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भागवत पुराण, प्रथम स्कंध (1) - भागवत महापुराण की रचना आखिर क्यों हुई? नारदजी ने वेदव्यासजी को दिया दिव्य उपदेश

महाभारत की रचना के बाद भी व्यासजी के मन में शांति नहीं थी। देवर्षि नारद ने उन्हें श्रीकृष्ण के यश और भक्ति का महत्व समझाया, जिससे भागवत रचना का मार्ग प्रशस्त हुआ।

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Bhagwat Mahapuran

श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना के पीछे देवर्षि नारद जी का एक महत्वपूर्ण उपदेश माना जाता है। महाभारत जैसे महान ग्रंथ की रचना करने के बाद भी वेदव्यास जी के मन में संतोष नहीं था। उन्हें स्वयं समझ नहीं आ रहा था कि इतनी बड़ी रचना करने के बाद भी उनका हृदय व्याकुल क्यों है।

तभी देवर्षि नारद उनके पास पहुंचे और व्यासजी से उनकी मनःस्थिति का कारण पूछा। नारदजी ने उन्हें समझाया कि उन्होंने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का विस्तार से वर्णन तो किया है, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण के निर्मल यश और उनकी भक्ति का पर्याप्त गान नहीं किया। यही उनके असंतोष का कारण है।

वेदव्यासजी की व्याकुलता और नारदजी का स्पष्ट संदेश-

एक समय वीणा धारण किए देवर्षि नारद ब्रह्मर्षि वेदव्यास के पास पहुंचे। उन्होंने व्यासजी से पूछा कि आपने महाभारत जैसे महान ग्रंथ की रचना की है, जिसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का विस्तार से वर्णन है। आपने सनातन ब्रह्मतत्त्व पर भी गहन विचार किया है। फिर भी आप इतने चिंतित और दुखी क्यों दिखाई दे रहे हैं?

व्यासजी ने विनम्र होकर कहा कि आपकी बात सत्य है, लेकिन मेरा हृदय अभी भी संतुष्ट नहीं है। इसका कारण मैं स्वयं नहीं जानता। आप ब्रह्माजी के मानसपुत्र हैं और सभी गूढ़ रहस्यों के ज्ञाता हैं। आपने उस पुराणपुरुष की उपासना की है, जो प्रकृति और पुरुष दोनों के स्वामी हैं और अपनी इच्छा मात्र से सृष्टि, स्थिति और प्रलय करते हैं। इसलिए कृपा करके बताइए कि मुझसे कौन-सी कमी रह गई है।

तब नारदजी ने व्यासजी को उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि आपने भगवान के निर्मल यश का पर्याप्त वर्णन नहीं किया है। आपने धर्म आदि पुरुषार्थों का सुंदर निरूपण किया, लेकिन श्रीकृष्ण की महिमा को उतना स्थान नहीं दिया, जितना देना चाहिए था।

नारदजी ने कहा कि जिस वाणी में भगवान के यश का गान नहीं होता, वह कितनी भी सुंदर और अलंकारपूर्ण क्यों न हो, भक्तों के लिए आकर्षण का विषय नहीं बनती। जैसे हंस गंदे जल में रुचि नहीं लेते, वैसे ही भगवान के चरणों में मन लगाने वाले भक्त ऐसी वाणी में आनंद नहीं पाते। इसके विपरीत, यदि किसी रचना की भाषा बहुत सुंदर न भी हो, शब्दों में कुछ दोष हों, लेकिन उसमें भगवान के नाम और यश का गान हो, तो वह वाणी भी पवित्र हो जाती है। सत्पुरुष ऐसी वाणी का श्रवण और कीर्तन करते हैं।

नारदजी ने यह भी समझाया कि मोक्ष देने वाला निर्मल ज्ञान भी यदि भक्ति से रहित हो तो उसकी पूर्णता नहीं होती। कामना से किए जाने वाले कर्म हों या निष्काम कर्म, यदि वे भगवान को समर्पित नहीं हैं तो उनका वास्तविक फल अधूरा रह जाता है।

