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भागवत पुराण, प्रथम स्कंध (12) - भीष्म पितामह का उपदेश और श्रीकृष्ण स्मरण में प्राण त्याग

भीष्म पितामह ने शरशय्या पर युधिष्ठिर को धर्म, राजधर्म, मोक्षधर्म और भगवद्धर्म का उपदेश दिया। उत्तरायण में श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए उन्होंने प्राण त्यागकर परम गति प्राप्त की।

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Bhishma Pitamah Updesh

महाभारत युद्ध के बाद युधिष्ठिर अपने स्वजनों के वध से अत्यंत दुखी और चिंतित थे। धर्म के गूढ़ रहस्यों को जानने के लिए वे भगवान श्रीकृष्ण और भाइयों के साथ भीष्म पितामह के पास पहुँचे। शरशय्या पर स्थित भीष्म ने उन्हें धर्म का विस्तृत ज्ञान दिया और उत्तरायण में श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए प्राण त्याग दिए।

युधिष्ठिर भीष्म पितामह के पास धर्म का ज्ञान लेने पहुँचे-

महाभारत युद्ध के बाद राजा युधिष्ठिर अपने स्वजनों के वध के कारण अत्यंत व्याकुल और चिंतित थे। उन्हें प्रजाद्रोह का भय सताने लगा और वे धर्म के सूक्ष्म रहस्यों को जानने के इच्छुक हुए। इसी उद्देश्य से वे अपने भाइयों, मुनियों और भगवान श्रीकृष्ण के साथ कुरुक्षेत्र पहुँचे, जहाँ भीष्म पितामह शरशय्या पर स्थित थे।

पाण्डवों ने वहाँ पहुँचकर भीष्म पितामह को देखा, जो मानो स्वर्ग से गिरा हुआ कोई देवता पृथ्वी पर पड़ा हो। उन्होंने विनम्रता पूर्वक उनके चरणों में प्रणाम किया और उनके समीप बैठ गए।

उस समय अनेक महान ऋषि, मुनि और विद्वान भी वहाँ उपस्थित थे, जिससे वह स्थान अत्यंत पवित्र और दिव्य प्रतीत हो रहा था। भीष्म पितामह ने उन सबका यथोचित सत्कार किया। वे भगवान श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप को जानते थे, इसलिए उन्होंने बाह्य और आंतरिक दोनों रूपों से उनका सम्मान किया।

पाण्डवों को अपने सामने देखकर उनकी आँखें प्रेम से भर आईं। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि यह अत्यंत दुःख की बात है कि धर्म, ब्राह्मणों और भगवान के आश्रित होते हुए भी उन्हें इतने कष्ट सहने पड़े।

भीष्म ने युधिष्ठिर को काल और ईश्वर की इच्छा का रहस्य समझाया-

उन्होंने स्मरण कराया कि पाण्डु के निधन के समय पाण्डव बालक थे और उस समय से ही उन्हें अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा। भीष्म ने समझाया कि संसार की सभी घटनाएँ काल और ईश्वर की इच्छा के अधीन होती हैं। मनुष्य चाहे कितना ही बलवान क्यों न हो, वह इनसे परे नहीं जा सकता।

उन्होंने कहा कि जहाँ स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर, बलशाली भीम, महान धनुर्धर अर्जुन और सखा रूप में भगवान श्रीकृष्ण उपस्थित हों, वहाँ भी यदि विपत्ति आती है, तो यह केवल ईश्वर की लीला ही समझनी चाहिए।

उन्होंने युधिष्ठिर को उपदेश दिया कि अब वे अपने शोक को त्यागकर प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करें, क्योंकि वे ही राज्य के योग्य और समर्थ राजा हैं। उन्होंने यह भी बताया कि भगवान श्रीकृष्ण कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, बल्कि वे स्वयं परमात्मा हैं, जो अपनी माया से मानव रूप में लीला कर रहे हैं।

भीष्म ने भगवान की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि जिन्हें लोग अपना मित्र, सखा या संबंधी समझते हैं, वे वास्तव में सर्वव्यापक और समदर्शी परमात्मा हैं। वे सभी के प्रति समान हैं, परंतु अपने भक्तों पर विशेष कृपा करते हैं।

भीष्म पितामह ने धर्म के विविध विषयों पर दिया उपदेश-

उन्होंने यह भी कहा कि यह उनका सौभाग्य है कि जीवन के अंतिम समय में उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात् दर्शन प्राप्त हो रहा है। योगीजन जिस अवस्था को साधना के द्वारा प्राप्त करते हैं, वह उन्हें सहज ही प्राप्त हो रही है। इसके बाद युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से धर्म के विविध विषयों पर प्रश्न किए।

भीष्म ने वर्ण और आश्रम के अनुसार मनुष्यों के कर्तव्यों, दान, राजधर्म, मोक्षधर्म, स्त्रीधर्म तथा भगवद्धर्म का विस्तारपूर्वक उपदेश दिया। उन्होंने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चार पुरुषार्थों का भी विवेचन किया और अनेक उदाहरणों द्वारा उन्हें स्पष्ट किया।

