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भागवत पुराण, प्रथम स्कंध (13) - श्रीकृष्ण ने छोड़ा हस्तिनापुर : पाण्डवों का विरह और द्वारका यात्रा

महाभारत युद्ध के बाद श्रीकृष्ण कई महीनों तक हस्तिनापुर में रहे। फिर द्वारका लौटते समय पाण्डवों और हस्तिनापुरवासियों का विरह, विदाई और भगवान की यात्रा का प्रसंग सामने आता है।

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Shri Krishna Hastinapur to Dwarka

महाभारत युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण और भीष्म पितामह के उपदेश से शोक और मोह का त्याग कर राज्य संभाला। श्रीकृष्ण कई महीनों तक हस्तिनापुर में रहकर पाण्डवों और अपने संबंधियों को सांत्वना देते रहे। जब वे द्वारका लौटने लगे, तब पाण्डवों और हस्तिनापुर-वासियों का हृदय विरह से भर गया और वे दूर तक भगवान के साथ चले।

युधिष्ठिर ने धर्मपूर्वक संभाला राज्य-

पिछले प्रसंग में भीष्म पितामह द्वारा धर्मोपदेश और भगवान श्रीकृष्ण के स्मरण में उनके देह त्याग का वर्णन हुआ। अब आगे की कथा में धर्मराज युधिष्ठिर के राज्य संचालन और भगवान श्रीकृष्ण के द्वारका गमन का प्रसंग आता है।

महाभारत युद्ध के उपरांत जब धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने शोक और मोह को त्यागकर राज्य संभाला, तब भगवान श्रीकृष्ण की कृपा और भीष्म पितामह के उपदेशों से उनके अंतःकरण में ज्ञान का उदय हुआ और उनकी भ्रांति दूर हो गई। भगवान के आश्रय में रहकर उन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी का शासन इन्द्र के समान धर्मपूर्वक किया।

उनके राज्य में समयानुसार वर्षा होती थी, पृथ्वी पर सभी आवश्यक वस्तुएँ प्रचुर मात्रा में उत्पन्न होती थीं और गौएँ प्रसन्न होकर भरपूर दूध देती थीं। नदियाँ, वनस्पतियाँ और पर्वत भी अपनी-अपनी संपदा से समृद्ध होकर प्रजा के कल्याण में सहायक थे।

उस समय किसी भी प्राणी को दैहिक, दैविक या भौतिक कष्ट नहीं होता था। भगवान श्रीकृष्ण अपने बंधुओं के शोक को दूर करने और अपनी बहन सुभद्रा को प्रसन्न करने के लिए कई महीनों तक हस्तिनापुर में रहे। इसके बाद जब उन्होंने द्वारका लौटने की इच्छा प्रकट की, तब युधिष्ठिर ने उन्हें हृदय से लगाकर विदा की अनुमति दी।

भगवान के प्रस्थान के समय सभी उपस्थित जन अत्यंत भावविभोर हो उठे। किसी ने उनका आलिंगन किया, किसी ने चरण स्पर्श कर प्रणाम किया। सुभद्रा, द्रौपदी, कुन्ती, उत्तरा, गान्धारी, धृतराष्ट्र और अन्य सभी उन्हें विदा करते समय विरह से व्याकुल हो गए।

श्रीकृष्ण के द्वारका लौटने पर पाण्डव हुए विरह से व्याकुल-

भगवान श्रीकृष्ण के साथ रहने, उनके दर्शन, स्पर्श, वार्तालाप और साथ-साथ जीवन व्यतीत करने से पाण्डवों का हृदय पूर्णतः उनके प्रति समर्पित हो चुका था। इसलिए उनका वियोग सहन करना उनके लिए अत्यंत कठिन था। वे प्रेमवश उन्हें निहारते रहते और उनके पीछे-पीछे चल पड़ते थे। जब भगवान रथ पर आरूढ़ हुए, तब उनके प्रस्थान के समय शंख, मृदंग, नगारे और अन्य वाद्य बजने लगे। कुरुवंश की स्त्रियाँ अटारियों पर चढ़कर प्रेम, लज्जा और आनंद से युक्त दृष्टि से भगवान को निहारती हुई उन पर पुष्पों की वर्षा करने लगीं।

अर्जुन ने अपने प्रिय सखा श्रीकृष्ण के ऊपर श्वेत छत्र धारण किया, जिसकी मोतियों से सुसज्जित झालरें लटक रही थीं। उद्धव और सात्यकि चँवर डुलाते हुए उनके साथ चल रहे थे। मार्ग में ब्राह्मणों के मंगलमय आशीर्वाद सुनाई पड़ रहे थे और चारों ओर से पुष्पों की वर्षा हो रही थी।

