|| ज्ञान का महासागर ||

देवउठनी एकादशी 2026 : इस दिन तुलसी विवाह क्यों होता है? जानें कथा, महत्व और पूजा विधि

देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह क्यों किया जाता है? जानें वृंदा और भगवान विष्णु की कथा, शालिग्राम से विवाह का महत्व, पूजा विधि और धार्मिक मान्यता से जुड़ी खास बातें, पूरी जानकारी।

साझा करें:

Tulsi Vivah 2026 Date

देवउठनी एकादशी के बाद तुलसी विवाह की परंपरा शुरू होती है और इस दिन तुलसी माता का विवाह भगवान शालिग्राम से कराया जाता है। यह विवाह केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि तुलसी और भगवान विष्णु से जुड़ी पौराणिक कथा की याद भी है। आइए जानते हैं तुलसी विवाह क्यों होता है, इसके पीछे की कथा क्या है और घर पर यह पूजा कैसे करें।

देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह क्यों होता है?

तुलसी विवाह का संबंध भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप से है। हिन्दू धार्मिक परंपरा में तुलसी को भगवान विष्णु की प्रिय माना गया है और कार्तिक महीने में तुलसी पूजन का विशेष महत्व बताया गया है।

देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागने के बाद मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है। इसी परंपरा से तुलसी और शालिग्राम के विवाह को भी जोड़ा गया है।

हालांकि अलग-अलग परंपराओं में तुलसी विवाह की तिथि में अंतर मिलता है। कई परंपराएं प्रबोधिनी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक के समय को इसके लिए शुभ मानती हैं।

2026 में हिन्दू पंचांग के अनुसार तुलसी विवाह 21 नवंबर को होगा। तुलसी विवाह में तुलसी माता को वधू और शालिग्राम को भगवान विष्णु के स्वरूप में वर मानकर विवाह कराया जाता है। इस दौरान सामान्य विवाह की तरह पूजा, मंगल गीत, वरमाला, फेरे और अन्य धार्मिक रस्में भी की जाती हैं।

तुलसी विवाह की पौराणिक कथा क्या है?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जलंधर नाम का एक शक्तिशाली असुर था। उसकी पत्नी वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त और पतिव्रता थी। वृंदा के पतिव्रत धर्म के प्रभाव से जलंधर को ऐसी शक्ति प्राप्त थी कि उसे पराजित करना बेहद कठिन हो गया था।

जलंधर के अत्याचार बढ़ने पर देवताओं ने भगवान शिव से उसकी रक्षा की प्रार्थना की। युद्ध में जलंधर को हराना आसान नहीं था, क्योंकि उसकी शक्ति के पीछे वृंदा के पतिव्रत का प्रभाव था।

पौराणिक कथा के अनुसार, जलंधर का अंत करने के लिए भगवान विष्णु ने उसकी शक्ति को समाप्त करने का उपाय किया और वृंदा के पतिव्रत धर्म को खंडित किया। जब वृंदा को इस बात का पता चला तो उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दिया। इसके बाद वृंदा ने अपना शरीर त्याग दिया और उनके तप तथा पवित्रता से जुड़ी परंपरा तुलसी के रूप में आगे बढ़ी।

इसी कथा से तुलसी को देवी स्वरूप मानने और भगवान विष्णु के साथ उनके विवाह की परंपरा जुड़ी है। बाद में शालिग्राम को भगवान विष्णु का स्वरूप मानकर तुलसी के साथ उनका विवाह कराया जाने लगा।

तुलसी विवाह की पूजा विधि-

तुलसी विवाह के लिए सबसे पहले तुलसी के पौधे के आसपास की जगह को साफ करके सजाया जाता है। तुलसी चौरे को स्वच्छ करके वहां पूजा की चौकी या छोटा मंडप बनाया जा सकता है।

तुलसी माता को वधू के रूप में सजाया जाता है। इसके बाद भगवान शालिग्राम को वर के रूप में स्थापित किया जाता है। पूजा की शुरुआत भगवान गणेश के स्मरण से करके तुलसी और शालिग्राम का पूजन किया जाता है।

इसके बाद दोनों को विवाह के लिए तैयार करके वरमाला की रस्म की जाती है। परंपरा के अनुसार तुलसी माता का कन्यादान भी किया जाता है। इसके बाद विवाह संस्कार में हवन और अग्नि की परिक्रमा की जाती है।

पूजा के अंत में आरती करके प्रसाद अर्पित किया जाता है। सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन और दान दिया जा सकता है। शास्त्रीय विधि में गोधूलि बेला में विष्णु पूजन, तुलसी का कन्यादान, हवन और अग्नि परिक्रमा का उल्लेख मिलता है।

