धन और समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी को समर्पित महालक्ष्मी व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और आर्थिक परेशानियों से राहत की कामना की जाती है।
महालक्ष्मी व्रत भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से शुरू होकर आश्विन कृष्ण अष्टमी तक चलता है। इस बार व्रत की शुरुआत 19 सितंबर 2026 से होगी और समापन 3 अक्टूबर 2026 को होगा। पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि 18 सितंबर दोपहर 1 बजे शुरू होकर 19 सितंबर दोपहर 3:26 बजे समाप्त होगी, इसलिए व्रत का आरंभ 19 सितंबर से माना जा रहा है।
ज्योतिषीय मान्यताओं में इस व्रत के दौरान राशि के तत्व के अनुसार पूजा और उपाय करने की बात कही गई है। अग्नि, पृथ्वी, वायु और जल तत्व से जुड़ी राशियों के लिए अलग-अलग उपाय बताए गए हैं।
राशि के तत्व के अनुसार महालक्ष्मी व्रत में करें ये उपाय-
मेष, सिंह और धनु राशि अग्नि तत्व से जुड़ी मानी जाती हैं, जबकि वृषभ, कन्या और मकर पृथ्वी तत्व की राशियां हैं। इन छह राशियों के जातक महालक्ष्मी व्रत के दौरान मां लक्ष्मी के सामने घी का दीपक जला सकते हैं और कनकधारा स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं। धार्मिक-ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार इससे आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।
मिथुन, तुला और कुंभ वायु तत्व की राशियां हैं। इन राशि वालों को पूजा के समय सफेद वस्त्र पहनना चाहिए। यह शुभ माना गया है। मां लक्ष्मी को कौड़ियां और कमल का फूल अर्पित करें। इससे आपके घर में सुख समृद्धि आएगी।
वहीं कर्क, वृश्चिक और मीन जल तत्व की राशियां हैं। इन जातकों को महालक्ष्मी व्रत में दूध से बनी खीर का भोग लगाकर 16 कन्याओं में बांटना चाहिए। इससे आपके घर में अवश्य ही धन-धान्य और सुख-समृद्धि आएगी।
इन उपायों को ज्योतिषीय मान्यता के रूप में देखना चाहिए। किसी व्यक्ति के लिए उपायों का प्रभाव उसकी व्यक्तिगत जन्मकुंडली के अनुसार अलग हो सकता है।
16 धागों का डोरा, दैनिक पूजा और उद्यापन की विधि-
महालक्ष्मी व्रत के पहले दिन स्नान आदि से निवृत्त होकर 16 तारों या धागों का डोरा तैयार करने की परंपरा है। इसमें 16 गांठें लगाई जाती हैं और मां लक्ष्मी की पूजा के बाद इसे कलाई पर बांधा जाता है। यह व्रत की अवधि में विशेष धार्मिक प्रतीक के रूप में रखा जाता है।
व्रत के दौरान सुबह और शाम मां लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। पूजा में धूप और दीप जलाकर कमल गट्टे, लाल फूल और मिष्ठान अर्पित किए जाते हैं। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार मां लक्ष्मी का ध्यान और स्तुति करते हैं।
व्रत के अंतिम दिन यानी आश्विन कृष्ण अष्टमी पर विशेष पूजा की जाती है। इसके बाद 16 मीठे पुए या पूड़ियों का भोग लगाने और व्रत का उद्यापन करने की परंपरा है। सुहागिन महिलाओं को दान-दक्षिणा देकर उनका सम्मान भी किया जाता है।
महालक्ष्मी व्रत में इन बातों का रखें ध्यान-
व्रत के दौरान कुछ बातों का विशेष ध्यान रखने की परंपरा है। इस अवधि में काले रंग के कपड़े पहनने से बचना चाहिए। किसी के साथ बेवजह विवाद न करें और मन में किसी के प्रति गलत भावना न रखें।
घर की साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए। पूजा स्थल को स्वच्छ रखें और पूरे व्रत के दौरान सात्विक वातावरण बनाए रखें। तामसिक भोजन और ऐसी चीजों से दूर रहने की परंपरा है जो व्रत की सात्विक भावना के अनुकूल न हों।
महालक्ष्मी व्रत का मुख्य भाव मां लक्ष्मी के प्रति श्रद्धा, संयम और स्वच्छता के साथ पूजा करना है। राशि के अनुसार बताए गए उपायों के साथ यदि साधक अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंदों की सहायता और दान-पुण्य भी करे तो धार्मिक दृष्टि से इसे शुभ माना जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-महालक्ष्मी व्रत 2026 कब से शुरू होगा?
महालक्ष्मी व्रत 2026 की शुरुआत 19 सितंबर से होगी और इसका समापन 3 अक्टूबर को होगा।
2-महालक्ष्मी व्रत कितने दिनों तक किया जाता है?
परंपरागत रूप से यह व्रत 16 दिनों का माना जाता है। हालांकि तिथियों के घटने-बढ़ने के कारण किसी वर्ष वास्तविक उपवास के दिनों की संख्या 15 या 17 भी हो सकती है। 2026 में पंचांग के अनुसार 15 व्रत दिवस बताए गए हैं।
3-महालक्ष्मी व्रत में 16 धागों के डोरे का क्या महत्व है?
व्रत के पहले दिन 16 तारों से डोरा बनाकर उसमें 16 गांठें लगाने और पूजा के बाद कलाई पर बांधने की परंपरा है।
4-राशि के अनुसार महालक्ष्मी व्रत में क्या उपाय करें?
अग्नि और पृथ्वी तत्व की राशियों के लिए घी का दीपक और कनकधारा स्तोत्र, वायु तत्व के लिए सफेद वस्त्र, कौड़ी और कमल तथा जल तत्व की राशियों के लिए खीर का भोग और कन्याओं को बांटने का उपाय बताया गया है।
5-महालक्ष्मी व्रत का उद्यापन कैसे किया जाता है?
अंतिम दिन मां लक्ष्मी की विशेष पूजा के बाद 16 मीठे पुए या पूड़ियों का भोग लगाने और सुहागिन महिलाओं को दान-दक्षिणा देने की परंपरा है।









