महाभारत युद्ध के बाद जब पाण्डव शिविर में विश्राम कर रहे थे, उसी रात अश्वत्थामा ने क्रोध में आकर सोते हुए द्रौपदी के पाँचों पुत्रों का सिर काट दिया और उन्हें दुर्योधन के पास ले गया। परंतु दुर्योधन को भी यह कार्य अत्यंत निन्दनीय लगा, क्योंकि युद्ध के नियमों के अनुसार सोते हुए और निरपराध बालकों की हत्या घोर अधर्म मानी जाती है। जब द्रौपदी को अपने पुत्रों की मृत्यु का समाचार मिला तो वह अत्यंत दुःखी हो उठी और शोक में विलाप करने लगी।
अर्जुन ने उसे सांत्वना देते हुए कहा, “कल्याणि! तुम्हारे आँसू तब रुकेंगे जब मैं उस आततायी ब्राह्मणाधम का सिर काटकर तुम्हारे सामने लाऊँगा। तब तुम पुत्रों की अन्त्येष्टि के बाद उस पर पैर रखकर स्नान करोगी।” यह प्रतिज्ञा करके अर्जुन ने अपने मित्र भगवान श्रीकृष्ण को सारथी बनाया, कवच धारण किया और गाण्डीव धनुष लेकर अश्वत्थामा का पीछा करने निकल पड़े। उधर बालकों की हत्या के कारण अश्वत्थामा स्वयं भी भय और पश्चाताप से व्याकुल था। जब उसने देखा कि अर्जुन उसका पीछा कर रहे हैं, तो वह प्राण बचाने के लिए भागने लगा।
जब अश्वत्थामा ने देखा कि उसके रथ के घोड़े थक चुके हैं और वह अकेला पड़ गया है, तब उसने अंतिम उपाय के रूप में ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। यद्यपि उसे उस अस्त्र को वापस लेने की विधि नहीं आती थी, फिर भी प्राण संकट देखकर उसने आचमन किया, ध्यान लगाया और ब्रह्मास्त्र का सन्धान कर दिया। उस अस्त्र के प्रभाव से दिशाओं में भयंकर तेज फैल गया और प्रलयकालीन अग्नि जैसा दृश्य उत्पन्न हो गया।
यह देखकर अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना की- “हे कृष्ण! आप सच्चिदानन्द स्वरूप परमात्मा हैं, भक्तों को अभय देने वाले हैं। इस संकट से रक्षा कीजिए।” भगवान ने बताया कि यह अश्वत्थामा का चलाया हुआ ब्रह्मास्त्र है और इसे रोकने का एकमात्र उपाय दूसरा ब्रह्मास्त्र चलाना ही है।
भगवान की आज्ञा से अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र का सन्धान किया। दोनों अस्त्रों का तेज प्रलयकालीन सूर्य और अग्नि के समान आकाश में फैल गया और तीनों लोकों को जलाने लगा। प्रजा भयभीत हो उठी और सबको लगा कि प्रलय आ गया है। तब भगवान की अनुमति से अर्जुन ने दोनों ब्रह्मास्त्रों को वापस लौटा लिया। इसके बाद उन्होंने क्रोध से भरे हुए अश्वत्थामा को पकड़ लिया और रस्सी से बाँधकर शिविर की ओर ले चले।
जब अर्जुन अश्वत्थामा को बाँधकर शिविर में लाने लगे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने क्रोधित होकर कहा- “अर्जुन! इस ब्राह्मणाधम को छोड़ना उचित नहीं है। इसने सोते हुए निरपराध बालकों की हत्या की है। ऐसे आततायी का वध करना ही धर्म है।” श्रीकृष्ण ने अर्जुन को याद दिलाया कि उन्होंने द्रौपदी के सामने प्रतिज्ञा की थी कि वह अश्वत्थामा का सिर काटकर लाएँगे।
किन्तु जब द्रौपदी ने देखा कि अश्वत्थामा पशु की भाँति बाँधकर लाया गया है, तो उसका कोमल हृदय दया से भर गया। उसने अर्जुन से कहा- “इन्हें छोड़ दीजिए। ये ब्राह्मण हैं और हमारे गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र हैं। जिनकी कृपा से आपने धनुर्वेद और शस्त्रास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया है, उन्हीं के पुत्र का अपमान करना उचित नहीं है।
