श्रीमद्भागवत में एक अत्यंत प्रेरणादायक प्रसंग आता है, जब देवर्षि नारद स्वयं अपने पूर्व जन्म का रहस्य महर्षि वेदव्यास को बताते हैं। यह कथा केवल नारद जी के जीवन का इतिहास नहीं, बल्कि भक्ति की महिमा का जीवंत प्रमाण है। इसमें बताया गया है कि कैसे एक साधारण दासी का पुत्र भी संतों की सेवा, सत्संग और भगवान के नाम-स्मरण के प्रभाव से महान देवर्षि बन सकता है।
संतों की सेवा से प्रारम्भ हुआ भक्ति का बीज-
देवर्षि नारद ने व्यासजी से कहा कि पिछले कल्प में वे वेदवादी ब्राह्मणों की एक दासी के पुत्र थे। वर्षा ऋतु के समय अनेक योगी और महात्मा एक स्थान पर चातुर्मास्य करने के लिए ठहरे थे। उसी समय बालक अवस्था में उन्हें उन महात्माओं की सेवा में लगा दिया गया। यद्यपि वे बहुत छोटे थे, फिर भी वे चंचलता से दूर रहते थे, इन्द्रियों पर नियंत्रण रखते थे और खेलकूद की अपेक्षा संतों की सेवा में ही आनंद अनुभव करते थे। वे बहुत कम बोलते थे और मुनियों की आज्ञा का विनम्रता से पालन करते थे।
उनके इस विनम्र स्वभाव को देखकर समदर्शी महात्मा उन पर अत्यंत प्रसन्न हुए। वे अपने पात्रों में लगे हुए प्रसाद को खाने की अनुमति देते थे और नारद बालक प्रतिदिन थोड़ा-सा वही प्रसाद ग्रहण करते थे। उस प्रसाद के प्रभाव से उनके हृदय के पाप धुलने लगे और धीरे-धीरे उनका मन शुद्ध होता गया। संतों की सेवा करते-करते उनके हृदय में भक्ति का अंकुर फूट पड़ा।
उन महात्माओं की दिनचर्या में भगवान के भजन, कीर्तन और श्रीकृष्ण की लीलाओं का गान होता था। बालक नारद श्रद्धापूर्वक उन कथाओं को सुनते रहते थे। प्रत्येक पद को ध्यान से सुनते-सुनते उनके हृदय में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गहरी रुचि उत्पन्न हो गई। जब यह रुचि दृढ़ हो गई, तब उनकी बुद्धि भी स्थिर हो गई और वे इस सम्पूर्ण जगत को माया द्वारा अपने परमात्मस्वरूप आत्मा में कल्पित देखने लगे।
संतों का उपदेश और कर्मों को भगवान को समर्पित करने का रहस्य-
नारद जी बताते हैं कि वर्षा और शरद इन दो ऋतुओं तक वे संतों के साथ रहे। उन महात्माओं ने दिन-रात श्रीहरि के निर्मल यश का संकीर्तन किया और वे प्रेम से उसे सुनते रहे। इससे उनके हृदय में भक्ति का उदय हुआ, जिसने रजोगुण और तमोगुण का नाश कर दिया। वे अत्यंत विनयी, संयमी और आज्ञाकारी बन गए। जब चातुर्मास समाप्त हुआ और महात्मा जाने लगे, तब उन्होंने कृपा करके उन्हें वह गुह्य ज्ञान प्रदान किया, जिसका उपदेश स्वयं भगवान ने अपने श्रीमुख से किया था।
उस ज्ञान से नारद जी समझ गए कि भगवान श्रीकृष्ण की माया किस प्रकार इस संसार की रचना करती है। उन्होंने यह भी जाना कि समस्त कर्मों को भगवान को समर्पित कर देना ही संसार के तीनों तापों की सर्वोत्तम औषधि है। उन्होंने एक सुंदर उदाहरण दिया। जिस पदार्थ से रोग उत्पन्न होता है, वही उचित विधि से उपयोग करने पर उस रोग का उपचार भी कर देता है। इसी प्रकार कर्म ही मनुष्य को संसार के बंधन में डालते हैं, पर जब वही कर्म भगवान को अर्पित कर दिए जाते हैं तो उनका बंधन समाप्त हो जाता है।
