एक दिन द्वारका में भगवान श्रीकृष्ण की सोलह हजार रानियाँ विरह-वेदना से अत्यंत व्याकुल थीं। वे अपने प्रियतम के वियोग में तड़प रही थीं, परंतु उन्होंने देखा कि चतुर्थ पटरानी कालिन्दी जो यमुना जी के रूप में पूजित हैं वो अद्भुत शांति और आनंद में स्थित हैं। उनके मन में ईर्ष्या नहीं, बल्कि सरल जिज्ञासा थी।
उन्होंने प्रेमपूर्वक पूछा -“बहन! हम सब तो श्रीकृष्ण की धर्मपत्नी हैं और उनके विरह में दग्ध हो रही हैं, फिर तुम इतनी प्रसन्न कैसे हो?” यह प्रश्न केवल भावुकता नहीं, बल्कि भक्ति के रहस्य को जानने की उत्कंठा थी। यमुना जी मुस्कुराईं, उन्होंने उन्हें बहन मानकर करुणा से समझाया कि श्रीकृष्ण का स्वरूप बाहरी नहीं, आत्मिक है। जो उनके वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, वह कभी वियोग का अनुभव नहीं करता।
यमुना जी ने कहा कि श्रीकृष्ण ‘आत्माराम हैं। अर्थात् जो अपनी आत्मा में ही रमण करते हैं और उनकी आत्मा हैं श्रीराधा। राधा और कृष्ण दो नहीं, एक ही प्रेम की दो लहरें हैं। जो राधा की सेवा में तल्लीन है, वह स्वयं श्रीकृष्ण के सान्निध्य में है। यमुना जी ने बताया कि वे स्वयं राधा जी की दासी-भाव से सेवा करती हैं, इसी कारण विरह उन्हें स्पर्श नहीं कर पाता।
उन्होंने यह भी समझाया कि श्रीकृष्ण की सभी रानियाँ वास्तव में श्रीराधा के ही अंश-स्वरूप हैं। इसलिए उनका श्रीकृष्ण से कभी पूर्ण वियोग हो ही नहीं सकता। यह केवल अज्ञान का आभास है। जैसे पहले अक्रूर जब श्रीकृष्ण को गोकुल से मथुरा ले गए थे, तब गोपियों को जो विरह अनुभव हुआ, वह भी वास्तविक नहीं, प्रेम की तीव्रता से उत्पन्न अनुभूति थी। बाद में जब उद्धव जी ने उन्हें ज्ञान दिया, तब वे समझ सकीं कि प्रेम का संबंध शरीर से नहीं, आत्मा से होता है।
जब भक्त ईश्वर को केवल बाहरी रूप में खोजता है, तब उसे मिलन और वियोग दोनों का अनुभव होता है, परंतु जब वह जान लेता है कि ईश्वर उसके अंतःकरण में ही विराजमान हैं, तब विरह समाप्त हो जाता है। राधा-कृष्ण का नित्य मिलन इसी सत्य का प्रतीक है कि प्रेम कभी टूटता नहीं, वह केवल रूप बदलता है।
यमुना जी का संदेश यह था कि ज्ञान और सत्संग से ही इस रहस्य को समझा जा सकता है। जब हृदय में यह अनुभव जाग्रत हो जाता है कि “श्रीकृष्ण ही राधा हैं और राधा ही श्रीकृष्ण,” तब भक्त को हर क्षण नित्य विहार का आनंद प्राप्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-श्रीकृष्ण की रानियों ने यमुना जी से क्या पूछा था?
श्रीकृष्ण की रानियों ने यमुना जी से पूछा कि वे श्रीकृष्ण के विरह में व्याकुल होने के बजाय इतनी शांत और आनंदित कैसे रहती हैं।
2-यमुना जी ने श्रीकृष्ण को ‘आत्माराम’ क्यों कहा?
यमुना जी ने बताया कि श्रीकृष्ण आत्माराम हैं और उनकी आत्मा श्रीराधा हैं। राधा-कृष्ण का संबंध बाहरी रूप से नहीं, बल्कि दिव्य प्रेम और आत्मिक एकता से जुड़ा है।
3-यमुना जी को श्रीकृष्ण के विरह का अनुभव क्यों नहीं होता था?
यमुना जी श्रीराधा की दासी-भाव से सेवा करती हैं। इसी कारण वे स्वयं को श्रीकृष्ण से अलग नहीं मानतीं और विरह की अनुभूति उन्हें स्पर्श नहीं करती।
4-श्रीकृष्ण की रानियों को विरह का अनुभव क्यों होता था?
विरह का अनुभव इसलिए होता है क्योंकि भक्त ईश्वर को केवल बाहरी रूप में देखता है। जब उसे ईश्वर के अंतःकरण में विराजमान होने का ज्ञान होता है, तब मिलन और वियोग का भाव समाप्त हो जाता है।
5-राधा-कृष्ण के नित्य मिलन का क्या रहस्य बताया गया है?
राधा और कृष्ण एक ही दिव्य प्रेम की दो अभिव्यक्तियां हैं। इसलिए उनका प्रेम नित्य है और वास्तविक अर्थ में उनमें कभी वियोग नहीं होता।









