भागवत महापुराण की कथा में भक्तिदेवी, ज्ञान और वैराग्य का यह प्रसंग बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें बताया गया है कि कलियुग के प्रभाव से लोगों का झुकाव विषयों और बाहरी आडम्बरों की ओर बढ़ गया था। इसका असर भक्ति, ज्ञान और वैराग्य पर भी पड़ा।
इसी स्थिति को देखकर देवर्षि नारद चिंतित हुए। जब वे वृन्दावन पहुंचे तो वहां उन्हें एक अद्भुत दृश्य दिखाई दिया। एक युवती दुखी बैठी थी और उसके पास उसके दो वृद्ध पुत्र मूर्छित पड़े थे। आगे नारदजी को इस स्थिति का कारण पता चला और फिर उन्होंने ज्ञान-वैराग्य को जगाने का प्रयास किया
नारदजी ने देखी भक्तिदेवी की दुखद स्थिति-
एक समय देवर्षि नारद सनत्कुमारों के दर्शन के लिए विशालापुरी पहुंचे। सनत्कुमारों ने जब नारदजी को उदास देखा तो उनसे उनकी चिंता का कारण पूछा। नारदजी ने बताया कि वे पृथ्वी को उत्तम लोक समझकर यहां आए थे और उन्होंने अनेक पवित्र तीर्थों की यात्रा भी की।
नारदजी ने पुष्कर, प्रयाग, काशी, गोदावरी, हरिद्वार, कुरुक्षेत्र, श्रीरंग और सेतुबंध जैसे महान तीर्थों का भ्रमण किया, लेकिन कहीं भी उनके मन को शांति नहीं मिली।
उन्होंने बताया कि कलियुग के प्रभाव से पृथ्वी पर पाखण्ड, अधर्म और विषयासक्ति बढ़ गई है। धर्म का वास्तविक स्वरूप बिगड़ता जा रहा है और लोग बाहरी आडम्बरों में उलझकर आध्यात्मिक जीवन के मूल भाव को भूलते जा रहे हैं। यही देखकर नारदजी बहुत चिंतित थे।
इसी चिंता में घूमते हुए वे भगवान श्रीकृष्ण की लीला-भूमि वृन्दावन पहुंचे। यमुना जी के तट पर उन्होंने एक अद्भुत दृश्य देखा। वहां एक युवती अत्यंत दुखी अवस्था में बैठी थी। उसके पास दो वृद्ध पुरुष मूर्छित पड़े थे। वह युवती बार-बार उन्हें उठाने का प्रयास कर रही थी। आसपास कुछ स्त्रियां खड़ी थीं, जो उन दोनों वृद्ध पुरुषों को पंखा कर रही थीं और उस युवती को सांत्वना दे रही थीं।
नारदजी ने उस युवती से उसके दुख का कारण पूछा। तब उसने बताया कि उसका नाम भक्ति देवी है और ये दोनों उसके पुत्र ज्ञान और वैराग्य हैं। जो स्त्रियां उनकी सेवा कर रही थीं, वे पवित्र नदियां थीं।
भक्ति देवी ने अपनी स्थिति बताते हुए कहा कि उनका जन्म द्रविड़ देश में हुआ। कर्नाटक में उनका विकास हुआ और महाराष्ट्र में कुछ स्थानों पर उनका सम्मान भी हुआ। लेकिन गुजरात पहुंचते-पहुंचते वे वृद्ध हो गईं। कलियुग के प्रभाव में पाखण्डियों ने उनके अंग-भंग कर दिए।
जब वे वृन्दावन पहुंचीं तो फिर से नवयुवती हो गईं, क्योंकि यह वही पवित्र भूमि है जहां भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएं हुई हैं और भक्ति का प्रवाह निरंतर बना रहता है। लेकिन उनके दोनों पुत्र ज्ञान और वैराग्य वृद्ध और बहुत कमजोर ही बने रहे। कलियुग में ज्ञान और वैराग्य की ओर लोगों का ध्यान कम होने के कारण उनकी यह दशा हो गई थी।
नारदजी ने अपनी दिव्य दृष्टि से इस स्थिति को समझ लिया। उन्होंने भक्ति देवी को बताया कि कलियुग में जीव विषयों में इतने आसक्त हो गए हैं कि ज्ञान और वैराग्य की उपेक्षा होने लगी है। वहीं वृन्दावन की महिमा के कारण भक्ति फिर से तरुणी हो गई है।
राजा परीक्षित ने कलियुग को रहने की अनुमति क्यों दी?
