दीपावली (Diwali) पर घर में सुख-समृद्धि और शुभता के लिए मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। इस दिन नई लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति खरीदकर उनकी विधि-विधान से पूजा करने की परंपरा है। इसी के साथ पूजा में खील-बताशे भी रखे जाते हैं और प्रसाद के रूप में बांटे जाते हैं। इन दोनों परंपराओं का धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है।
हर साल नई लक्ष्मी-गणेश मूर्ति क्यों खरीदते हैं?
दीपावली की पूजा के लिए नई लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति खरीदने की परंपरा शुभ मानी जाती है। नई मूर्ति घर में नई ऊर्जा, नए संकल्प और समृद्धि के स्वागत का प्रतीक मानी जाती है। मां लक्ष्मी धन, वैभव और सुख-समृद्धि की देवी हैं, जबकि भगवान गणेश विघ्नों को दूर करने वाले और शुभ कार्यों के देवता हैं।
इसलिए दीपावली की पूजा में दोनों की साथ में पूजा की जाती है। नई मूर्ति खरीदकर उसकी पूजा करने का भाव यह भी है कि परिवार नए वर्ष में सुख, शांति और समृद्धि की कामना के साथ आगे बढ़े।
पुरानी लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों का क्या करें?
दीपावली पर नई मूर्ति स्थापित करने के बाद पुरानी पूजा की मूर्तियों को इधर-उधर रखना उचित नहीं माना जाता। यदि पुरानी मूर्ति पूजा योग्य स्थिति में है, तो उसे घर के पूजा स्थान में सम्मान के साथ रखा जा सकता है। यदि मूर्ति खंडित हो गई हो, तो उसे सामान्य कचरे में नहीं डालना चाहिए।
ऐसी स्थिति में धार्मिक रीति से उसका सम्मानपूर्वक विसर्जन करना उचित रहता है। नई मूर्ति स्थापित करने का अर्थ पुरानी मूर्ति का अपमान करना नहीं है, बल्कि दीपावली की विशेष पूजा के लिए नई प्रतिमा के साथ नए शुभ संकल्प की शुरुआत करना है।
खील-बताशे क्यों चढ़ाए जाते हैं?
दीपावली की लक्ष्मी पूजा में खील और बताशे का विशेष स्थान है। खील मुख्य रूप से धान से तैयार होती है, इसलिए इसका संबंध अन्न और समृद्धि से जोड़ा जाता है। बताशे मिठास का प्रतीक हैं। पूजा में इन्हें अर्पित करने का भाव जीवन में सुख, मधुरता और समृद्धि की कामना से जुड़ा है।
दीपावली के समय नई फसल और अन्न से जुड़ी चीजों का महत्व भी बढ़ जाता है। इसलिए खील-बताशे को पूजा की सामग्री और प्रसाद के रूप में शामिल करने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है।
लक्ष्मी पूजा में खील-बताशे का धार्मिक महत्व-
खील को अन्न और समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है, जबकि बताशे जीवन में मिठास और प्रसन्नता का प्रतीक माने जाते हैं। लक्ष्मी पूजा में इन्हें अर्पित करना परिवार की सुख-समृद्धि और अन्न-धन की कामना से जुड़ा है। पूजा के बाद खील-बताशे को प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में बांटा जाता है। इस तरह यह परंपरा पूजा के धार्मिक भाव के साथ परिवार में खुशी और मिठास बांटने का संदेश भी देती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-दीपावली पर नई लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति क्यों खरीदी जाती है?
दीपावली पर नई लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति खरीदना नई शुरुआत, शुभता और सुख-समृद्धि के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। इसी नई मूर्ति की विशेष पूजा की जाती है।
2-पुरानी लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति का क्या करना चाहिए?
यदि पुरानी मूर्ति सही स्थिति में है, तो उसे पूजा स्थान में सम्मानपूर्वक रखा जा सकता है। खंडित मूर्ति को घर में सामान्य वस्तु की तरह नहीं रखना चाहिए और सम्मानपूर्वक विसर्जित करना उचित है।
3-दीपावली की पूजा में खील क्यों चढ़ाई जाती है?
खील धान से तैयार होती है और इसे अन्न तथा समृद्धि से जोड़ा जाता है। इसलिए लक्ष्मी पूजा में खील अर्पित करने की परंपरा है।
4-लक्ष्मी पूजा में बताशे क्यों चढ़ाते हैं?
बताशे मिठास और प्रसन्नता का प्रतीक हैं। इन्हें मां लक्ष्मी को अर्पित कर परिवार के सुख, शांति और जीवन में मिठास की कामना की जाती है।
5-क्या खील-बताशे पूजा के बाद प्रसाद के रूप में खा सकते हैं?
हां, पूजा में अर्पित किए गए खील-बताशे को प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में बांटा जा सकता है।