जो कर्म भगवान की प्रसन्नता के लिए किए जाते हैं, उनसे भक्ति और ज्ञान दोनों की प्राप्ति होती है। उस मार्ग पर चलने वाले साधक बार-बार भगवान के नाम और गुणों का स्मरण करते हैं—“प्रभो! वासुदेव को नमस्कार है, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और संकर्षण को प्रणाम है।” इस प्रकार भगवान की चतुर्व्यूह मूर्तियों का स्मरण करते हुए उनका पूजन किया जाता है। यही सच्चा ज्ञान है।
माँ की मृत्यु और बालक नारद की आध्यात्मिक यात्रा-
संतों के चले जाने के बाद नारद अपनी माँ के साथ रहने लगे। वे उनकी एकमात्र संतान थे। उनकी माँ अत्यंत स्नेह करती थीं, परंतु दासी होने के कारण असहाय थीं। नारद उस समय केवल पाँच वर्ष के थे। उन्हें दिशा, देश और काल का ज्ञान भी नहीं था। एक दिन रात के समय उनकी माँ गौ दुहने के लिए बाहर गईं। रास्ते में एक सर्प ने उन्हें डस लिया और उनकी मृत्यु हो गई। नारद ने इसे भी भगवान की कृपा माना, क्योंकि इससे संसार का बंधन टूट गया।
इसके बाद वे उत्तर दिशा की ओर निकल पड़े। मार्ग में उन्होंने अनेक नगर, गाँव, वन, पर्वत, नदियाँ और सुंदर जलाशय देखे। कहीं कमलों से भरे सरोवर थे, जिन पर पक्षी मधुर स्वर में बोल रहे थे और भौंरे मंडरा रहे थे। यह सब देखते हुए वे आगे बढ़ते गए। अंततः वे एक घने और भयावह जंगल में पहुँचे, जहाँ बाँस, नरकट और कुश के झुरमुट थे तथा सर्प, उल्लू और सियार जैसे भयंकर जीव रहते थे। लंबी यात्रा से वे अत्यंत थक गए थे और उन्हें तीव्र प्यास लगी। तभी उन्हें एक नदी दिखाई दी। उन्होंने उसमें स्नान किया, जल पिया और आचमन किया। इससे उनकी थकान दूर हो गई।
ध्यान में भगवान के दर्शन और दिव्य वाणी का उपदेश-
उस निर्जन वन में एक पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर नारद जी ने उन संतों की शिक्षा के अनुसार अपने हृदय में स्थित परमात्मा का ध्यान करना आरंभ किया। जैसे ही उन्होंने भक्ति भाव से भगवान के चरणों का ध्यान किया, उनकी आँखों से आँसू बहने लगे और हृदय में प्रेम उमड़ पड़ा। उसी क्षण भगवान का दिव्य स्वरूप उनके हृदय में प्रकट हुआ। उस दर्शन से उनका शरीर रोमांचित हो गया और हृदय अत्यंत शांत और आनंद से भर गया।
परंतु अचानक वह दिव्य रूप अदृश्य हो गया। नारद अत्यंत व्याकुल हो उठे और बार-बार ध्यान करके उस रूप को देखने का प्रयास करने लगे, पर उन्हें पुनः दर्शन नहीं हुआ। तभी आकाश में भगवान की गंभीर और मधुर वाणी सुनाई दी-“हे बालक! इस जन्म में तुम मेरा प्रत्यक्ष दर्शन नहीं कर पाओगे। जिनकी वासनाएँ पूर्णतया शांत नहीं हुई हैं, उनके लिए मेरा दर्शन अत्यंत दुर्लभ है।
मैंने तुम्हें केवल एक बार अपनी झलक इसलिए दिखलाई है कि तुम्हारे हृदय में मुझे प्राप्त करने की तीव्र लालसा जाग्रत हो जाए। संतों की थोड़ी-सी सेवा से ही तुम्हारा मन मुझमें स्थिर हो गया है। अब इस जीवन के अंत में तुम मेरे पार्षद बन जाओगे और तुम्हारी यह स्मृति कभी नष्ट नहीं होगी।”
