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11 - गर्भ में परीक्षित की रक्षा, कुन्ती की स्तुति और युधिष्ठिर का शोक

महाभारत युद्ध के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में परीक्षित की रक्षा की। कुन्ती ने भगवान की स्तुति की और युधिष्ठिर स्वजनों के वध से शोकाकुल हुए।

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गर्भ में परीक्षित की रक्षा

महाभारत युद्ध के बाद पाण्डवों ने अपने स्वजनों का तर्पण किया और उनके वियोग में शोक मनाया। इसी समय भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में पल रहे परीक्षित की ब्रह्मास्त्र से रक्षा की। इसके बाद कुन्ती ने भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति की और युधिष्ठिर अपने स्वजनों के वध के कारण गहरे शोक में डूब गए।

गर्भ में परीक्षित की रक्षा और भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य कृपा-

महाभारत युद्ध के उपरांत जब कौरव और पाण्डव वंश के अधिकांश योद्धा युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हो चुके थे, तब पाण्डव भगवान श्रीकृष्ण के साथ अपने मरे हुए स्वजनों का तर्पण करने के लिए गंगा तट पर गए। वहाँ उन्होंने स्त्रियों को आगे करके विधिपूर्वक जलांजलि अर्पित की और अपने बंधुओं के गुणों का स्मरण करते हुए अत्यंत विलाप किया। इसके बाद भगवान के चरणकमलों की धूलि से पवित्र गंगाजल में स्नान कर सभी लोग युधिष्ठिर, धृतराष्ट्र, गान्धारी, कुन्ती और द्रौपदी एकत्र बैठकर अपने स्वजनों के वियोग में शोक करने लगे।

भगवान श्रीकृष्ण ने धौम्य आदि मुनियों के साथ उन्हें समझाया कि इस संसार में प्रत्येक जीव काल के अधीन है और मृत्यु से कोई बच नहीं सकता। उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिर को उनका वह राज्य पुनः प्राप्त कराया, जो छलपूर्वक उनसे छीन लिया गया था, और उन दुष्ट राजाओं का विनाश कराया जिन्होंने अधर्म का साथ दिया था। इसके अतिरिक्त युधिष्ठिर से तीन अश्वमेध यज्ञ संपन्न कराकर उनके यश को चारों दिशाओं में फैलाया।

कुछ समय पश्चात जब भगवान श्रीकृष्ण द्वारका लौटने के लिए तैयार हुए, तब अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा भयभीत होकर उनके सामने आई। उसने विनती की कि एक प्रज्वलित अस्त्र उसके गर्भ को नष्ट करने के लिए उसकी ओर बढ़ रहा है, अतः भगवान उसकी रक्षा करें।

भगवान श्रीकृष्ण तत्काल समझ गए कि अश्वत्थामा ने पाण्डव वंश को समाप्त करने के उद्देश्य से ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया है। उसी समय पाण्डवों ने भी उस भयंकर अस्त्र को अपनी ओर आते देखा और अपने-अपने अस्त्र उठा लिए।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों पर आई इस विपत्ति को देखकर सुदर्शन चक्र के द्वारा उनकी रक्षा की और अपनी योगमाया से उत्तरा के गर्भ को आवृत कर दिया। यद्यपि ब्रह्मास्त्र अमोघ माना जाता है और उसका प्रतिकार कठिन होता है, फिर भी भगवान के दिव्य तेज के सामने वह शांत हो गया। इस प्रकार उत्तरा के गर्भ में स्थित बालक सुरक्षित रहा, जो आगे चलकर परीक्षित के रूप में प्रसिद्ध हुआ और पाण्डव वंश को आगे बढ़ाया।

माता कुन्ती ने भगवान श्रीकृष्ण की क्यों की स्तुति?

इस अद्भुत घटना के पश्चात माता कुन्ती ने भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति की। उन्होंने कहा कि भगवान समस्त प्राणियों के भीतर और बाहर समान रूप से स्थित हैं, किन्तु अपनी माया के कारण सामान्य इन्द्रियों से देखे नहीं जा सकते। वे प्रकृति से परे, आदि पुरुष और परमेश्वर हैं। कुन्ती ने स्वीकार किया कि भगवान की वास्तविकता को समझ पाना अत्यंत कठिन है। जैसे कोई व्यक्ति भेष बदलकर सामने हो और मूढ़ लोग उसे पहचान न सकें, वैसे ही भगवान प्रत्यक्ष होते हुए भी अज्ञानियों को दिखाई नहीं देते।

उन्होंने भगवान के विभिन्न नामों- श्रीकृष्ण, वासुदेव, देवकीनन्दन, गोविन्द का स्मरण करते हुए उन्हें बार-बार प्रणाम किया। उन्होंने यह भी कहा कि भगवान ने पाण्डवों की अनेक बार रक्षा की है- विष से, लाक्षागृह की अग्नि से, राक्षसों के आक्रमण से, द्यूतसभा के अपमान से, वनवास की कठिनाइयों से और युद्ध के भयंकर संकटों से। अभी-अभी भी उन्होंने ब्रह्मास्त्र से उनकी रक्षा की है।