जैसे मैं अपने पुत्रों के वियोग में रो रही हूँ, वैसे ही इनकी माता कृपी भी रोएँगी। गुरुवंश को पीड़ा देना आपके योग्य नहीं है।” द्रौपदी के इन करुणा भरे वचनों का समर्थन युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, सात्यकि और वहाँ उपस्थित अन्य लोगों ने भी किया। परन्तु भीमसेन क्रोधित होकर बोले कि जिसने सोते हुए बच्चों की हत्या की है, उसका वध ही उचित है।
उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कराकर अर्जुन से कहा, “शास्त्रों में दो बातें कही गई हैं। पतित ब्राह्मण का वध नहीं करना चाहिए और आततायी को अवश्य मारना चाहिए। इसलिए ऐसा उपाय करो जिससे दोनों बातों का पालन हो जाए और तुम्हारी प्रतिज्ञा भी पूरी हो।”
अर्जुन तुरंत भगवान के संकेत को समझ गए। उन्होंने अपनी तलवार से अश्वत्थामा के सिर की मणि और उसके बाल काट लिए। उस मणि के साथ ही उसका तेज और प्रतिष्ठा समाप्त हो गई। फिर उन्होंने उसका बन्धन खोल दिया और उसे शिविर से बाहर निकाल दिया।
शास्त्रों में कहा गया है कि ब्राह्मणाधम के लिए यही दंड है- उसका मुण्डन करना, धन छीन लेना और उसे स्थान से निकाल देना। इस प्रकार अर्जुन ने अपनी प्रतिज्ञा भी निभाई, द्रौपदी की करुणा का सम्मान भी किया और श्रीकृष्ण की आज्ञा का पालन भी किया। इसके बाद द्रौपदी और पाण्डवों ने अपने मृत पुत्रों और अन्य संबंधियों की अन्त्येष्टि क्रिया की।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-अश्वत्थामा ने द्रौपदी के पुत्रों की हत्या क्यों की थी?
अश्वत्थामा ने क्रोध में आकर रात के समय सो रहे द्रौपदी के पांचों पुत्रों की हत्या कर दी और उनके कटे हुए सिर दुर्योधन के पास ले गया।
2-अर्जुन ने अश्वत्थामा को पकड़ने के बाद क्या किया?
अर्जुन ने अश्वत्थामा को पकड़कर रस्सी से बांध दिया और उसे शिविर में लेकर आए। उन्होंने द्रौपदी के सामने की गई अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने का संकल्प लिया था।
3-द्रौपदी ने अश्वत्थामा को छोड़ने के लिए क्यों कहा?
द्रौपदी ने गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र होने और उसकी माता कृपी के संभावित दुख को ध्यान में रखते हुए अश्वत्थामा के प्रति करुणा दिखाई। उन्होंने कहा कि गुरु के पुत्र का अपमान करना उचित नहीं है।
4-अर्जुन ने अश्वत्थामा को कौन-सा दंड दिया?
अर्जुन ने अश्वत्थामा के सिर की मणि और बाल काट दिए, उसका बंधन खोल दिया और उसे शिविर से बाहर निकाल दिया। इस प्रकार उन्होंने उसके प्राण भी बचाए और उसे दंड भी दिया।
5-श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अश्वत्थामा के विषय में क्या उपाय बताया?
श्रीकृष्ण ने ऐसा उपाय करने को कहा जिससे ब्राह्मण की हत्या न हो और आततायी को दंड देने की बात भी पूरी हो जाए। अर्जुन ने मणि और बाल काटकर तथा उसे अपमानित कर शिविर से बाहर निकालकर दोनों बातों का पालन किया।