देवर्षि नारद का दिव्य स्वरूप और अखण्ड भगवद्भजन-
भगवान की इस कृपा से नारद का हृदय पूर्ण रूप से भगवान में लग गया। उन्होंने लज्जा और संकोच छोड़कर भगवान के मधुर नामों और लीलाओं का निरंतर कीर्तन करना आरंभ कर दिया। उनके हृदय से स्पृहा, अहंकार और मत्सर समाप्त हो चुके थे। वे आनंदपूर्वक पृथ्वी पर विचरण करते हुए भगवान का स्मरण करते रहे और काल की प्रतीक्षा करने लगे।
कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हुई और उनके पंचभौतिक शरीर का अंत हो गया। तब उन्हें भगवान का पार्षद स्वरूप प्राप्त हुआ। कल्प के अंत में जब भगवान नारायण प्रलयकालीन जल में शयन कर रहे थे और ब्रह्माजी उनकी नाभि से उत्पन्न होकर सृष्टि में प्रवेश करने लगे, तब उनके श्वास के साथ नारद भी उनके हृदय में प्रवेश कर गए। एक सहस्र चतुर्युगी के पश्चात जब ब्रह्मा ने पुनः सृष्टि की, तब उनकी इन्द्रियों से मरीचि आदि ऋषियों के साथ नारद भी प्रकट हुए।
तभी से वे भगवान की कृपा से तीनों लोकों में स्वतंत्र रूप से विचरण करते हैं। उनके हाथ में भगवान द्वारा प्रदत्त दिव्य वीणा है, जिस पर वे स्वर छेड़ते हुए भगवान की लीलाओं का गान करते रहते हैं। उनका जीवन केवल एक ही उद्देश्य के लिए है- अखंड भगवद्भजन और श्रीकृष्ण की महिमा का प्रचार। यही कारण है कि देवर्षि नारद आज भी समस्त लोकों में भगवान के नाम का कीर्तन करते हुए भक्तों को भक्ति का मार्ग दिखाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-नारद जी अपने पिछले जन्म में कौन थे?
नारद जी पिछले जन्म में एक वेदवादी ब्राह्मणों की दासी के पुत्र थे। संतों की सेवा, सत्संग और भगवान की कथा सुनने से उनके भीतर भक्ति का उदय हुआ।
2-नारद जी को भक्ति का ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ?
चातुर्मास के दौरान उन्होंने महात्माओं की सेवा की और नियमित रूप से भगवान श्रीकृष्ण की कथाएं, भजन और कीर्तन सुने। संतों की कृपा से उन्हें भक्ति और ज्ञान का मार्ग मिला।
3-नारद जी को भगवान के दर्शन कब हुए?
वन में पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान करते समय नारद जी को भगवान का दिव्य स्वरूप दिखाई दिया। हालांकि यह दर्शन थोड़ी देर बाद अदृश्य हो गया।
4-नारद जी की माँ की मृत्यु कैसे हुई?
नारद जी की माँ रात में गौ दुहने के लिए बाहर गई थीं। रास्ते में सर्प के डसने से उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद नारद जी अकेले उत्तर दिशा की ओर निकल पड़े।
5-नारद जी देवर्षि कैसे बने?
भगवान की कृपा और संतों की सेवा से नारद जी का मन पूर्ण रूप से भक्ति में लग गया। मृत्यु के बाद उन्हें भगवान का पार्षद स्वरूप प्राप्त हुआ और बाद में वे देवर्षि नारद के रूप में तीनों लोकों में भगवान के नाम का प्रचार करने लगे।









