विजयादशमी यानी दशहरा केवल रावण दहन का पर्व नहीं है। इस दिन शस्त्र पूजा और आयुध पूजा की भी विशेष परंपरा है। मान्यता है कि विजयादशमी पर अपराजिता देवी की पूजा के बाद अस्त्र-शस्त्रों का पूजन किया जाता है। शस्त्र पूजा को शक्ति, साहस, सुरक्षा और विजय से जोड़कर देखा जाता है।
वर्ष 2026 में दशमी तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 12:50 बजे शुरू होगी और 21 अक्टूबर को दोपहर 2:11 बजे समाप्त होगी। वहीं श्रवण नक्षत्र 19 अक्टूबर को दोपहर 3:38 बजे शुरू होकर 20 अक्टूबर की शाम 6:02 बजे तक रहेगा। विजयादशमी पर पूजा के बाद शाम को रावण दहन देखने की परंपरा भी निभाई जाती है।
विजयादशमी पर शस्त्र पूजा का धार्मिक महत्व-
शस्त्र पूजा को विजयादशमी की मूल भावना से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह पर्व अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। इसी कारण इस दिन शक्ति और विजय के साधनों की पूजा करने की परंपरा बनी।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवी दुर्गा ने महिषासुर के साथ युद्ध किया था। देवताओं ने उन्हें अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए थे। महिषासुर पर विजय के बाद शक्ति के इन साधनों के सम्मान की परंपरा से भी शस्त्र पूजा को जोड़ा जाता है।
विजयादशमी का संबंध भगवान श्रीराम की रावण पर विजय से भी है। धार्मिक परंपरा में यह मान्यता प्रचलित है कि लंका पर विजय के लिए जाने से पहले श्रीराम ने देवी अपराजिता की आराधना की थी। इसके बाद उन्होंने अपने शस्त्रों का पूजन किया और युद्ध के लिए प्रस्थान किया।
शस्त्र पूजा केवल हथियारों की पूजा तक सीमित नहीं है। इसे वीरता, आत्मबल और सुरक्षा के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। मान्यता है कि विजयादशमी पर शस्त्रों का पूजन करने से साहस और शक्ति की भावना मजबूत होती है और व्यक्ति अपने कार्यों में सफलता के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता है।
पांडवों की शमी कथा से जुड़ी है परंपरा-
विजयादशमी पर शमी वृक्ष और शस्त्र पूजा की एक प्रसिद्ध कथा महाभारत से जुड़ी है। पौराणिक कथा के अनुसार, अज्ञातवास के समय पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र शमी वृक्ष पर छिपाकर रख दिए थे। अज्ञातवास पूरा होने के बाद उन्होंने दशमी तिथि पर इन शस्त्रों को वापस निकाला और उनका पूजन किया। इसके बाद युद्ध में उन्हें विजय प्राप्त हुई।
इसी कथा के कारण दशहरा पर शमी वृक्ष की पूजा और उससे जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों का महत्व बताया जाता है। कई स्थानों पर लोग शमी के पत्तों का पूजन करके उन्हें एक-दूसरे को शुभकामना के रूप में देते हैं।
प्राचीन समय में राजा और योद्धा भी विजयादशमी के दिन अपने अस्त्र-शस्त्रों की सफाई और पूजा करते थे। युद्ध पर जाने से पहले शस्त्रों को तैयार करना और उनकी पूजा करना शक्ति, सुरक्षा और विजय की कामना से जुड़ा हुआ था। आज भी विभिन्न स्थानों पर सेना और पुलिस से जुड़े आयोजनों में शस्त्र पूजा की परंपरा देखने को मिलती है।
शस्त्र पूजा का एक दूसरा भाव कृतज्ञता से भी जुड़ा है। जिन साधनों से व्यक्ति अपना काम करता है, अपनी सुरक्षा करता है या आजीविका चलाता है, उनके प्रति सम्मान प्रकट करना भी इस परंपरा का हिस्सा है।
इसी वजह से आज के समय में आयुध पूजा का दायरा केवल तलवार, धनुष या दूसरे अस्त्रों तक सीमित नहीं है। व्यापारी अपने प्रतिष्ठान और मशीनों की पूजा करते हैं, वाहन मालिक अपने वाहनों की पूजा करते हैं और अलग-अलग काम से जुड़े लोग अपने औजारों को साफ करके उनका पूजन करते हैं। कई लोग किताबों, कंप्यूटर और काम में इस्तेमाल होने वाली दूसरी वस्तुओं को भी पूजा में शामिल करते हैं।
इस तरह विजयादशमी पर होने वाली शस्त्र पूजा पुरानी युद्ध परंपरा के साथ-साथ आज के जीवन में काम आने वाले साधनों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भी भाव रखती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-विजयादशमी 2026 कब मनाई जाएगी?
वर्ष 2026 में विजयादशमी 20 अक्टूबर, मंगलवार को मनाई जाएगी।
2-दशहरा पर शस्त्र पूजा क्यों की जाती है?
शस्त्र पूजा को शक्ति, साहस, सुरक्षा और विजय का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इसे भगवान श्रीराम और देवी दुर्गा की विजय से भी जोड़ा जाता है।
3-विजयादशमी पर शमी वृक्ष की पूजा क्यों होती है?
पौराणिक कथा के अनुसार, पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र अज्ञातवास के दौरान शमी वृक्ष पर छिपाए थे। अज्ञातवास पूरा होने पर उन्होंने इन्हें निकालकर पूजा की थी।
4-क्या विजयादशमी पर केवल शस्त्रों की ही पूजा होती है?
नहीं। आज आयुध पूजा में औजार, मशीन, वाहन, किताबें और कामकाज में इस्तेमाल होने वाली दूसरी वस्तुओं को भी शामिल किया जाता है।
5-विजयादशमी पर रावण दहन क्यों किया जाता है?
रावण दहन भगवान श्रीराम की रावण पर विजय की स्मृति में किया जाता है। इसे धर्म की अधर्म और सत्य की असत्य पर विजय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।