कुन्ती ने एक अत्यंत गूढ़ बात कही कि विपत्तियाँ ही भगवान के स्मरण का कारण बनती हैं, क्योंकि संकट के समय ही मनुष्य पूर्ण रूप से भगवान की शरण में जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि उच्च कुल, धन, विद्या और ऐश्वर्य का अभिमान मनुष्य को भगवान से दूर कर देता है, जबकि भगवान उन पर विशेष कृपा करते हैं जो अहंकार से रहित और दीनभाव से युक्त होते हैं।

उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि उनका मन सदा उनके चरणों में लगा रहे और सांसारिक मोह से मुक्त हो जाए। जैसे गंगा की धारा निरंतर समुद्र की ओर प्रवाहित होती रहती है, वैसे ही उनकी बुद्धि भी निरंतर भगवान की ओर प्रवाहित होती रहे।

कुन्ती ने भगवान की लीलाओं का वर्णन करते हुए कहा कि वे अजन्मा होते हुए भी संसार के कल्याण के लिए जन्म लेते हैं। वे विभिन्न योनियों में अवतार लेकर अपने भक्तों की रक्षा और दुष्टों का विनाश करते हैं। उनके जन्म और कर्म दिव्य हैं और उनका वास्तविक उद्देश्य सामान्य बुद्धि से समझ पाना कठिन है।

उन्होंने भगवान की बाल लीलाओं का स्मरण करते हुए उस अद्भुत स्थिति का वर्णन किया जब वे यशोदा के भय से रोते हुए प्रतीत होते हैं, जबकि वास्तव में वे स्वयं भय के कारण हैं। यह उनकी लीला का आश्चर्यजनक स्वरूप है।

कुन्ती ने भगवान से यह भी निवेदन किया कि वे उनके हृदय में बसे पाण्डवों और यदुवंशियों के प्रति अत्यधिक मोह को दूर करें और उनका मन केवल भगवान में स्थिर कर दें। उन्होंने कहा कि भगवान के बिना पाण्डवों और यदुवंश का कोई अस्तित्व नहीं है, जैसे प्राण के बिना इन्द्रियाँ निष्प्राण हो जाती हैं।

युधिष्ठिर का शोक और स्वजनों के वध का पश्चाताप-

भगवान श्रीकृष्ण ने कुन्ती की स्तुति को सुनकर मंद-मंद मुस्कुराते हुए उन्हें संतुष्ट किया। जब वे हस्तिनापुर से जाने लगे, तब राजा युधिष्ठिर ने उन्हें प्रेमपूर्वक रोक लिया, क्योंकि वे अपने स्वजनों के वध के कारण अत्यंत शोक में डूबे हुए थे।

यद्यपि व्यास आदि महर्षियों और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अनेक प्रकार से समझाया, फिर भी उनका शोक दूर नहीं हुआ। वे अपने मन में यह विचार करने लगे कि राज्य और शरीर के लिए उन्होंने अपने ही बंधु-बांधवों, गुरुओं और संबंधियों का नाश किया है, जो अत्यंत गंभीर अपराध है।

उन्होंने कहा कि यद्यपि शास्त्रों में धर्मयुद्ध में शत्रुओं के वध को उचित बताया गया है, फिर भी उन्हें इससे कोई संतोष नहीं मिल रहा। वे स्वयं को इस महान विनाश के लिए दोषी मानते थे। उन्होंने यह भी कहा कि इतने बड़े पाप का प्रायश्चित किसी यज्ञ या कर्मकाण्ड से संभव नहीं है।

जैसे कीचड़ से गंदे जल को शुद्ध नहीं किया जा सकता और मदिरा से मदिरा की अशुद्धि दूर नहीं होती, वैसे ही हिंसा से युक्त यज्ञों द्वारा प्राणियों की हत्या का प्रायश्चित नहीं किया जा सकता। इस प्रकार धर्मराज युधिष्ठिर मोह और शोक से व्याकुल होकर गहन चिंता में डूबे रहे।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1-उत्तरा के गर्भ में परीक्षित की रक्षा किसने की थी?

भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रह्मास्त्र से उत्तरा के गर्भ में स्थित बालक की रक्षा की थी।

2-अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग क्यों किया था?

अश्वत्थामा ने पाण्डव वंश को समाप्त करने के उद्देश्य से ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था।

3-माता कुन्ती ने भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति में क्या कहा?

कुन्ती ने भगवान को आदि पुरुष और परमेश्वर बताते हुए कहा कि वे संकट के समय पाण्डवों की बार-बार रक्षा करते रहे हैं और उनका मन सदा भगवान के चरणों में लगा रहे।

4-कुन्ती के अनुसार विपत्तियों का क्या महत्व है?

कुन्ती के अनुसार विपत्तियाँ मनुष्य को भगवान का स्मरण कराने और उनकी शरण में जाने का अवसर देती हैं।

5-युधिष्ठिर युद्ध के बाद इतने शोक में क्यों डूब गए थे?

युधिष्ठिर अपने स्वजनों, गुरुओं और संबंधियों के वध को लेकर स्वयं को दोषी मान रहे थे और उन्हें लगता था कि राज्य के लिए इतना बड़ा विनाश हुआ है।

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