छठ पूजा सूर्यदेव की आराधना के साथ छठी मैया की पूजा का भी प्रमुख पर्व है। इस पर्व में संतान की सुख-समृद्धि, परिवार के मंगल और सूर्यदेव की कृपा की कामना की जाती है। लेकिन छठी मैया कौन हैं और सूर्यदेव के साथ उनकी पूजा क्यों की जाती है, इसकी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा है।
छठ पूजा में छठी मैया और सूर्यदेव की पूजा क्यों होती है?
छठ पूजा को सूर्य उपासना का प्रमुख पर्व माना जाता है। भगवान सूर्य को जीवन, ऊर्जा और प्रकाश का आधार मानकर उनकी आराधना की जाती है। छठ के चार दिनों में सूर्यदेव को विशेष रूप से अर्घ्य दिया जाता है और व्रती परिवार के सुख, स्वास्थ्य तथा समृद्धि की कामना करते हैं। 2026 में छठ पूजा का मुख्य पर्व 15 नवंबर को होगा, जबकि चार दिवसीय आयोजन 13 नवंबर से 16 नवंबर तक चलेगा।
छठ में सूर्यदेव के साथ छठी मैया की पूजा भी की जाती है। छठी मैया को षष्ठी देवी के रूप में जाना जाता है। पौराणिक कथा में उन्हें बालकों की अधिष्ठात्री, उनकी रक्षा करने वाली और संतान प्रदान करने वाली देवी बताया गया है।
लोकपरंपरा में छठी मैया को सूर्यदेव की बहन भी कहा जाता है। इसी वजह से छठ पर्व में सूर्यदेव की आराधना के साथ छठी मैया की पूजा का भी विशेष महत्व जुड़ गया है। हालांकि षष्ठी देवी की पौराणिक कथा और सूर्यदेव से उनका भाई-बहन का संबंध अलग-अलग परंपराओं में अलग ढंग से बताया जाता है।
छठी मैया कौन हैं? जानें षष्ठी देवी का स्वरूप-
ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा में षष्ठी देवी को प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न देवी बताया गया है। उन्हें बालकों की अधिष्ठात्री देवी, बालकों की रक्षा करने वाली और संतान प्रदान करने वाली देवी कहा गया है। इसी कारण संतान के जन्म और बच्चों से जुड़े शुभ अवसरों पर भी षष्ठी देवी की पूजा की परंपरा बताई गई है।
इसी षष्ठी देवी का संबंध आगे चलकर छठ पर्व की लोकआस्था से जुड़ता है। कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन होने वाली पूजा के कारण आम बोलचाल में उन्हें छठी मैया कहा जाने लगा। छठ पर्व में उनकी आराधना परिवार और संतान के मंगल की कामना के साथ की जाती है।
सूर्यदेव की पूजा का पक्ष भी इसी पर्व में उतना ही महत्वपूर्ण है। सूर्य को जीवन और ऊर्जा का आधार मानते हुए उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। इस तरह छठ में सूर्यदेव और छठी मैया की पूजा के दो प्रमुख भाव दिखाई देते हैं-सूर्य से जीवन और ऊर्जा की प्रार्थना तथा छठी मैया से परिवार और संतान के मंगल की कामना।
राजा प्रियव्रत और षष्ठी देवी की पौराणिक कथा-
पौराणिक कथाओं के अनुसार, स्वायम्भुव मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत का विवाह मालिनी से हुआ था। काफी समय बीतने के बाद भी उन्हें संतान की प्राप्ति नहीं हुई। राजा की इच्छा पूरी करने के लिए महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराया। यज्ञ के बाद रानी मालिनी गर्भवती हुईं और लंबे समय बाद उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया। लेकिन जन्म के समय वह बालक मृत था।
पुत्र को मृत देखकर राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी अत्यंत दुखी हो गए। राजा बालक को लेकर श्मशान की ओर चले गए और पुत्र-वियोग में अपना जीवन समाप्त करने का विचार करने लगे। तभी वहां एक दिव्य देवी के प्रकट होने की कथा आती है।
राजा ने देवी को देखकर उनकी स्तुति और पूजा की। देवी ने अपना परिचय देवसेना के रूप में दिया और बताया कि उन्हें षष्ठी भी कहा जाता है। उन्होंने स्वयं को बालकों की रक्षा करने वाली और संतान देने वाली देवी बताया।
कथा के अनुसार, देवी ने उस मृत बालक को अपने हाथों में लेकर उसे जीवित कर दिया। इसके बाद उन्होंने राजा से अपनी पूजा कराने के लिए कहा। देवी के आशीर्वाद से राजा को पुत्र प्राप्त हुआ और वह पुत्र आगे चलकर यशस्वी हुआ। राजा प्रियव्रत ने इसके बाद षष्ठी देवी की पूजा का प्रचार किया और प्रत्येक शुक्ल षष्ठी को उनके पूजन की परंपरा शुरू कराई।
यही कथा छठी मैया की पूजा से जुड़ी सबसे प्रमुख कथाओं में गिनी जाती है। इसमें षष्ठी देवी को विशेष रूप से संतान की रक्षा, आयु और कल्याण से जुड़ी देवी के रूप में देखा जाता है।
छठ पूजा में डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य क्यों देते हैं?
