तीर्थयात्रा पूर्ण कर विदुरजी हस्तिनापुर लौटे। महर्षि मैत्रेय से आत्मा का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर उनका मन पूर्णतः शांत और विरक्त हो चुका था। वे बाह्य रूप से सरल और संयमी दिखाई देते थे, किन्तु भीतर से पूर्ण ब्रह्मनिष्ठ हो चुके थे।
पांडवों ने विदुर जी का किया स्वागत-
उनके आगमन का समाचार मिलते ही धर्मराज युधिष्ठिर सहित समस्त पाण्डव, धृतराष्ट्र, गान्धारी, कुन्ती, द्रौपदी, सुभद्रा, उत्तरा तथा समस्त परिवार अत्यंत हर्षित हो उठा। सभी लोग मानो प्राणहीन शरीर में पुनः चेतना आ जाने के समान आनन्द अनुभव करते हुए उनके स्वागत के लिए आगे बढ़े।
सबने उन्हें प्रेमपूर्वक आलिंगन किया, चरण स्पर्श किया और आदर सहित आसन प्रदान किया। युधिष्ठिर ने विनम्रतापूर्वक उनसे तीर्थयात्रा के अनुभव, जीवन-निर्वाह की विधि तथा विभिन्न पवित्र स्थलों के विषय में प्रश्न किए।
उन्होंने यह भी पूछा कि क्या वे द्वारका गए थे और वहाँ भगवान श्रीकृष्ण तथा यादवों का कुशल समाचार क्या है। विदुरजी ने अपने अनुभवों का क्रमशः वर्णन किया, परन्तु यदुवंश के विनाश की अत्यंत दुःखद घटना को उन्होंने जानबूझकर छिपा लिया।
उनका करुणामय हृदय पाण्डवों को दुःखी नहीं देख सकता था, इसलिए उन्होंने वह समाचार प्रकट नहीं किया। कुछ समय तक विदुरजी हस्तिनापुर में ही रहकर अपने बड़े भाई धृतराष्ट्र तथा समस्त परिवार का कल्याण करते रहे। इस बीच पाण्डव राज्य के कार्यों और गृहस्थ जीवन में प्रवृत्त होकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे।
विदुरजी ने धृतराष्ट्र को वैराग्य का उपदेश क्यों दिया?
किन्तु इस सुख और व्यवस्था के बीच वे यह भूलने लगे कि जीवन निरंतर काल के अधीन है और प्रत्येक क्षण मृत्यु की ओर अग्रसर हो रहा है। विदुरजी ने इस सत्य को स्पष्ट रूप से पहचान लिया था। एक दिन उन्होंने धृतराष्ट्र को एकांत में बुलाकर अत्यंत स्पष्ट और कठोर शब्दों में उपदेश दिया। उन्होंने कहा कि अब समय अत्यंत समीप है और काल का प्रभाव सब पर छा रहा है। मनुष्य चाहे जितना प्रयास करे, वह काल से बच नहीं सकता।
उन्होंने धृतराष्ट्र को उनके जीवन की वास्तविक स्थिति का बोध कराया कि उनके सभी पुत्र, बन्धु और सगे-संबंधी नष्ट हो चुके हैं, शरीर वृद्ध और दुर्बल हो गया है, और वे उन्हीं लोगों के घर में आश्रित होकर रह रहे हैं, जिनके साथ उन्होंने कभी अन्याय किया था।
विदुरजी ने उन्हें झकझोरते हुए कहा कि यह अत्यंत लज्जाजनक स्थिति है कि वे अब भी जीवन के मोह में पड़े हुए हैं। जिन पाण्डवों को उन्होंने अनेक बार कष्ट पहुँचाया, उन्हीं के अन्न पर जीवन निर्वाह करना किसी प्रकार का गौरव नहीं है। उन्होंने यह भी समझाया कि यह शरीर नश्वर है, यह धीरे-धीरे क्षीण होता जा रहा है और इससे कोई स्थायी लाभ नहीं हो सकता।
इसलिए इस पर मोह करना व्यर्थ है। उन्होंने धृतराष्ट्र को वैराग्य का उपदेश देते हुए कहा कि जो मनुष्य संसार को दुःखरूप समझकर उससे विरक्त हो जाता है और भगवान का स्मरण करते हुए घर छोड़ देता है, वही वास्तव में बुद्धिमान और श्रेष्ठ पुरुष है।
उन्होंने यह भी कहा कि मनुष्य को अपने कुटुम्बियों के मोह से छिपकर ही घर त्याग देना चाहिए, ताकि वह निर्बाध रूप से भगवान के मार्ग पर अग्रसर हो सके। विदुरजी के इन वचनों का धृतराष्ट्र पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनके भीतर ज्ञान का प्रकाश हुआ और उन्होंने अपने जीवन के सत्य को स्वीकार किया।
धृतराष्ट्र और गान्धारी वन क्यों चले गए?
