भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को किया जाने वाला श्राद्ध पूर्णिमा श्राद्ध, प्रोष्ठपदी पूर्णिमा श्राद्ध और भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध के नाम से जाना जाता है। यह दिन उन पितरों के निमित्त श्राद्ध करने के लिए विशेष माना जाता है, जिनका निधन किसी भी महीने की पूर्णिमा तिथि को हुआ हो। इस दिन पितरों के तर्पण के साथ अगस्त्य मुनि और अन्य ऋषियों के निमित्त भी तर्पण करने की परंपरा है।
साल 2026 में पूर्णिमा श्राद्ध 26 सितंबर, शनिवार को होगा। पंचांग के अनुसार इसी दिन भाद्रपद पूर्णिमा रहेगी।
पूर्णिमा श्राद्ध 2026 की विधि और पिंडदान-
पूर्णिमा श्राद्ध के दिन सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें। इसके बाद श्राद्ध और तर्पण का संकल्प लें। तर्पण के लिए जल में कुशा और काले तिल का प्रयोग किया जाता है। परंपरा के अनुसार दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों को जल अर्पित किया जाता है। जल में काले तिल, कुशा, दूध और जौ मिलाकर तर्पण करने की भी परंपरा है।
श्राद्ध का मुख्य कर्म दिन के कुतुप और रौहिण मुहूर्त में किया जाता है। 26 सितंबर 2026 को अलग-अलग स्थानों के अनुसार इन मुहूर्तों का समय थोड़ा अलग रहेगा। उदाहरण के लिए, प्रयागराज में कुतुप मुहूर्त सुबह 11:30 से 12:18 बजे और रौहिण मुहूर्त 12:18 से 1:06 बजे तक है।
इसके बाद पिंडदान किया जाता है। पके हुए चावल, दूध, घी, शक्कर और काले तिल से पिंड तैयार करके पितरों को अर्पित किए जाते हैं। श्राद्ध कर्म में पंचबलि का भी विशेष स्थान है। भोजन तैयार होने के बाद उसके पांच अंश अलग करके परंपरा के अनुसार गाय, कुत्ते, कौए, देवताओं अथवा अग्नि तथा चींटी जैसे छोटे जीवों के लिए अर्पित किए जाते हैं।
इसके बाद योग्य ब्राह्मण को सम्मानपूर्वक भोजन कराया जाता है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा, वस्त्र, अन्न या तिल का दान किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में श्रद्धा और पितरों के प्रति सम्मान को विशेष महत्व दिया जाता है।
पूर्णिमा श्राद्ध का महत्व और जरूरी सावधानियां-
पूर्णिमा श्राद्ध मुख्य रूप से उन पूर्वजों के लिए किया जाता है, जिनका निधन पूर्णिमा तिथि को हुआ हो। इस दिन अगस्त्य मुनि और अन्य ऋषियों के निमित्त तर्पण की परंपरा भी बताई गई है। इसलिए भाद्रपद पूर्णिमा का यह श्राद्ध पितृ परंपरा में विशेष स्थान रखता है।
यहां एक बात ध्यान रखने योग्य है कि 26 सितंबर का भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध, मुख्य 16-दिवसीय पितृ पक्ष का पहला दिन नहीं माना जाता। पंचांग परंपरा में पितृ पक्ष का मुख्य क्रम अगले दिन, 27 सितंबर की प्रतिपदा से शुरू होता है और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पूरा होता है।
श्राद्ध कर्म सामान्यतः दोपहर के समय किया जाता है। इसमें काले तिल, कुशा, जौ और दूध जैसी सामग्री का प्रयोग परंपरा के अनुसार किया जाता है। भोजन सात्विक रखने और ताजा भोजन तैयार करने की परंपरा है। आपके दिए स्रोत के अनुसार लहसुन, प्याज, मसूर दाल, चना, बैंगन, लौकी और बासी भोजन से भी बचने की बात कही गई है।
श्राद्ध के लिए तांबे, पीतल, चांदी या मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल करने की परंपरा है। लोहे या प्लास्टिक के बर्तनों से श्राद्ध कर्म न करने की सलाह दी जाती है। स्थान और परिवार की परंपरा के अनुसार कुछ विधियों में अंतर हो सकता है, इसलिए अपनी पारिवारिक परंपरा का पालन करना उचित रहता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-पूर्णिमा श्राद्ध 2026 कब किया जाएगा?
पूर्णिमा श्राद्ध 26 सितंबर 2026, शनिवार को किया जाएगा।
2-पूर्णिमा श्राद्ध किन पितरों के लिए किया जाता है?
यह मुख्य रूप से उन पितरों के लिए किया जाता है, जिनका निधन किसी महीने की पूर्णिमा तिथि को हुआ हो।
3-पूर्णिमा श्राद्ध में पिंड किससे बनाए जाते हैं?
परंपरा के अनुसार पके हुए चावल, दूध, घी, शक्कर और काले तिल से पिंड बनाए जाते हैं।
4-पंचबलि में किन्हें भोजन अर्पित किया जाता है?
पंचबलि में गाय, कुत्ते, कौए, देवताओं या अग्नि तथा चींटी जैसे जीवों के लिए भोजन का अंश निकालने की परंपरा है।
5-क्या 26 सितंबर से ही 16 दिन का पितृ पक्ष शुरू होगा?
26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध होगा। मुख्य पितृ पक्ष की प्रतिपदा 27 सितंबर से शुरू होगी और सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को होगी।