हस्तिनापुर की स्त्रियाँ भगवान की महिमा का वर्णन करते हुए कहने लगीं कि ये वही सनातन परम पुरुष हैं, जो सृष्टि के प्रारम्भ से पूर्व भी अपने अद्वितीय स्वरूप में स्थित रहते हैं। वही अपनी लीला से सृष्टि की रचना, पालन और संहार करते हैं। वे ही परमात्मा भक्ति के द्वारा शुद्ध हृदय में साक्षात् होते हैं और जिनकी लीलाओं का वर्णन वेदों और महर्षियों ने किया है।

हस्तिनापुर की स्त्रियों ने श्रीकृष्ण की महिमा का किया गुणगान-

जब अधर्म बढ़ता है, तब यही भगवान विभिन्न अवतार धारण करके धर्म की स्थापना करते हैं और संसार का कल्याण करते हैं। स्त्रियों ने यदुवंश और ब्रजभूमि की भी प्रशंसा की, जहाँ भगवान ने जन्म लेकर अपनी लीलाओं से उसे पवित्र किया।

उन्होंने द्वारका की महिमा का भी वर्णन किया, जहाँ की प्रजा भगवान के सान्निध्य का सुख प्राप्त करती है। उन्होंने भगवान की पत्नियों को धन्य बताया, जिन्होंने भगवान की सेवा और प्रेम का अद्वितीय सौभाग्य प्राप्त किया। उनके अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का पूर्ण वर्णन करना किसी के लिए भी संभव नहीं है।

इस प्रकार स्त्रियाँ भगवान की महिमा का गान कर ही रही थीं कि भगवान श्रीकृष्ण ने मधुर मुस्कान और कृपापूर्ण दृष्टि से उनका अभिवादन किया और वहाँ से प्रस्थान किया। धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान की सुरक्षा के लिए हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेना उनके साथ भेजी।

पाण्डव स्नेहवश भगवान के साथ बहुत दूर तक गए और विरह के कारण अत्यंत व्याकुल हो उठे। अंततः भगवान ने उन्हें समझाकर वापस भेजा और स्वयं सात्यकि तथा उद्धव के साथ द्वारका की ओर प्रस्थान किया। भगवान श्रीकृष्ण मार्ग में अनेक देशों और प्रदेशों को पार करते हुए आगे बढ़े। जहाँ-जहाँ वे पहुँचे, वहाँ के लोग उन्हें उपहार अर्पित कर उनका स्वागत करते थे।

द्वारका की ओर चले कृष्ण -

सायंकाल होने पर वे रथ से उतरकर जलाशयों के समीप संध्या-वंदन करते थे- यह उनका नित्य नियम था। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण प्रेमी भक्तों को आश्वासन देकर और उन्हें विरह में छोड़कर द्वारका की ओर प्रस्थान करते हैं, जबकि पाण्डव और हस्तिनापुरवासी उनके स्मरण में निमग्न हो जाते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1-भगवान श्रीकृष्ण महाभारत युद्ध के बाद हस्तिनापुर में कितने समय तक रहे?

भगवान श्रीकृष्ण अपने बंधुओं के शोक को दूर करने और सुभद्रा को प्रसन्न करने के लिए कई महीनों तक हस्तिनापुर में रहे।

2-श्रीकृष्ण के द्वारका लौटने पर पाण्डवों की क्या स्थिति हुई?

श्रीकृष्ण से अत्यधिक प्रेम और उनके साथ लंबे समय तक रहने के कारण पाण्डव उनके वियोग से अत्यंत व्याकुल हो गए और उन्हें बहुत दूर तक विदा करने के लिए साथ चले।

3-श्रीकृष्ण के साथ द्वारका जाते समय कौन उनके साथ थे?

भगवान श्रीकृष्ण के साथ सात्यकि और उद्धव द्वारका की ओर गए।

4-हस्तिनापुर की स्त्रियों ने श्रीकृष्ण की किस रूप में स्तुति की?

उन्होंने श्रीकृष्ण को सनातन परम पुरुष और परमात्मा बताते हुए उनकी सृष्टि-रचना, पालन, संहार तथा विभिन्न अवतारों की महिमा का वर्णन किया।

5-भगवान श्रीकृष्ण यात्रा के दौरान संध्या के समय क्या करते थे?

सायंकाल होने पर भगवान श्रीकृष्ण रथ से उतरकर जलाशयों के समीप संध्या-वंदन करते थे। यह उनका नित्य नियम था।

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