छठ पर्व की सबसे खास परंपराओं में से एक है डूबते और उगते दोनों सूर्य को अर्घ्य देना। आमतौर पर सूर्य की उपासना में उगते सूर्य को प्रणाम किया जाता है, लेकिन छठ में अस्त होते सूर्य को भी समान श्रद्धा से अर्घ्य दिया जाता है।
संध्या अर्घ्य के समय डूबते सूर्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। यह भाव बताता है कि सूर्य की शक्ति केवल उदय के समय ही नहीं, बल्कि पूरे दिन जीवन को ऊर्जा देने वाली है। अगले दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देकर नई ऊर्जा, प्रकाश और जीवन के लिए प्रार्थना की जाती है।
छठ के तीसरे दिन संध्या अर्घ्य और चौथे दिन उषा अर्घ्य होता है। 2026 में संध्या अर्घ्य 15 नवंबर और उषा अर्घ्य 16 नवंबर को होगा।
इस परंपरा में एक और सुंदर भाव दिखाई देता है-उगते सूर्य के साथ-साथ अस्त होते सूर्य का सम्मान। यानी जीवन में सफलता और शक्ति के साथ उसके उतार-चढ़ाव को भी श्रद्धा से स्वीकार करना।
छठी मैया और सूर्यदेव से क्या प्रार्थना की जाती है?
छठ पूजा में व्रती सूर्यदेव से परिवार के स्वास्थ्य, सुख, ऊर्जा और समृद्धि की कामना करते हैं। सूर्यदेव को जीवनदायी शक्ति का प्रतीक मानकर उनके प्रति श्रद्धा प्रकट की जाती है।
वहीं छठी मैया से संतान की रक्षा, उसकी लंबी आयु, परिवार के कल्याण और सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। षष्ठी देवी की पौराणिक कथा में भी उन्हें बालकों की रक्षक और संतान प्रदान करने वाली देवी के रूप में बताया गया है।
इसलिए छठ पर्व केवल सूर्य को अर्घ्य देने का त्योहार नहीं है। इसके पीछे सूर्यदेव के प्रति कृतज्ञता और छठी मैया से परिवार के मंगल की कामना, दोनों भाव जुड़े हुए हैं।
छठ पूजा 2026 में 13 नवंबर से 16 नवंबर तक होगी। 13 नवंबर को नहाय-खाय, 14 नवंबर को खरना, 15 नवंबर को संध्या अर्घ्य और 16 नवंबर को उषा अर्घ्य के साथ पर्व का समापन होगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
छठी मैया कौन हैं?
छठी मैया को षष्ठी देवी के रूप में पूजा जाता है। उन्हें बच्चों की रक्षक और संतान से जुड़ी देवी माना जाता है।
छठ पूजा में सूर्यदेव की पूजा क्यों होती है?
सूर्यदेव को जीवन, ऊर्जा और प्रकाश का आधार मानकर उनकी आराधना की जाती है। छठ में उनके प्रति कृतज्ञता और परिवार के मंगल की कामना की जाती है।
छठी मैया और सूर्यदेव का क्या संबंध है?
लोकपरंपरा में छठी मैया को सूर्यदेव की बहन माना जाता है। इसी मान्यता के कारण छठ में सूर्यदेव और छठी मैया दोनों की पूजा की जाती है।
छठ पूजा की प्रमुख पौराणिक कथा किससे जुड़ी है?
छठ की प्रमुख कथाओं में राजा प्रियव्रत और षष्ठी देवी की कथा शामिल है। इसमें षष्ठी देवी द्वारा राजा के मृत बालक को जीवन देने और बाद में उनकी पूजा की परंपरा शुरू होने की कथा है।
छठ पूजा 2026 में कब होगी?
छठ पूजा 2026 में 13 नवंबर से 16 नवंबर तक होगी। 15 नवंबर को संध्या अर्घ्य और 16 नवंबर को उषा अर्घ्य दिया जाएगा।









