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शारदीय नवरात्रि 2026 : मां सिद्धिदात्री की पूजा कैसे करें? जानें मंत्र, भोग, विधि और शुभ मुहूर्त

शारदीय नवरात्रि के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा होती है। जानें देवी का स्वरूप, भगवान शिव से जुड़ी कथा, पूजा विधि, मंत्र, भोग, शुभ मुहूर्त, कन्या पूजन और धार्मिक महत्व भी।

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Maa Siddhidatri Puja 2026

नवरात्रि के अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा होती है। नवदुर्गा में मां सिद्धिदात्री नौवां स्वरूप हैं। उनका नाम दो शब्दों से बना है-‘सिद्धि’ यानी विशेष शक्ति या पूर्णता और ‘दात्री’ यानी देने वाली। इसलिए मां सिद्धिदात्री को सिद्धियां प्रदान करने वाली देवी कहा जाता है।

मां का स्वरूप शांत और सौम्य है। उनके चार हाथ हैं और वह कमल पर विराजमान रहती हैं। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल होता है। कई चित्रणों में उनका वाहन सिंह भी बताया जाता है।

मां सिद्धिदात्री का स्वरूप कैसा है?

मां सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली देवी हैं। उनके ऊपर के दोनों हाथों में शंख और चक्र होते हैं, जबकि नीचे के हाथों में गदा और कमल रहता है।माता का आसन कमल है और उनका चेहरा शांत दिखाई देता है। मां का यह स्वरूप ज्ञान, शक्ति और साधना की पूर्णता से जुड़ा है। मां सिद्धिदात्री की पूजा केवल नवरात्रि के अंतिम दिन ही नहीं, बल्कि साधना और आध्यात्मिक उन्नति की कामना से भी की जाती है।

मां सिद्धिदात्री की पौराणिक कथा-

पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां सिद्धिदात्री की कृपा से भगवान शिव को आठ सिद्धियां प्राप्त हुई थीं। इन्हीं सिद्धियों के कारण भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ और वे अर्धनारीश्वर स्वरूप में प्रकट हुए।

मां सिद्धिदात्री की आराधना से साधक को ज्ञान और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है। देवी अपने भक्तों की साधना को पूर्णता देने वाली मानी जाती हैं। इसी कारण नवरात्रि के अंतिम दिन माता की पूजा में मन को एकाग्र करके साधना, मंत्र जाप और ध्यान किया जाता है।

19 और 20 अक्टूबर 2026 को महानवमी की पूजा-

साल 2026 में महानवमी तिथि 19 अक्टूबर, सोमवार सुबह 10:51 बजे शुरू होगी और 20 अक्टूबर, मंगलवार दोपहर 12:50 बजे तक रहेगी। 19 अक्टूबर को नवमी तिथि शुरू होने के बाद नवमी पूजा, हवन और अन्य अनुष्ठान किए जा सकते हैं। वहीं उदयातिथि को मानने वाले श्रद्धालु 20 अक्टूबर की सुबह मां सिद्धिदात्री की पूजा, कन्या पूजन और हवन कर सकते हैं।

20 अक्टूबर को अभिजित मुहूर्त लगभग सुबह 11:43 बजे से दोपहर 12:28 बजे तक रहेगा। विजय मुहूर्त दोपहर 1:59 बजे से 2:45 बजे तक रहेगा। इन समयों में स्थानीय पंचांग के अनुसार थोड़ा अंतर हो सकता है।

मां सिद्धिदात्री की पूजा विधि-

महानवमी के दिन सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें और पूजा स्थान को साफ करें। मां सिद्धिदात्री की तस्वीर या प्रतिमा के सामने दीपक जलाएं। माता को जल, अक्षत, रोली, धूप और दीप अर्पित करें। मां को लाल फूल, विशेष रूप से गुड़हल के फूल चढ़ाए जा सकते हैं। इसके बाद फल, मिठाई और अन्य सात्विक नैवेद्य अर्पित करें।

मां सिद्धिदात्री का ध्यान करते हुए उनके मंत्र का जाप करें। इसके बाद मां की आरती करें और अपनी मनोकामना के लिए प्रार्थना करें। महानवमी पर पूजा के बाद हवन और कन्या पूजन करने की भी परंपरा है। कन्याओं के पैर धोकर उन्हें तिलक लगाएं और हलवा, पूरी तथा चने का प्रसाद खिलाएं। अपनी श्रद्धा के अनुसार उन्हें दक्षिणा या उपहार दें।

मां सिद्धिदात्री का मंत्र और स्तुति

मां सिद्धिदात्री का सरल मंत्र है-ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥

माता की स्तुति के लिए यह श्लोक पढ़ सकते हैं-

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥

मां की पूजा में “या देवी सर्वभूतेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता...” का पाठ भी किया जा सकता है।

मां सिद्धिदात्री को क्या भोग लगाएं?

मां सिद्धिदात्री को तिल का भोग लगाया जाता है। इसके अलावा महानवमी पर हलवा, पूरी, काले चने, खीर और नारियल भी प्रसाद में रखे जाते हैं। नवरात्रि की पूर्णाहुति के समय बनाए गए प्रसाद को कन्याओं और परिवार के लोगों में बांटें। जरूरतमंदों को भोजन कराने की भी परंपरा है।

मां सिद्धिदात्री की पूजा का महत्व-

मां सिद्धिदात्री की पूजा साधना में पूर्णता, ज्ञान और आध्यात्मिक शक्ति की कामना के लिए की जाती है। माता को सभी प्रकार की सिद्धियां देने वाली देवी माना जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों की पूजा के बाद महानवमी पर हवन और कन्या पूजन करके नवरात्रि साधना को पूर्ण किया जाता है।

माता से परिवार की सुख-शांति, सफलता और मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना की जाती है। मां सिद्धिदात्री का स्वरूप नवरात्रि की साधना के अंतिम चरण को दर्शाता है, जहां भक्त पूजा और ध्यान के साथ देवी की कृपा की कामना करता है।

महानवमी पर कन्या पूजन और हवन-

महानवमी पर कन्या पूजन का विशेष महत्व है। छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनके पैर धोए जाते हैं, तिलक लगाया जाता है और भोजन कराया जाता है। हलवा, पूरी और काले चने का प्रसाद कन्याओं को खिलाने के बाद उन्हें दक्षिणा या उपहार दिया जाता है। इसके बाद अपनी श्रद्धा के अनुसार हवन और पूर्णाहुति की जाती है। नवरात्रि की साधना पूरी होने पर मां दुर्गा से परिवार की सुख-शांति और सभी के कल्याण की प्रार्थना की जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1-नवरात्रि के नौवें दिन किस देवी की पूजा होती है?

नवरात्रि के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा होती है। वह नवदुर्गा का नौवां और अंतिम स्वरूप हैं।

2-मां सिद्धिदात्री का वाहन क्या है?

मां सिद्धिदात्री का वाहन सिंह बताया जाता है और उनका आसन कमल है।

3-मां सिद्धिदात्री को कौन सा भोग लगाना चाहिए?

मां सिद्धिदात्री को तिल का भोग लगाया जाता है। महानवमी पर हलवा, पूरी, काले चने, खीर और नारियल भी चढ़ाए जाते हैं।

4-मां सिद्धिदात्री का मंत्र क्या है?

मां सिद्धिदात्री का सरल मंत्र है- ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥

5-महानवमी पर कन्या पूजन क्यों किया जाता है?

महानवमी पर कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है। उन्हें भोजन कराने और दक्षिणा देने के बाद नवरात्रि पूजा की पूर्णता मानी जाती है।

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