तुलसी विवाह का धार्मिक महत्व-

तुलसी विवाह को भगवान विष्णु और देवी तुलसी के पवित्र संबंध से जोड़कर देखा जाता है। इस दिन तुलसी माता की पूजा करके घर-परिवार के सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। तुलसी भगवान विष्णु की पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती हैं। इसी कारण वैष्णव परंपरा में तुलसी के पत्तों का विशेष महत्व है।

तुलसी विवाह के माध्यम से कार्तिक महीने में की गई तुलसी पूजा का धार्मिक उत्सव के रूप में समापन भी किया जाता है।

धार्मिक मान्यता में तुलसी विवाह को शुभ और मांगलिक अवसर माना जाता है। इसी वजह से देवउठनी एकादशी के बाद विवाह जैसे शुभ कार्यों की शुरुआत के साथ इसका विशेष संबंध बनाया गया है।

2026 में तुलसी विवाह कब होगा?

2026 में तुलसी विवाह 21 नवंबर, शनिवार को होगा। इस दिन द्वादशी तिथि 21 नवंबर की सुबह 6:31 बजे शुरू होगी और 22 नवंबर की सुबह 4:56 बजे समाप्त होगी। तुलसी विवाह सामान्यतः शाम के समय किया जाता है।

घर पर विवाह कराने वाले लोग तुलसी चौरे को साफ करके तुलसी माता और शालिग्राम जी को स्थापित कर सकते हैं। इसके बाद अपनी पारंपरिक पूजा-पद्धति के अनुसार विवाह की रस्में पूरी करके आरती और प्रसाद वितरण किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह क्यों किया जाता है?

देवउठनी एकादशी के बाद भगवान विष्णु के जागने और मांगलिक कार्यों की शुरुआत की परंपरा है। इसी समय तुलसी और शालिग्राम के विवाह का आयोजन किया जाता है।

तुलसी विवाह में वर किसे माना जाता है?

तुलसी विवाह में शालिग्राम को भगवान विष्णु का स्वरूप मानकर वर के रूप में पूजा जाता है।

तुलसी विवाह की कथा किससे जुड़ी है?

तुलसी विवाह की पौराणिक कथा वृंदा और जलंधर से जुड़ी है। इसी कथा में वृंदा के तुलसी स्वरूप और भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप से विवाह की परंपरा का संबंध बताया जाता है।

तुलसी विवाह घर पर कैसे करें?

तुलसी चौरे की सफाई करके तुलसी माता को सजाएं, शालिग्राम जी को स्थापित करें, दोनों का पूजन करें, वरमाला और कन्यादान की रस्म करें, हवन और अग्नि परिक्रमा के बाद आरती करें।

तुलसी विवाह 2026 में कब है?

2026 में तुलसी विवाह 21 नवंबर, शनिवार को होगा। इस दिन तुलसी माता और भगवान शालिग्राम का विवाह कराया जाएगा।

नवीनतम लेख

सभी लेख देखें
12 नवंबर को मंगल का सिंह राशि में गोचर : 12 राशियों पर क्या होगा असर?

ज्योतिष

12 नवंबर को मंगल का सिंह राशि में गोचर : 12 राशियों पर क्या होगा असर?

12 नवंबर 2026 को मंगल सिंह राशि में प्रवेश करेंगे। गुरु और केतु के साथ मंगल की स्थिति से 12 राशियों के करियर, धन, रिश्ते, साहस और निर्णय क्षमता पर असर पड़ेगा।

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 1, श्लोक 31: अर्जुन द्वारा युद्ध के विपरीत परिणाम का वर्णन करना

भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 1, श्लोक 31: अर्जुन द्वारा युद्ध के विपरीत परिणाम का वर्णन करना

श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 1,श्लोक 31 में अर्जुन युद्ध के विपरीत शकुन, स्वजनों के वध, अनिष्ट परिणाम और कल्याण न दिखाई देने की बात भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं।

श्रुत और श्रोतव्य भोगों का त्याग क्यों जरूरी है? समझिये

आध्यात्म

श्रुत और श्रोतव्य भोगों का त्याग क्यों जरूरी है? समझिये

भगवद्गीता में श्रुत और श्रोतव्य भोगों के त्याग का महत्व, मन की चंचलता, इच्छाओं, आसक्ति, समता, निष्काम कर्म और आत्मज्ञान के मार्ग को सरलता से समझाया गया है।

एक बालक की जिद ! पिता की उदासीनता और विष्णु का प्रसन्न होना ! अमर हुआ ध्रुव

पौराणिक कथाएं

एक बालक की जिद ! पिता की उदासीनता और विष्णु का प्रसन्न होना ! अमर हुआ ध्रुव

भगवान के भक्त ध्रुव महाराज की इस कथा में पांच वर्ष के बालक ध्रुव का अपमान, भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या, नारद से मंत्र प्राप्ति और ध्रुव तारा बनने का प्रसंग है।