्ञा का भी पालन किया और विष्णु जी की सेवा में लग गए। शेषनाग के ही सौतेले भाई गरुड़ श्री विष्णु के वाहन हुए वही अरुण सूर्य के सारथी बने।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

शेषनाग का दूसरा नाम क्या है?

शेषनाग को अनंत भी कहा जाता है।

शेषनाग ने अपनी माता कद्रू का त्याग क्यों किया था?

कद्रू ने छल से विनता को पराजित करके अपनी दासी बना लिया था। इस व्यवहार से शेषनाग दुखी हुए और उन्होंने अपनी माता का त्याग कर दिया।

शेषनाग ने भगवान विष्णु की सेवा कैसे प्राप्त की?

शेषनाग ने गंधमादन पर्वत पर कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें भगवान विष्णु की सेवा का वरदान दिया।

शेषनाग ने पृथ्वी को कैसे धारण किया?

ब्रह्मा जी की आज्ञा से शेषनाग ने पृथ्वी को अपने फनों पर धारण करने का कार्य स्वीकार किया।

भगवान विष्णु के राम और कृष्ण अवतार में शेषनाग कौन बने थे?

राम अवतार में शेषनाग लक्ष्मण और कृष्ण अवतार में बलराम के रूप में प्रकट हुए थे।

नवीनतम लेख

सभी लेख देखें
12 नवंबर को मंगल का सिंह राशि में गोचर : 12 राशियों पर क्या होगा असर?

ज्योतिष

12 नवंबर को मंगल का सिंह राशि में गोचर : 12 राशियों पर क्या होगा असर?

12 नवंबर 2026 को मंगल सिंह राशि में प्रवेश करेंगे। गुरु और केतु के साथ मंगल की स्थिति से 12 राशियों के करियर, धन, रिश्ते, साहस और निर्णय क्षमता पर असर पड़ेगा।

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 1, श्लोक 31: अर्जुन द्वारा युद्ध के विपरीत परिणाम का वर्णन करना

भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 1, श्लोक 31: अर्जुन द्वारा युद्ध के विपरीत परिणाम का वर्णन करना

श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 1,श्लोक 31 में अर्जुन युद्ध के विपरीत शकुन, स्वजनों के वध, अनिष्ट परिणाम और कल्याण न दिखाई देने की बात भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं।

श्रुत और श्रोतव्य भोगों का त्याग क्यों जरूरी है? समझिये

आध्यात्म

श्रुत और श्रोतव्य भोगों का त्याग क्यों जरूरी है? समझिये

भगवद्गीता में श्रुत और श्रोतव्य भोगों के त्याग का महत्व, मन की चंचलता, इच्छाओं, आसक्ति, समता, निष्काम कर्म और आत्मज्ञान के मार्ग को सरलता से समझाया गया है।

एक बालक की जिद ! पिता की उदासीनता और विष्णु का प्रसन्न होना ! अमर हुआ ध्रुव

पौराणिक कथाएं

एक बालक की जिद ! पिता की उदासीनता और विष्णु का प्रसन्न होना ! अमर हुआ ध्रुव

भगवान के भक्त ध्रुव महाराज की इस कथा में पांच वर्ष के बालक ध्रुव का अपमान, भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या, नारद से मंत्र प्राप्ति और ध्रुव तारा बनने का प्रसंग है।