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भागवत पुराण, प्रथम स्कंध (4) - आत्मदेव, धुन्धुकारी और गोकर्ण की कथा- धुन्धुकारी की मुक्ति कैसे हुई?

आत्मदेव, धुन्धुकारी और गोकर्ण की पौराणिक कथा। जानिए कैसे गोकर्ण द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत सप्ताह श्रवण से धुन्धुकारी को प्रेतयोनि से मुक्ति मिली।

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Atmadev Dhundhukari Gokarna

भागवत महात्म्य में आत्मदेव, धुन्धुकारी और गोकर्ण की कथा अत्यंत प्रसिद्ध और शिक्षाप्रद मानी जाती है। यह कथा बताती है कि संसार के मोह, पुत्र-मोह और विषयासक्ति के कारण मनुष्य किस प्रकार दुःखों में फँस जाता है, और साथ ही यह भी कि श्रीमद्भागवत का श्रवण किस प्रकार प्रेत योनि जैसे भीषण दुःख से भी मुक्ति दिला सकता है।

आत्मदेव की संतान की इच्छा और संन्यासी का वरदान-

प्राचीन काल में तुंगभद्रा नदी के तट पर एक नगर में आत्मदेव नामक ब्राह्मण अपनी पत्नी धुन्धुली के साथ रहते थे। आत्मदेव विद्वान और अपने कार्य में कुशल थे, पर उनकी पत्नी धुन्धुली कुटिल स्वभाव की, अत्यधिक बोलने वाली और झगड़ालू थी। घर में धन-सम्पत्ति की कमी नहीं थी, परंतु संतान न होने के कारण आत्मदेव अत्यंत दुखी रहते थे।

एक दिन दुःख से व्याकुल होकर आत्मदेव वन में चले गए और वहाँ उन्हें एक संन्यासी मिले। आत्मदेव ने रोते हुए अपनी पीड़ा व्यक्त की। उन्होंने कहा, पुत्रहीन होने के कारण उनके पितर उनके द्वारा दिए गए तर्पण से भी संतुष्ट नहीं होते और देवता भी उनके दान को प्रसन्नता से स्वीकार नहीं करते। यहाँ तक कि उनके घर की गाय भी बाँझ है और वृक्षों पर फल नहीं लगते। उन्होंने कहा कि अब वे जीवन से निराश होकर प्राण त्यागने आए हैं।

संन्यासी ने उन्हें समझाया कि मनुष्य को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है और पुत्र की इच्छा का त्याग कर देना ही श्रेयस्कर है। परंतु आत्मदेव ने पुत्र प्राप्ति के लिए आग्रह किया। अंततः संन्यासी ने दया करके उन्हें एक फल दिया और कहा कि यदि उनकी पत्नी एक वर्ष तक सत्य, शौच, दया, दान और एक समय भोजन का नियम पालन करेगी तो पुत्र प्राप्त होगा।

धुन्धुली का छल और गोकर्ण-धुन्धुकारी का जन्म-

आत्मदेव वह फल लेकर घर आए और अपनी पत्नी को सारी बात बताकर फल दे दिया। परंतु धुन्धुली कुटिल स्वभाव की थी और गर्भ धारण करना नहीं चाहती थी। वह अपनी सखी के पास जाकर रोने लगी और गर्भधारण के कष्टों की कल्पना करके भय व्यक्त करने लगी। उसकी गर्भवती बहन ने उसे एक उपाय बताया। जब उसका बच्चा जन्म लेगा तो वह उसे धुन्धुली को दे देगी और धुन्धुली संन्यासी का दिया हुआ फल गाय को खिला दे।

धुन्धुली ने ऐसा ही किया। कुछ समय बाद उसकी बहन ने एक पुत्र को जन्म दिया और धन लेकर वह बच्चा धुन्धुली को दे दिया। आत्मदेव ने अत्यंत प्रसन्न होकर उसका नाम धुन्धुकारी रखा। कुछ समय बाद उस गाय ने भी एक अद्भुत बालक को जन्म दिया, जिसका शरीर मनुष्य का और कान गाय के समान थे। वह अत्यंत तेजस्वी और सुंदर था। उसका नाम गोकर्ण रखा गया। समय के साथ दोनों बालक बड़े हुए। गोकर्ण अत्यंत विद्वान, धर्मात्मा और ज्ञानी बने, जबकि धुन्धुकारी दुष्ट, हिंसक और दुर्व्यसनों में लिप्त हो गया। वह चोरी करता, लोगों को सताता और बुरी संगति में पड़कर अपने पिता की सम्पत्ति नष्ट करने लगा।

गोकर्ण का वैराग्य उपदेश और आत्मदेव का वनगमन-

धुन्धुकारी के दुर्व्यवहार से आत्मदेव अत्यंत दुखी रहने लगे। एक दिन जब उसने माता-पिता को पीटकर घर का सामान लूट लिया, तब आत्मदेव फूट-फूटकर रोने लगे और अपने जीवन को व्यर्थ समझने लगे।

तब गोकर्ण ने अपने पिता को वैराग्य का उपदेश दिया। उन्होंने कहा, “पिताजी! यह संसार अत्यंत दुःखमय और असार है। पुत्र किसका है, धन किसका है? इन सब में आसक्ति रखने वाला मनुष्य दीपक की तरह जलता रहता है। सुख न तो इन्द्र को मिलता है और न चक्रवर्ती राजा को, वास्तविक सुख तो विरक्त मुनियों को मिलता है। ‘यह मेरा पुत्र है’ इस मोह को त्याग दीजिए और भगवान की भक्ति में लग जाइए।”

