राजा भरत मनु के बड़े बेटे प्रियव्रत के वंशज थे। वो एक अच्छे राजा बने। वो सदैव लोगों के कल्याण में ही लगे रहते और श्री हरि विष्णु की सेवा करते। उनके कर्म इतने अच्छे थे कि उनकी आत्मा में कोई दोष नहीं था।
एक समय के बाद उनके हृदय में भक्ति योग जाग्रत हुआ और उन्होंने वृद्ध होते ही संन्यास लेने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने राज्य और संपत्ति को पुत्रों में बाँट दिया और गंडकी नदी के किनारें एक आश्रम में रहने लगे।
उन्हें ईश्वर के निकट जाने के लिए एकांत की जरूरत थी और वो उन्हें मिल चुका था। उन्हें किसी और भौतिक सुख की अब कामना नहीं रही थी। जल्द ही वह आश्रम विष्णु के पावन मंत्रों से गुंजायमान होने लगा।
हिरण के बच्चे से राजा भरत का मोह-
एक दिन की बात है, राजा भरत जैसे ही सूर्य नारायण को जल अर्पित करने आये तो उन्होंने देखा कि एक गर्भवती हिरनी नदी के तट पर पानी पी रही थी और एक शेर उसका शिकार करने की ताक में था।
वह हिरनी अपनी जान बचाने के लिए उस नदी में कूद गई लेकिन भय और थकान के कारण उसके प्राण नहीं बच पाए। उसके गर्भ से वह शावक बाहर आ चुका था। उस जलधारा में जब उन्होंने उस नन्हे बालक को देखा तो उनका हृदय द्रवित हो उठा।
इसके बाद भरत उस हिरनी के बच्चे को अपने आश्रम लेकर आये। उन दोनों के बीच एक संबंध बन गया था। जैसे 2 दिन निकलते गए उन दोनों के बीच का प्रेम भी बढ़ता गया। वो उसे अपने हाथों से खिलाते, नहलाते और उसी की चिंता में रहते।
एक समय ऐसा भी आया जब यह प्रेम मोह में बदल गया। अब भगवान् विष्णु का भजन भी बाधित होने लगा। जब वो ध्यान में बैठते तो भी उन्हें बस उसी हिरण की चिंता रहती। जब तक वो आश्रम में लौट नहीं आता वो व्याकुल रहते। वो सोचते कहीं किसी वन्य पशु ने उसका शिकार तो नहीं कर लिया !
जब वो सकुशल वापिस आता तो उसका माथा चूमकर उसे हृदय से लगाते। मृत्यु इस ब्रह्माण्ड का अटल सत्य है। इस संसार में जिसने जन्म लिया है उसे मृत्यु का वरण करना ही होता है। इसी प्रकार राजा भरत का अंत समय भी निकट आया लेकिन वो उस हिरण को छोड़ने को तैयार नहीं थे।
राजा भरत को मिला हिरण का जन्म-
वो बस इसी विचार से दुखी हो रहे थे कि मेरे बाद इस हिरण का ध्यान कौन रखेगा? उनका दुःख इतना बड़ा था कि अंत समय तक वो उस हिरण से ही चिपके रहे और उन्होंने अगले जन्म में हिरण का ही रूप धारण किया। लेकिन श्री हरि विष्णु के भजनों की कृपा का फल भी उन्हें प्राप्त हुआ। उन्होंने भले ही शरीर हिरण का प्राप्त किया लेकिन उन्हें पिछले जन्म का ज्ञान था।
उन्हें अहसास हुआ कि प्रेम और आसक्ति के बीच का फर्क वो भूल गए थे। उनकी आत्मा मोह माया में फंस गई थी। एक समय के बाद उन्होंने अपने उस हिरण के परिवार को छोड़ दिया और उसी आश्रम में आ गए जहां पिछले जन्म में वो विष्णु का ध्यान किया करते थे।
अब उनके मन में यही लालसा थी कि मनुष्य जन्म फिर मिल जाए। हिरण की प्रार्थना स्वीकार हुई और एक बार फिर राजा भरत ने उस हिरण का शरीर त्याग कर एक ब्राह्मण का शरीर प्राप्त किया।
उन्होंने इस बार अपने जीवन को सर्वोच्च ज्ञान की खोज में समर्पित कर दिया। इस जीवन में उन्हें परब्रह्म की प्राप्ति हुई और उनकी आत्मा ने मुक्ति प्राप्त कर ली।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
राजा भरत को हिरण का जन्म क्यों मिला?
राजा भरत का अंत समय उस हिरण के प्रति मोह में बीता और उन्होंने अगले जन्म में हिरण का ही रूप धारण किया।
राजा भरत को पिछले जन्म का ज्ञान कैसे रहा?
उन्होंने हिरण का शरीर प्राप्त किया, लेकिन उन्हें पिछले जन्म का ज्ञान था।
राजा भरत के हिरण बनने का मुख्य कारण क्या था?
हिरण के प्रति उनका प्रेम इतना बढ़ गया था कि वह मोह में बदल गया और अंत समय तक उनका मन उसी में लगा रहा।
हिरण के रूप में राजा भरत ने क्या किया?
उन्होंने अपने उस हिरण के परिवार को छोड़ दिया और उसी आश्रम में आ गए जहां पिछले जन्म में वो विष्णु का ध्यान किया करते थे।
राजा भरत को परब्रह्म की प्राप्ति कैसे हुई?
उन्होंने ब्राह्मण का शरीर प्राप्त करने के बाद अपने जीवन को सर्वोच्च ज्ञान की खोज में समर्पित कर दिया। इस जीवन में उन्हें परब्रह्म की प्राप्ति हुई और उनकी आत्मा ने मुक्ति प्राप्त कर ली।