भक्ति देवी ने नारदजी से पूछा कि राजा परीक्षित ने कलियुग को अपने राज्य में प्रवेश करने की अनुमति क्यों दी थी? नारदजी ने बताया कि जब भगवान श्रीकृष्ण पृथ्वी से अपने परमधाम को चले गए, उसी समय से कलियुग का आरंभ हुआ। दिग्विजय के समय राजा परीक्षित ने कलियुग को देखा तो वह भयभीत होकर उनके सामने दीन भाव से शरण में आ गया।
राजा परीक्षित ने विचार किया कि कलियुग का वध नहीं करना चाहिए, क्योंकि इस युग में भगवान के नाम-संकीर्तन से वह फल प्राप्त हो सकता है, जो दूसरे युगों में कठिन तप, योग और समाधि से भी आसानी से नहीं मिलता। इसी एक विशेषता को देखकर राजा परीक्षित ने कलियुग को रहने की अनुमति दे दी।
नारदजी ने भक्ति देवी को समझाया कि वे चिंता न करें और भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों का स्मरण करें। जिन्होंने द्रौपदी की रक्षा की और गोपियों को सनाथ किया, वे श्रीकृष्ण कहीं गए नहीं हैं।
भक्ति स्वयं भगवान को बहुत प्रिय है। उसके आह्वान पर भगवान पापियों के घर भी पहुंच जाते हैं। सत्ययुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग में ज्ञान और वैराग्य मुक्ति के प्रमुख साधन माने गए, लेकिन कलियुग में भक्ति को विशेष महत्व मिला है। नारदजी ने कहा कि भगवान ने भक्ति को अपने भक्तों का पालन-पोषण करने का कार्य सौंपा है। मुक्ति उसकी दासी है और ज्ञान तथा वैराग्य उसके पुत्र हैं।
नारदजी ने ज्ञान और वैराग्य को जगाने का किया प्रयास-
भक्ति देवी ने नारदजी से कहा कि आपने मुझे सांत्वना देकर मेरा दुख दूर कर दिया, लेकिन मेरे दोनों पुत्र ज्ञान और वैराग्य अभी भी मूर्छित पड़े हैं। कृपया इन्हें भी जागृत कर दीजिए।
यह सुनकर नारदजी को बहुत करुणा आई। उन्होंने दोनों को हाथों से हिलाकर जगाने का प्रयास किया और उनके कानों के पास जोर से पुकारा—“हे ज्ञान! जागो। हे वैराग्य! उठो।”
इसके बाद नारदजी ने वेदों का उच्चारण किया, वेदान्त का घोष किया और बार-बार भगवद्गीता का पाठ भी किया। उनके प्रयास से ज्ञान और वैराग्य बड़ी कठिनाई से उठे, लेकिन वे बहुत दुर्बल थे। कुछ ही समय बाद वे फिर जंभाई लेने लगे। उनकी आंखें खुली भी नहीं रह पा रही थीं और थोड़ी देर में वे दोबारा सो गए।
यह देखकर नारदजी बहुत चिंतित हो गए। वे सोचने लगे कि आखिर ज्ञान और वैराग्य की यह नींद और वृद्धावस्था कैसे दूर होगी। इसी चिंता में उन्होंने भगवान का स्मरण किया।
तभी आकाशवाणी हुई- “हे मुने! दुःखी मत हो। इनके उद्धार के लिए एक विशेष सत्कर्म करना होगा। इसका मार्ग तुम्हें संतशिरोमणि महापुरुष बताएंगे। उस सत्कर्म के पूरा होते ही ज्ञान और वैराग्य की नींद तथा वृद्धावस्था दूर हो जाएगी और पूरी पृथ्वी पर भक्ति का फिर से प्रसार होगा।”
यह दिव्य आकाशवाणी उस महान सत्कर्म की ओर संकेत थी, जिसके माध्यम से आगे चलकर भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का पुनः जागरण होना था। यही प्रसंग आगे भागवत श्रवण की महिमा को प्रकट करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-भक्तिदेवी के पुत्र कौन थे?
भक्तिदेवी के दो पुत्र ज्ञान और वैराग्य बताए गए हैं।
2-वृन्दावन पहुंचकर भक्तिदेवी युवा क्यों हो गईं?
वृन्दावन भगवान श्रीकृष्ण की लीला-भूमि है। वहां भक्ति का विशेष प्रभाव होने के कारण भक्तिदेवी फिर से नवयुवती हो गईं।
3-ज्ञान और वैराग्य वृद्ध क्यों हो गए थे?
कलियुग में लोगों की विषयासक्ति बढ़ने और आध्यात्मिक जीवन से दूरी के कारण ज्ञान और वैराग्य की उपेक्षा हुई, जिससे वे वृद्ध और निर्बल हो गए।
4-राजा परीक्षित ने कलियुग को रहने की अनुमति क्यों दी?
राजा परीक्षित ने देखा कि कलियुग में भगवान के नाम-संकीर्तन से वह फल मिल सकता है, जो अन्य युगों में कठिन साधना से प्राप्त होता है। इसी कारण उन्होंने कलियुग को रहने दिया।
5-ज्ञान और वैराग्य को जगाने के लिए नारदजी ने क्या किया?
नारदजी ने उन्हें जगाने के लिए वेदों और वेदान्त का उच्चारण किया तथा भगवद्गीता का पाठ किया। इसके बाद आकाशवाणी में उनके उद्धार के लिए विशेष सत्कर्म करने का मार्ग बताया गया।