उन्होंने आगे कहा कि यह शरीर हड्डी, मांस और रक्त का पिंड है, इसे ‘मैं’ समझना भूल है। संसार क्षणभंगुर है, इसलिए साधु-संग, भगवत्भजन और भगवान की कथाओं का ही आश्रय लेना चाहिए। गोकर्ण की बातों से प्रभावित होकर आत्मदेव ने साठ वर्ष की आयु में घर छोड़ दिया और वन में जाकर भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में जीवन लगा दिया। अंततः भगवान की कृपा से उन्होंने परम पद प्राप्त किया।

धुन्धुकारी का पतन और प्रेतयोनि की प्राप्ति-

पिता के वन जाने के बाद धुन्धुकारी और भी उच्छृंखल हो गया। उसने अपनी माता को भी अत्यंत कष्ट दिए, जिसके कारण वह दुःखी होकर घर छोड़कर चली गई और रास्ते में कुएँ में गिरकर मर गई। उधर गोकर्ण तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। धुन्धुकारी ने घर में पाँच वेश्याओं को रख लिया और उनकी इच्छाओं को पूरा करने के लिए चोरी-डकैती करने लगा। एक दिन उन स्त्रियों ने अनेक गहनों की माँग की।

धुन्धुकारी चोरी करके गहने लाया, परंतु उन स्त्रियों को भय हुआ कि कहीं वह पकड़ा न जाए। इसलिए उन्होंने एक रात उसे सोते समय रस्सी से गला घोंटकर मारने का प्रयास किया। जब वह नहीं मरा, तो उसके मुँह में जलते अंगारे डालकर उसे मार डाला और उसका शव गड्ढे में दबाकर धन लेकर भाग गईं। अपने पापों के कारण धुन्धुकारी प्रेतयोनि में चला गया और भयंकर कष्ट भोगते हुए बवंडर की तरह इधर-उधर भटकने लगा।

भागवत सप्ताह से धुन्धुकारी का उद्धार-

कुछ समय बाद गोकर्ण को अपने भाई की मृत्यु का समाचार मिला। उन्होंने गया और अन्य तीर्थों में उसका श्राद्ध किया, परंतु धुन्धुकारी का उद्धार नहीं हुआ। एक रात जब गोकर्ण घर में विश्राम कर रहे थे, तब धुन्धुकारी प्रेत रूप में प्रकट हुआ और संकेतों से अपनी व्यथा सुनाई। गोकर्ण ने सूर्यदेव से मार्गदर्शन माँगा। तब सूर्यदेव ने बताया कि उसका उद्धार केवल श्रीमद्भागवत के सप्ताह श्रवण से ही संभव है। गोकर्ण ने भागवत सप्ताह का आयोजन किया, जिसमें दूर-दूर से लोग आए। प्रेत रूप में धुन्धुकारी भी वहाँ आया और एक सात गाँठ वाले बाँस के भीतर बैठ गया।

गोकर्ण जब कथा सुनाते थे, तो प्रत्येक दिन कथा समाप्त होने पर बाँस की एक-एक गाँठ फट जाती और सातवें दिन सातों गाँठें टूट गईं। उसी क्षण धुन्धुकारी प्रेतयोनि से मुक्त होकर दिव्य रूप में प्रकट हुआ। उसने गोकर्ण को प्रणाम करके कहा कि भागवत कथा के प्रभाव से उसे मुक्ति मिली है। इस प्रसंग से यह सिद्ध होता है कि श्रीमद्भागवत का श्रवण अत्यंत पवित्र और कल्याणकारी है। भारतभूमि में जन्म लेकर भी जो मनुष्य भागवत कथा नहीं सुनता, उसका जीवन व्यर्थ है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1-आत्मदेव कौन थे?

आत्मदेव एक ब्राह्मण थे, जो संतान न होने के कारण दुखी रहते थे। संन्यासी के वरदान से उनके घर धुन्धुकारी और गोकर्ण का जन्म हुआ।

2-धुन्धुकारी को प्रेतयोनि क्यों मिली?

धुन्धुकारी के अत्याचार, चोरी, हिंसा और दुर्व्यसनों के कारण उसकी मृत्यु के बाद उसे प्रेतयोनि में भयंकर कष्ट भोगना पड़ा।

3-धुन्धुकारी की मुक्ति कैसे हुई?

गोकर्ण ने श्रीमद्भागवत का सात दिवसीय कथा-पाठ आयोजित किया। भागवत कथा के श्रवण से धुन्धुकारी प्रेतयोनि से मुक्त होकर दिव्य रूप में प्रकट हुआ।

4-गोकर्ण ने धुन्धुकारी के उद्धार के लिए क्या किया?

गोकर्ण ने पहले गया और अन्य तीर्थों में धुन्धुकारी का श्राद्ध किया, लेकिन मुक्ति नहीं हुई। बाद में सूर्यदेव के मार्गदर्शन से उन्होंने भागवत सप्ताह कराया।

5-भागवत कथा में सात गाँठ वाले बाँस का क्या प्रसंग है?

धुन्धुकारी सात गाँठ वाले बाँस में बैठकर भागवत कथा सुनता था। कथा के प्रत्येक दिन एक गाँठ टूटती गई और सातवें दिन सभी गाँठें टूटने के साथ उसका उद्धार हो गया।

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