उत्तरायण में श्रीकृष्ण का स्मरण कर भीष्म ने त्यागे प्राण-

इसी बीच उत्तरायण का शुभ समय आ पहुँचा, जिसे महान योगीजन शरीर त्याग के लिए श्रेष्ठ मानते हैं। उस समय भीष्म पितामह ने अपनी वाणी को संयमित किया और मन को सभी विषयों से हटाकर भगवान श्रीकृष्ण में स्थिर कर दिया। उन्होंने भगवान के चतुर्भुज स्वरूप का ध्यान किया, जिनके शरीर पर पीताम्बर शोभायमान था।

भगवान के दर्शन मात्र से उनके शरीर की समस्त पीड़ा दूर हो गई और उनके मन के समस्त विकार समाप्त हो गए। शरीर त्याग के समय उन्होंने अपनी इन्द्रियों को पूर्णतः वश में कर लिया और भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति करने लगे। भीष्म ने अपनी शुद्ध और कामनारहित बुद्धि को भगवान के चरणों में अर्पित करते हुए कहा कि वे उसी परम पुरुष में अपनी निष्कपट प्रीति स्थापित करना चाहते हैं।

उन्होंने भगवान के सुंदर, श्यामल और तेजस्वी स्वरूप का स्मरण किया, जिनके शरीर पर पीताम्बर लहराता है और जिनका मुख कमल के समान शोभायमान है। उन्होंने महाभारत युद्ध के उन प्रसंगों को याद किया, जब भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथि बने और युद्धभूमि में अद्भुत रूप से स्थित रहे।

उन्होंने उस क्षण का भी स्मरण किया जब भगवान ने अर्जुन के मोह को दूर करने के लिए गीता का उपदेश दिया। भीष्म ने उस अद्भुत घटना को भी याद किया जब उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि वे भगवान को शस्त्र उठाने पर विवश कर देंगे।

उस समय भगवान ने अपनी प्रतिज्ञा भंग करके रथ का पहिया उठाया और उन पर आक्रमण करने के लिए दौड़े। उस रूप में भी वे भक्तवत्सल और करुणामय ही थे। उन्होंने भगवान के उस रूप का भी स्मरण किया जब वे अर्जुन के रथ की रक्षा करते हुए सारथि बने, एक हाथ में घोड़ों की लगाम और दूसरे में चाबुक लिए हुए थे।

उस दिव्य रूप का दर्शन करने वाले अनेक वीरों को परम गति प्राप्त हुई। भीष्म ने भगवान की रासलीला और अन्य लीलाओं का स्मरण करते हुए कहा कि वे ही समस्त जगत के आत्मा हैं और सबके हृदय में विराजमान हैं। जैसे एक सूर्य अनेक स्थानों पर अलग-अलग दिखाई देता है, वैसे ही भगवान एक होते हुए भी अनेक रूपों में प्रकट होते हैं।

इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण में पूर्णतः लीन होकर भीष्म पितामह ने अपने प्राणों का त्याग कर दिया। उनके शरीर से प्राण निकलते ही वहाँ उपस्थित सभी लोग मौन हो गए, मानो प्रकृति स्वयं स्थिर हो गई हो। उस समय देवताओं और मनुष्यों ने उनका सम्मान करते हुए दुंदुभि बजाई और आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी।

सभी महान व्यक्तियों ने उनके गुणों की प्रशंसा की। इसके पश्चात युधिष्ठिर ने विधिपूर्वक भीष्म पितामह की अन्त्येष्टि क्रिया सम्पन्न की और कुछ समय तक शोक में डूबे रहे। तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण के साथ वे हस्तिनापुर लौट आए।

वहाँ पहुँचकर उन्होंने धृतराष्ट्र और गान्धारी को सांत्वना दी और उनकी आज्ञा तथा भगवान की अनुमति से राज्य का शासन संभाला। इस प्रकार धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए धर्मपूर्वक राज्य का संचालन प्रारंभ किया।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1-भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को क्या उपदेश दिया था?

भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को वर्णाश्रम धर्म, दान, राजधर्म, मोक्षधर्म, स्त्रीधर्म और भगवद्धर्म सहित धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के विषय में विस्तार से बताया।

2-भीष्म पितामह ने शरशय्या पर प्राण क्यों रोके थे?

भीष्म पितामह को इच्छामृत्यु का वर प्राप्त था। उन्होंने उत्तरायण के शुभ समय में शरीर त्याग करने का निर्णय लिया।

3-भीष्म पितामह ने प्राण त्यागते समय किसका स्मरण किया?

भीष्म पितामह ने भगवान श्रीकृष्ण के सुंदर स्वरूप और उनकी विभिन्न लीलाओं का स्मरण करते हुए अपने प्राण त्यागे।

4-भीष्म पितामह ने श्रीकृष्ण को परमात्मा क्यों माना?

भीष्म पितामह भगवान श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप को जानते थे और उन्हें सर्वव्यापक, समदर्शी तथा परमात्मा के रूप में देखते थे।

5-भीष्म पितामह के प्राण त्यागने के बाद युधिष्ठिर ने क्या किया?

युधिष्ठिर ने विधिपूर्वक भीष्म पितामह की अन्त्येष्टि क्रिया सम्पन्न की और बाद में भगवान श्रीकृष्ण के साथ हस्तिनापुर लौटकर राज्य का संचालन संभाला।

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