धृतराष्ट्र ने मोह, ममता और आसक्ति के बन्धनों को काट दिया और विदुरजी के मार्गदर्शन में गुप्त रूप से वन की ओर प्रस्थान कर दिया। जब पतिव्रता गान्धारी ने यह देखा कि उनके पति संन्यास के मार्ग पर अग्रसर हो गए हैं, तब उन्होंने भी अपने धर्म का पालन करते हुए उनके पीछे-पीछे वनगमन किया।
प्रातःकाल जब युधिष्ठिर अपने नित्य कर्मों से निवृत्त होकर धृतराष्ट्र, गान्धारी और विदुर से मिलने पहुँचे, तब वे उन्हें वहाँ नहीं पाए। वे अत्यंत व्याकुल हो उठे और संजय से उनके विषय में पूछने लगे। संजय स्वयं अपने स्वामी के वियोग से दुःखी थे और उन्हें कुछ भी ज्ञात नहीं था। उसी समय देवर्षि नारद वहाँ पधारे।
युधिष्ठिर ने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया और अपने चाचाओं तथा गान्धारी के विषय में जानकारी प्राप्त करने की प्रार्थना की। नारदजी ने उन्हें समझाया कि इस संसार में किसी के लिए शोक करना उचित नहीं है, क्योंकि यह समस्त जगत ईश्वर की इच्छा के अधीन है।
वही जीवों का संयोग और वियोग कराता है। उन्होंने उदाहरण देकर समझाया कि जैसे खिलौनों का मिलना और बिछुड़ना खेलने वाले की इच्छा पर निर्भर करता है, वैसे ही संसार में सभी घटनाएँ भगवान की इच्छा से ही घटित होती हैं। इसलिए मोह और शोक करना अज्ञान का लक्षण है।
धृतराष्ट्र ने सप्तस्त्रोत में कैसी तपस्या की?
नारदजी ने आगे बताया कि धृतराष्ट्र, गान्धारी और विदुर हिमालय के दक्षिण भाग में स्थित ‘सप्तस्त्रोत’ नामक पवित्र स्थान पर पहुँच गए हैं। वहाँ वे तपस्या और योगाभ्यास में लीन हैं। धृतराष्ट्र ने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है और अब वे पूर्णतः वैराग्य में स्थित हैं। वे केवल जल का सेवन करते हुए ध्यान में लीन रहते हैं और अपने समस्त विकारों का त्याग कर चुके हैं।
नारदजी ने यह भी बताया कि आज से पाँचवें दिन वे अपने शरीर का परित्याग कर देंगे और वह जलकर भस्म हो जायगा। गार्हपत्यादि अग्नियों के द्वारा पर्णकुटी के साथ अपने पति के मृत देह की जलते देखकर बाहर खड़ी हुई साध्वी गान्धारी भी पति का अनुगमन करती हुई उसी आग में प्रवेश कर जायँगी।
विदुर इस घटना को देखकर पुनः तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़ेंगे। यह सब सुनकर युधिष्ठिर का शोक शांत हो गया। उन्होंने समझ लिया कि संसार में सब कुछ ईश्वर की इच्छा से ही होता है और मनुष्य को उसी के अनुसार आचरण करना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-विदुरजी ने धृतराष्ट्र को वन जाने की सलाह क्यों दी?
विदुरजी ने उन्हें जीवन की नश्वरता, काल की अनिवार्यता और संसार के मोह का बोध कराया। इसके बाद धृतराष्ट्र ने वैराग्य अपनाकर वन जाने का निर्णय लिया।
2-धृतराष्ट्र के वन जाने के बाद गान्धारी ने क्या किया?
गान्धारी अपने पति के साथ वन चली गईं और उनके वनगमन में साथ दिया।
3-धृतराष्ट्र, गान्धारी और विदुर कहाँ गए थे?
वे हिमालय के दक्षिण भाग में स्थित सप्तस्त्रोत नामक पवित्र स्थान पर गए थे।
4-नारदजी ने युधिष्ठिर को संसार के संयोग-वियोग के बारे में क्या समझाया?
नारदजी ने समझाया कि संसार में जीवों का मिलना और बिछुड़ना ईश्वर की इच्छा के अधीन है, इसलिए मोह और शोक में डूबना उचित नहीं है।
5-धृतराष्ट्र के वैराग्य का क्या परिणाम हुआ?
धृतराष्ट्र ने मोह और आसक्ति त्यागकर तपस्या तथा योग का मार्ग अपनाया और अपने जीवन के अंतिम समय को आध्यात्मिक साधना में लगाया।









