सृष्टि के आदि में जब कुछ भी प्रकट नहीं हुआ था, तब केवल परमात्मा ही थे। एक समय भगवान के हृदय में लोकों की रचना की इच्छा उदित हुई। इच्छा होते ही उन्होंने महतत्त्व आदि से निष्पन्न विराट पुरुष रूप धारण किया। उस दिव्य पुरुष में दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच महाभूत ये सोलह कलाएँ समाहित थीं।
वे कारण-जल में योगनिद्रा का विस्तार करके शयन करने लगे। उसी समय उनके नाभि-सरोवर से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ और उस कमल से प्रजापतियों के अधिपति ब्रह्माजी उत्पन्न हुए।
भगवान के विराट स्वरूप के अंग-प्रत्यंग में ही समस्त लोकों की कल्पना की गई। यह उनका विशुद्ध सत्त्वमय श्रेष्ठ रूप है, जिसका दर्शन योगीजन दिव्य दृष्टि से करते हैं। उस रूप में सहस्त्रों सिर, हजारों नेत्र, कान, नासिकाएँ, भुजाएँ और चरण हैं; हजारों मुकुट, वस्त्र और कुण्डल आदि आभूषणों से वह शोभायमान है।
यही नारायण रूप समस्त अवतारों का अक्षय कोष है। इसी के अंश से देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी और विविध योनियों की सृष्टि होती है। जब-जब सृष्टि में आवश्यकता हुई, उसी विराट पुरुष ने विविध अवतार धारण कर धर्म की रक्षा और लोककल्याण का कार्य किया।
सृष्टि के प्रारम्भ में भगवान ने कौमार सर्ग में सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार के रूप में अवतार लिया और अखण्ड ब्रह्मचर्य का आदर्श स्थापित किया। इसके पश्चात जब पृथ्वी रसातल में चली गई, तब उन्होंने वराह रूप धारण कर उसे उठाकर पुनः स्थापित किया। फिर देवर्षि नारद के रूप में प्रकट होकर ‘नारद-पांचरात्र’ का उपदेश दिया और कर्म के माध्यम से कर्मबंधन से मुक्ति का मार्ग बताया।
धर्म की पत्नी मूर्ति के गर्भ से नर-नारायण रूप में अवतीर्ण होकर उन्होंने कठोर तपस्या द्वारा मन और इन्द्रियों के संयम का आदर्श प्रस्तुत किया। पाँचवें अवतार में कपिल मुनि बनकर सांख्य शास्त्र का उपदेश दिया, जो कालक्रम से लुप्त हो गया था। अत्रि और अनसूया के पुत्र दत्तात्रेय बनकर अलर्क और प्रह्लाद को ब्रह्मज्ञान प्रदान किया। रुचि प्रजापति की पत्नी आकूति से यज्ञ रूप में अवतरित होकर स्वायम्भुव मन्वन्तर की रक्षा की।
राजा नाभि और मेरुदेवी के पुत्र ऋषभदेव रूप में उन्होंने परमहंस मार्ग का प्रतिपादन किया, जो सभी आश्रमियों के लिए वंदनीय है। तत्पश्चात ऋषियों की प्रार्थना से राजा पृथु बने और पृथ्वी से समस्त ओषधियों का दोहन कर प्रजा का कल्याण किया। इन प्रारम्भिक अवतारों में भगवान ने तप, ज्ञान, संयम और धर्म के विविध रूपों को स्थापित किया।
कालचक्र आगे बढ़ा। चाक्षुष मन्वन्तर के अंत में जब त्रिलोकी जल में डूब रही थी, तब भगवान ने मत्स्य अवतार धारण कर वैवस्वत मनु की रक्षा की और पृथ्वी रूपी नौका को सुरक्षित मार्ग दिया। समुद्र-मंथन के समय कूर्म रूप में मन्दराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण किया।
धन्वन्तरि बनकर अमृत लेकर प्रकट हुए और मोहिनी रूप से दैत्यों को मोहित कर देवताओं को अमृत पिलाया। फिर नरसिंह बनकर हिरण्यकशिपु का संहार किया और भक्त प्रह्लाद की रक्षा की। वामन रूप में दैत्यराज बलि से तीन पग भूमि माँगकर त्रिलोकी को पुनः देवों को दिलाया।
परशुराम बनकर इक्कीस बार पृथ्वी को अधर्मी क्षत्रियों से शून्य किया। व्यासरूप में वेदों का विभाजन कर ज्ञान की रक्षा की। रामावतार में सेतुबंध और रावणवध कर मर्यादा की स्थापना की। यदुवंश में बलराम और श्रीकृष्ण के रूप में अवतीर्ण होकर पृथ्वी का भार उतारा। इनमें श्रीकृष्ण स्वयं अवतारी भगवान माने गए हैं, अन्य सब अंशावतार हैं। इस युग के अंत में विष्णुयश ब्राह्मण के घर कल्कि रूप में प्रकट होकर अधर्मी, लुटेरे राजाओं का संहार करेंगे।
जैसे विशाल सरोवर से असंख्य धाराएँ निकलती हैं, वैसे ही भगवान के अनगिनत अवतार होते हैं। ऋषि, मनु, देवता और प्रजापति सब उनके अंश हैं। जब-जब अधर्म बढ़ता है और प्रजा व्याकुल होती है, तब-तब भगवान युग-युग में विविध रूप धारण कर धर्म की पुनः स्थापना करते हैं यही उनकी अनन्त लीला है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-भागवत पुराण में भगवान के कितने प्रमुख अवतारों का वर्णन किया गया है?
भागवत पुराण में भगवान के प्रमुख अवतारों का वर्णन किया गया है। इस प्रसंग में सनकादि कुमार, वराह, नारद, नर-नारायण, कपिल, दत्तात्रेय, यज्ञ, ऋषभदेव, पृथु, मत्स्य, कूर्म, धन्वन्तरि, मोहिनी, नरसिंह, वामन, परशुराम, व्यास, राम, बलराम-श्रीकृष्ण और कल्कि का उल्लेख है।
2-भगवान ने वराह अवतार क्यों लिया था?
पृथ्वी के रसातल में चले जाने पर भगवान ने वराह रूप धारण किया और पृथ्वी को उठाकर पुनः स्थापित किया।
3-भगवान के नरसिंह अवतार का उद्देश्य क्या था?
नरसिंह रूप में भगवान ने हिरण्यकशिपु का वध किया और भक्त प्रह्लाद की रक्षा की। यह अवतार भक्त की रक्षा और अधर्म के विनाश से जुड़ा है।
4-भगवान के वामन अवतार में क्या हुआ था?
वामन रूप में भगवान ने दैत्यराज बलि से तीन पग भूमि मांगी। तीन पगों में उन्होंने त्रिलोकी को नाप लिया और देवताओं को उनका अधिकार वापस दिलाया।
5-भगवान के अवतारों का मुख्य उद्देश्य क्या बताया गया है?
भगवान के अवतार धर्म की रक्षा, अधर्म के विनाश, भक्तों के कल्याण और लोकव्यवस्था की स्थापना के लिए होते हैं। भागवत पुराण में यह भी बताया गया है कि भगवान के अवतार अनंत हैं।









