हस्तिनापुर से विदा लेकर भगवान श्रीकृष्ण द्वारका की ओर प्रस्थान करते हैं। द्वारका पहुंचने पर प्रजा और प्रियजन उनके स्वागत के लिए उमड़ पड़ते हैं। भगवान सभी से प्रेमपूर्वक मिलते हैं और अपने दिव्य स्वरूप से पूरी द्वारका को आनंदित कर देते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण के द्वारका पहुंचने पर प्रजा ने कैसे किया स्वागत?
पिछले प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण हस्तिनापुर से विदा लेकर द्वारका की ओर प्रस्थान करते हैं। अब आगे की कथा में उनके द्वारका पहुँचने पर हुए भव्य स्वागत और अपने प्रियजनों से मिलन का वर्णन है। जब भगवान श्रीकृष्ण अपने आनर्त देश में पहुँचे, तब उन्होंने अपना दिव्य पांचजन्य शंख बजाया।
उनके अधरों की लाली से लाल हुआ वह श्वेत शंख उनके करकमलों में अत्यंत मनोहर प्रतीत हो रहा था। उसकी ध्वनि सुनते ही समस्त द्वारका नगरी आनंद और उत्साह से भर उठी।
प्रजा अपने प्रिय स्वामी के दर्शन की लालसा में नगर के बाहर उमड़ पड़ी। भगवान पूर्णकाम और आत्माराम होते हुए भी अपने भक्तों के प्रेम को स्वीकार करते हैं। लोगों ने भेंट और उपहारों के साथ उनका स्वागत किया और प्रेमपूर्वक उनकी स्तुति करने लगे।
वे भगवान से प्रार्थना करते हुए कहने लगे कि उनके चरणकमल ही उनके जीवन का आश्रय हैं। वे ही उनके माता, पिता, गुरु और रक्षक हैं। भगवान के दर्शन को वे अपना परम सौभाग्य मानते थे और उनके बिना एक क्षण भी उन्हें असह्य प्रतीत होता था।
द्वारका को भगवान के स्वागत के लिए कैसे सजाया गया?
भगवान श्रीकृष्ण कृपापूर्ण दृष्टि से सब पर अनुग्रह करते हुए द्वारका में प्रवेश करते हैं। वह नगरी अत्यंत सुरक्षित और समृद्ध थी, जहाँ यादवों के पराक्रम से चारों ओर सुरक्षा थी। नगर में सुंदर उद्यान, पुष्पवाटिकाएँ, सरोवर और सुशोभित मार्ग थे। भगवान के स्वागत के लिए द्वारका को विशेष रूप से सजाया गया था।
राजमार्गों को स्वच्छ करके सुगंधित जल से सींचा गया था। द्वारों पर कलश, धूप, दीप, फल और पुष्प सजाए गए थे तथा ध्वजा-पताकाएँ चारों ओर लहरा रही थीं। जब यह समाचार फैला कि भगवान श्रीकृष्ण पधार रहे हैं, तब वसुदेव, अक्रूर, उग्रसेन, बलराम, प्रद्युम्न और अन्य सभी बंधु अत्यंत प्रसन्न हो उठे।
वे अपने सभी कार्य छोड़कर भगवान की अगवानी के लिए निकल पड़े। ब्राह्मणों के मंगलगान, शंख और नगाड़ों की ध्वनि से वातावरण गुंजायमान हो उठा। नट, गायक, सूत, मागध और वंदीजनों भगवान के चरित्रों का गान करते हुए आगे बढ़ रहे थे।
साथ ही अनेक स्त्रियाँ, जिनके मुख आभूषणों से शोभायमान थे, पालकियों में बैठकर भगवान के दर्शन के लिए चलीं। भगवान श्रीकृष्ण ने सभी से उनकी योग्यता के अनुसार मिलकर उनका सम्मान किया। किसी को प्रणाम किया, किसी को आलिंगन दिया, किसी से मधुर वचन कहे और किसी को केवल प्रेमपूर्ण दृष्टि से देखकर संतुष्ट किया।
इस प्रकार उन्होंने सभी को प्रसन्न कर दिया। जब भगवान राजमार्ग से नगर में प्रवेश कर रहे थे, तब द्वारका की स्त्रियाँ अटारियों पर चढ़कर उनके दर्शन करने लगीं। उनके लिए भगवान का दर्शन ही परम आनंद का स्रोत था। भगवान का स्वरूप अत्यंत मनोहर था।
उनका वक्षस्थल लक्ष्मी का निवास, मुख कमल के समान सुंदर, भुजाएँ शक्तिशाली और चरणकमल भक्तों के आश्रय थे। पीताम्बर और वनमाला से अलंकृत वे ऐसे प्रतीत हो रहे थे, मानो श्याम मेघ पर सूर्य, चन्द्र और इन्द्रधनुष एक साथ सुशोभित हों।
श्रीकृष्ण का माता-पिता और रानियों से कैसे हुआ मिलन?
