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वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग 23 : सरयू-गंगा संगम के पवित्र आश्रम में श्रीराम और लक्ष्मण का विश्राम

वाल्मीकि रामायण,बालकाण्ड, सर्ग 23 में श्रीराम और लक्ष्मण का विश्वामित्र के साथ सरयू-गंगा संगम पहुंचना, पवित्र आश्रम में रात्रि विश्राम और कामदेव से जुड़ी कथा का वर्णन है।

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Valmiki Ramayan Bal Kand Sarg 23

रात्रि बीतते ही जब प्रभात हुआ, तब महामुनि विश्वामित्र ने तिनकों और पत्तों के बिछौने पर सोए हुए श्रीराम को स्नेहपूर्वक संबोधित किया, “हे राम! तुम्हारे जैसे पुत्र को पाकर महारानी कौसल्या सचमुच धन्य हैं। देखो, प्रातःकाल की संध्या का समय हो गया है। उठो और अपने नित्य देवकर्म पूर्ण करो।”

गुरु की आज्ञा पाकर श्रीराम और लक्ष्मण उठे, उन्होंने विधिपूर्वक अपने नित्य कर्म सम्पन्न किए और प्रसन्नचित्त होकर तपस्वी विश्वामित्र को प्रणाम किया। इसके बाद वे आगे की यात्रा के लिए तैयार हो गए।

सरयू-गंगा संगम के समीप पवित्र आश्रम-

मार्ग में चलते हुए वे दोनों महाबली राजकुमार गंगा और सरयू के पवित्र संगम पर पहुँचे। वहाँ त्रिपथगा गंगा का दिव्य स्वरूप देखकर उनके हृदय में अद्भुत आनंद उत्पन्न हुआ। संगम के निकट ही एक अत्यंत पवित्र आश्रम था, जहाँ शुद्ध अंतःकरण वाले महर्षि हजारों वर्षों से तपस्या कर रहे थे।

उस पावन स्थान को देखकर श्रीराम और लक्ष्मण अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने विनम्रतापूर्वक महर्षि विश्वामित्र से पूछा, “भगवन्! यह पवित्र आश्रम किसका है? यहाँ कौन महान पुरुष निवास करते हैं? इसे जानने की हमारे मन में बड़ी उत्कंठा है।”

कामदेव के भस्म होने की अद्भुत कथा-

उनकी जिज्ञासा सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र मुस्कुराए और बोले, “हे राम और लक्ष्मण! सुनो, इस आश्रम का इतिहास अत्यंत अद्भुत है। पूर्वकाल में जिसे विद्वान ‘काम’ या ‘कन्दर्प’ कहते हैं, वह साक्षात् शरीर धारण करके विचरण करता था। उसी समय भगवान स्थाणु (शिव) इसी आश्रम में एकाग्रचित्त होकर कठोर तपस्या कर रहे थे।

एक दिन जब भगवान शिव अपनी समाधि से उठकर मरुद्गणों के साथ कहीं जा रहे थे, तभी दुर्बुद्धि कामदेव ने उन पर आक्रमण करने का साहस किया। यह देखकर महादेव ने क्रोधपूर्वक उसे रोकते हुए अपनी उग्र दृष्टि उस पर डाली।

उस दिव्य और भयंकर दृष्टि के प्रभाव से कामदेव का शरीर तुरंत भस्म हो गया। उसके अंग-प्रत्यंग नष्ट हो गए और वह अंगहीन हो गया। तभी से वह ‘अनंग’ नाम से प्रसिद्ध हुआ।”

अंगदेश और पुण्य आश्रम का महत्व-

विश्वामित्र ने आगे कहा, “जिस स्थान पर कामदेव का शरीर नष्ट हुआ, वही प्रदेश ‘अंगदेश’ के नाम से विख्यात हुआ। यह वही पुण्यभूमि है, जहाँ महादेव ने तपस्या की थी। यहाँ जो मुनिगण निवास करते हैं, वे सभी भगवान स्थाणु के धर्मनिष्ठ शिष्य हैं। उनकी तपस्या से उनका समस्त पाप नष्ट हो चुका है।

अतः यह आश्रम अत्यंत पवित्र और कल्याणकारी है। हे वीरों! हम भी यहाँ स्नान करके जप और हवन करेंगे और आज की रात्रि यहीं विश्राम करेंगे। यह स्थान हमारे लिए अत्यंत शुभ और लाभदायक है।”

इसके पश्चात् वहाँ निवास करने वाले मुनियों ने विश्वामित्र और उनके साथ आए राजकुमारों का आदरपूर्वक स्वागत किया। उन्होंने उनके लिए उत्तम शयन की व्यवस्था की और उन्हें विश्राम के लिए उपयुक्त स्थान पर ले गए।

उस दिव्य और पुण्य आश्रम में, जो सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाला था, विश्वामित्र, राम और लक्ष्मण ने अत्यंत सुखपूर्वक निवास किया। महर्षि विश्वामित्र ने उस रात्रि मनोहर कथाओं के माध्यम से दोनों राजकुमारों का मनोरंजन किया।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग 23 में श्रीराम और लक्ष्मण कहाँ पहुँचे?

श्रीराम और लक्ष्मण गंगा और सरयू के पवित्र संगम पर पहुँचे।

गंगा-सरयू संगम के समीप स्थित आश्रम का क्या महत्व था?

यह वही पुण्यभूमि थी, जहाँ भगवान स्थाणु (शिव) ने तपस्या की थी और कामदेव का शरीर भस्म हुआ था।

कामदेव को ‘अनंग’ नाम क्यों मिला?

महादेव की उग्र दृष्टि के प्रभाव से कामदेव का शरीर भस्म हो गया और वह अंगहीन हो गया। तभी से वह ‘अनंग’ नाम से प्रसिद्ध हुआ।

श्रीराम और लक्ष्मण ने उस आश्रम में क्या किया?

उन्होंने विश्वामित्र के साथ वहाँ स्नान, जप और हवन किया तथा रात्रि में विश्राम किया।

उस रात्रि विश्वामित्र ने श्रीराम और लक्ष्मण का मनोरंजन कैसे किया?

महर्षि विश्वामित्र ने उस रात्रि मनोहर कथाओं के माध्यम से दोनों राजकुमारों का मनोरंजन किया।

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