भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान विष्णु को समर्पित परिवर्तिनी एकादशी मनाई जाती है। इसे जलझूलनी एकादशी, पद्मा एकादशी और वामन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस साल यह व्रत 22 सितंबर 2026, मंगलवार को रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 21 सितंबर की रात शुरू होकर 22 सितंबर की रात तक रहेगी और व्रत का पारण 23 सितंबर को किया जाएगा।
धार्मिक मान्यता है कि देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। भाद्रपद शुक्ल एकादशी पर भगवान करवट बदलते हैं। इसी परिवर्तन के कारण इस तिथि को परिवर्तिनी एकादशी कहा गया है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है।
परिवर्तिनी एकादशी क्यों है खास?
परिवर्तिनी एकादशी को भगवान वामन से जोड़कर भी देखा जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसी समय भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण करके दैत्यराज बलि से तीन पग भूमि मांगी थी। आगे चलकर यही तीन पग पूरी सृष्टि को नापने वाले प्रसंग में बदल गए।
राजस्थान और उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में इस पर्व को जलझूलनी एकादशी के रूप में मनाने की परंपरा है। कई स्थानों पर भगवान कृष्ण या विष्णु के बाल स्वरूप को सुंदर पालकी में विराजमान करके शोभायात्रा निकाली जाती है। इसके बाद उन्हें नदी, तालाब या सरोवर के पास ले जाकर जल-विहार कराया जाता है। इस आयोजन में भक्ति के साथ लोक परंपराओं की भी सुंदर झलक देखने को मिलती है।
एकादशी व्रत को लेकर धार्मिक मान्यता है कि नियमपूर्वक इसका पालन करने से व्यक्ति को पुण्य प्राप्त होता है और जाने-अनजाने किए गए पापों से मुक्ति मिलती है। कुछ परंपराओं में इसका फल वाजपेय यज्ञ के समान बताया गया है। व्रत के दौरान सात्विक भोजन और संयमित दिनचर्या रखने की परंपरा है। प्याज, लहसुन, मांस और मदिरा से दूर रहने की सलाह दी जाती है।
ऐसे करें पूजा, जानें भोग और परिवर्तिनी एकादशी की कथा-
व्रत वाले दिन सुबह स्नान करके भगवान विष्णु का ध्यान करें और श्रद्धा के साथ उपवास का संकल्प लें। इसके बाद पूजा स्थान की सफाई करके भगवान विष्णु या उनके वामन स्वरूप की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करें।
पूजा में भगवान को पंचामृत से स्नान कराने के बाद रोली, चंदन, अक्षत, पीले फूल, पीले वस्त्र और तुलसी पत्र अर्पित करें। धूप-दीप जलाकर परिवर्तिनी एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें और अंत में भगवान विष्णु की आरती करें।
भोग में माखन-मिश्री, मौसमी फल, बेसन के लड्डू या खीर अर्पित की जा सकती है। भगवान के भोग में तुलसी दल रखने की परंपरा है। इस दिन जरूरतमंद लोगों को छाता, जूते, अन्न, दही और तांबे के बर्तन का दान करना भी शुभ माना जाता है। एकादशी व्रत में अनाज से बचने की परंपरा है और विशेष रूप से चावल का सेवन नहीं किया जाता। व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में शुभ समय देखकर किया जाता है।
परिवर्तिनी एकादशी की कथा-
धर्मराज युधिष्ठिर को भगवान कृष्ण ने परिवर्तिनी एकादशी की कथा सुनाई थी। त्रेतायुग में दैत्यराज बलि अपनी दानशीलता और धर्मपरायणता के लिए प्रसिद्ध था। अपनी शक्ति के बल पर उसने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। देवताओं की चिंता दूर करने के लिए भगवान विष्णु ने वामन रूप में अवतार लिया।
वामन देव एक छोटे ब्राह्मण का रूप धारण करके राजा बलि के यज्ञ में पहुंचे। उन्होंने बलि से केवल तीन पग भूमि मांग ली। गुरु शुक्राचार्य ने राजा बलि को सावधान किया, लेकिन बलि अपने वचन से पीछे नहीं हटा।
वचन मिलते ही वामन देव ने विराट स्वरूप धारण कर लिया। उनके पहले चरण ने पृथ्वी और दूसरे चरण ने स्वर्ग लोक को नाप लिया। अब तीसरे चरण के लिए कोई स्थान शेष नहीं था। तब राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया और कहा कि तीसरा कदम उनके सिर पर रखा जाए।
बलि की भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का स्वामी बना दिया। धार्मिक कथा के अनुसार, भगवान स्वयं बलि के द्वारपाल बनकर उनके साथ रहने लगे। बाद में माता लक्ष्मी ने बलि को रक्षासूत्र बांधकर भगवान विष्णु को वापस ले जाने का आग्रह किया। इसी कथा परंपरा में भगवान के पाताल लोक में रहने और भाद्रपद शुक्ल एकादशी पर करवट बदलने का संबंध बताया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-परिवर्तिनी एकादशी 2026 कब मनाई जाएगी?
परिवर्तिनी एकादशी 22 सितंबर 2026, मंगलवार को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि 21 सितंबर की रात से शुरू होकर 22 सितंबर की रात तक रहेगी।
2-परिवर्तिनी एकादशी को किन नामों से जाना जाता है?
इसे परिवर्तिनी एकादशी के अलावा जलझूलनी एकादशी, पद्मा एकादशी और वामन एकादशी भी कहा जाता है।
3-परिवर्तिनी एकादशी पर भगवान विष्णु की करवट बदलने का क्या अर्थ है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार देवशयनी एकादशी से योगनिद्रा में गए भगवान विष्णु भाद्रपद शुक्ल एकादशी पर करवट बदलते हैं, इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।
4-परिवर्तिनी एकादशी पर क्या भोग लगाना चाहिए?
भगवान विष्णु को माखन-मिश्री, फल, बेसन के लड्डू या खीर का भोग लगाया जा सकता है। भोग में तुलसी दल रखने की परंपरा है।
5-परिवर्तिनी एकादशी व्रत का पारण कब किया जाता है?
व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद शुभ समय देखकर किया जाता है। 2026 में पारण 23 सितंबर को होगा।