भगवान सबसे पहले अपने माता-पिता के महल में गए और देवकी आदि माताओं को प्रणाम किया। माताओं ने उन्हें स्नेहपूर्वक हृदय से लगा लिया। उनके प्रेम और आनंद का ऐसा वेग था कि उनकी आँखों से आँसू बहने लगे और वे अपने पुत्र का बार-बार आलिंगन करती रहीं।
इसके पश्चात भगवान अपने महल में गए, जहाँ उनकी सोलह हजार रानियाँ निवास करती थीं। अपने प्रियतम को लंबे समय बाद सामने देखकर उनके हृदय आनंद से भर उठे। वे लज्जा और प्रेम से अभिभूत होकर पहले मन में, फिर दृष्टि से और अंततः शरीर से उनका आलिंगन करने लगीं।
उनके नेत्रों से प्रेमाश्रु बहने लगे, जिन्हें वे संकोचवश रोकना चाहती थीं, परंतु वे रुक न सके। यद्यपि भगवान सदैव उनके साथ रहते थे, फिर भी उनका स्वरूप उन्हें प्रत्येक क्षण नया और अद्भुत प्रतीत होता था। भगवान श्रीकृष्ण अपनी लीलाओं में अनेक रानियों के साथ रहते हुए भी पूर्णतः असंग रहते हैं।
वे संसार के कार्यों में स्थित होकर भी उनसे लिप्त नहीं होते। जैसे वायु बाँसों के संघर्ष से अग्नि उत्पन्न कर उन्हें जला देती है, वैसे ही भगवान ने पृथ्वी के भार रूप दुष्ट राजाओं का नाश करवाकर संसार को संतुलित किया।
भगवान श्रीकृष्ण की दिव्यता-
भगवान की यही विशेषता है कि वे मनुष्य रूप में लीला करते हुए भी अपनी दिव्यता को बनाए रखते हैं। सामान्य लोग उन्हें अपने समान समझ लेते हैं, परंतु वे वास्तव में परमेश्वर हैं, जो अपनी माया से जगत का संचालन करते हैं। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण द्वारका में प्रवेश कर अपने भक्तों और परिजनों को आनंद प्रदान करते हैं और अपनी दिव्य लीलाओं से समस्त जगत को कृतार्थ करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-भगवान श्रीकृष्ण द्वारका पहुंचने पर सबसे पहले क्या किया?
भगवान श्रीकृष्ण ने आनर्त देश में पहुंचकर अपना पांचजन्य शंख बजाया। शंख की ध्वनि सुनकर द्वारका की प्रजा उनके स्वागत के लिए उमड़ पड़ी।
2-द्वारका की प्रजा ने भगवान श्रीकृष्ण का स्वागत कैसे किया?
प्रजा ने भेंट और उपहार अर्पित करके भगवान का स्वागत किया और प्रेमपूर्वक उनकी स्तुति की।
3-भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारका में अपने परिजनों से कैसे मुलाकात की?
भगवान ने अपने परिजनों से उनकी योग्यता के अनुसार मिलकर उनका सम्मान किया। उन्होंने किसी को प्रणाम किया, किसी को आलिंगन दिया और किसी से मधुर वचन कहे।
4-भगवान श्रीकृष्ण की माताओं ने उनका स्वागत कैसे किया?
देवकी आदि माताओं ने भगवान को स्नेहपूर्वक हृदय से लगा लिया। प्रेम और आनंद के कारण उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
5-भगवान श्रीकृष्ण द्वारका की रानियों से मिलकर भी असंग कैसे रहे?
भगवान संसार के कार्यों में रहते हुए भी उनसे आसक्त नहीं होते। वे अपनी दिव्यता बनाए रखते हुए अपनी लीलाएँ करते हैं और किसी सांसारिक बंधन में नहीं बंधते।