उन्होंने व्यासजी को सावधान करते हुए कहा कि आपने धर्म के नाम पर विषयों में आसक्त लोगों के लिए सकाम कर्मों का वर्णन किया है। सामान्य लोग उसी को मुख्य धर्म समझ लेते हैं और निषेध किए गए कर्मों की ओर ध्यान नहीं देते। संसार के सुख-दुःख तो समय के अनुसार अपने आप मिलते रहते हैं। इसलिए बुद्धिमान मनुष्य को उस चीज के लिए प्रयास करना चाहिए, जो जन्म-मरण के चक्र में भटकने पर भी सहज नहीं मिलती और वह है भगवान का भजन।

नारदजी ने वेदव्यासजी को दिया भागवत रचना का मार्ग-

नारदजी ने व्यासजी से कहा कि अब वे समाधि में भगवान की अचिन्त्य शक्ति और उनकी दिव्य लीलाओं का चिंतन करें और उनका कीर्तन करें। जो व्यक्ति भगवान की लीलाओं को छोड़कर दूसरे विषयों में ही उलझा रहता है, उसकी बुद्धि अनेक नाम और रूपों में भटकती रहती है। हवा से डगमगाती नाव की तरह उसकी चंचल बुद्धि भी स्थिर नहीं रह पाती।

उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपना स्वधर्म छोड़कर भगवान के चरणों का भजन करता है और किसी कारण से उसका भजन पूरा होने से पहले ही छूट जाता है, तब भी उसका कोई वास्तविक अमंगल नहीं होता। लेकिन जो व्यक्ति केवल अपने स्वधर्म का पालन करता है और भगवान की भक्ति नहीं करता, उसे इससे क्या लाभ मिलेगा?

नारदजी ने समझाया कि भगवान श्रीकृष्ण के चरणों का आश्रय लेने वाला भक्त यदि किसी कारण से साधना से दूर भी हो जाए, तब भी उसके भीतर भक्ति का अनुभव बना रहता है। जिस व्यक्ति को भगवान के भक्ति-रस का स्वाद मिल चुका है, उसके लिए संसार की ओर लौटना पहले जैसा सहज नहीं रहता।

अंत में नारदजी ने व्यासजी को स्मरण कराया कि वे भगवान पुरुषोत्तम के कलावतार हैं और लोककल्याण के लिए उनका प्राकट्य हुआ है। मनुष्य की तपस्या, वेदों का अध्ययन, यज्ञ, स्वाध्याय, ज्ञान और दान जैसे सभी कार्यों का अंतिम उद्देश्य भगवान श्रीकृष्ण के गुणों और उनकी दिव्य लीलाओं का वर्णन करना है।

नारदजी के इसी उपदेश के बाद व्यासजी ने भगवान की लीलाओं और भक्ति को केंद्र में रखकर उस महान ग्रंथ की रचना की, जिसे श्रीमद्भागवत महापुराण कहा जाता है। इसमें ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के साथ भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का अमृत प्रवाहित होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1-भागवत महापुराण की रचना क्यों हुई?

महाभारत की रचना के बाद भी व्यासजी के मन में संतोष नहीं था। नारदजी ने उन्हें भगवान श्रीकृष्ण के यश और भक्ति का पर्याप्त वर्णन करने की प्रेरणा दी, जिसके बाद भागवत की रचना हुई।

2-व्यासजी को मन की शांति क्यों नहीं मिल रही थी?

नारदजी के अनुसार व्यासजी ने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का वर्णन तो किया था, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण के निर्मल यश और भक्ति का पर्याप्त गान नहीं किया था।

3-देवर्षि नारद ने व्यासजी को क्या उपदेश दिया?

नारदजी ने उन्हें भगवान की दिव्य लीलाओं का चिंतन, उनके नाम और यश का कीर्तन तथा भक्ति को शास्त्रों के केंद्र में रखने का उपदेश दिया। नारदजी के अनुसार

4-भगवान की भक्ति क्यों जरूरी है?

नारदजी ने समझाया कि केवल ज्ञान, कर्म या स्वधर्म से पूर्णता नहीं मिलती। भगवान के चरणों में भक्ति और समर्पण ही साधना को सार्थक बनाते हैं।

5-श्रीमद्भागवत महापुराण में किसका विशेष वर्णन है?

श्रीमद्भागवत में भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप, गुण, भक्ति और उनकी दिव्य लीलाओं का विशेष रूप से वर्णन किया गया है।

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