|| ज्ञान का महासागर ||

भगवद्गीता ज्ञान : स्थितप्रज्ञ कौन होता है? जानिए स्थितप्रज्ञ के 6 प्रमुख लक्षण

भगवद्गीता के अनुसार स्थितप्रज्ञ के लक्षण, कामनाओं का त्याग, सुख-दुःख में समभाव, राग-भय-क्रोध से मुक्ति, इन्द्रियों का संयम, निर्लिप्तता और अहंकार-ममता के अभाव को समझें।

साझा करें:

Sthitaprajna Ke Lakshan

भगवद्गीता में ‘स्थितप्रज्ञ’ एक अत्यंत महत्वपूर्ण और उच्च आध्यात्मिक अवस्था का वर्णन है। ‘स्थितप्रज्ञ’ शब्द दो भागों से मिलकर बना है- ‘स्थित’ अर्थात स्थिर और ‘प्रज्ञ’ अर्थात बुद्धि। इसलिए स्थितप्रज्ञ वह व्यक्ति है जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है, जो किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता और अपने आत्मस्वरूप में स्थित रहता है।

गीता के दूसरे अध्याय में अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षण क्या हैं, वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है। इसके उत्तर में भगवान ने स्थितप्रज्ञ के गुणों और व्यवहार का विस्तार से वर्णन किया है।

कामनाओं का पूर्ण त्याग-

सबसे पहला और प्रमुख लक्षण है- कामनाओं का पूर्ण त्याग। भगवान कहते हैं कि जब मनुष्य अपने मन में उत्पन्न होने वाली सभी कामनाओं को छोड़ देता है और अपने आप में ही संतुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वह संसार से भाग जाता है, बल्कि वह भीतर से पूर्ण होता है, उसे बाहरी वस्तुओं की आवश्यकता नहीं रहती।

सुख-दुःख में समभाव और राग, भय, क्रोध से मुक्ति-

दूसरा लक्षण है- सुख और दुःख में समभाव। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति न तो दुःख आने पर विचलित होता है और न ही सुख मिलने पर अत्यधिक प्रसन्न होता है। वह हर परिस्थिति को समान दृष्टि से देखता है। यह समता ही उसकी स्थिरता का आधार है।

तीसरा महत्वपूर्ण गुण है- राग, भय और क्रोध से मुक्त होना। राग अर्थात आसक्ति, भय अर्थात खोने का डर और क्रोध अर्थात इच्छा के बाधित होने पर उत्पन्न प्रतिक्रिया। ये तीनों ही मन को अशांत करते हैं। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति इनसे ऊपर उठ चुका होता है, इसलिए उसका मन शांत और स्थिर रहता है।

इन्द्रियों का संयम और विषयों के प्रति निर्लिप्तता-

चौथा लक्षण है- इन्द्रियों का संयम। जैसे कछुआ अपने अंगों को भीतर समेट लेता है, वैसे ही स्थितप्रज्ञ व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को विषयों से हटा लेता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वह इन्द्रियों का उपयोग नहीं करता, बल्कि वह उनके वश में नहीं होता।

पाँचवाँ गुण है- विषयों के प्रति निर्लिप्तता। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति विषयों के संपर्क में रहते हुए भी उनसे प्रभावित नहीं होता। जैसे समुद्र में नदियों का जल मिलने पर भी समुद्र अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता, वैसे ही वह व्यक्ति बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता।

अहंकार और ममता का अभाव-

छठा लक्षण है- अहंकार और ममता का अभाव। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति ‘मैं’ और ‘मेरा’ के भाव से मुक्त होता है। वह जानता है कि सब कुछ नश्वर है और उसका वास्तविक स्वरूप आत्मा है, जो सदा स्थिर और अचल है। स्थितप्रज्ञ का जीवन बाहरी दृष्टि से सामान्य लग सकता है, परंतु भीतर से वह पूर्णतः शांत, संतुलित और जागरूक होता है।

वह अपने कर्तव्यों का पालन करता है, लेकिन उसमें आसक्ति नहीं रखता। स्थितप्रज्ञ होना कोई एक क्षण की उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह निरंतर साधना, विवेक, समता और आत्मचिंतन का परिणाम है। जो व्यक्ति धीरे-धीरे अपने मन को नियंत्रित करता है, कामनाओं का त्याग करता है और समभाव में स्थित रहता है, वह इस अवस्था को प्राप्त कर सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

भगवद्गीता में स्थितप्रज्ञ किसे कहा गया है?

जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है, जो किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता और अपने आत्मस्वरूप में स्थित रहता है, उसे स्थितप्रज्ञ कहा गया है।

स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का सबसे प्रमुख लक्षण क्या है?

स्थितप्रज्ञ व्यक्ति मन में उत्पन्न होने वाली सभी कामनाओं को छोड़ देता है और अपने आप में ही संतुष्ट रहता है।

स्थितप्रज्ञ सुख और दुःख को किस प्रकार देखता है?

स्थितप्रज्ञ व्यक्ति न तो दुःख आने पर विचलित होता है और न ही सुख मिलने पर अत्यधिक प्रसन्न होता है। वह हर परिस्थिति को समान दृष्टि से देखता है।

स्थितप्रज्ञ व्यक्ति इन्द्रियों के साथ कैसा व्यवहार करता है?

वह अपनी इन्द्रियों को विषयों से हटा लेता है और इन्द्रियों के वश में नहीं होता।

स्थितप्रज्ञ अवस्था कैसे प्राप्त की जा सकती है?

जो व्यक्ति धीरे-धीरे अपने मन को नियंत्रित करता है, कामनाओं का त्याग करता है और समभाव में स्थित रहता है, वह इस अवस्था को प्राप्त कर सकता है।

नवीनतम लेख

सभी लेख देखें
श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 1, श्लोक 34 : अर्जुन ने युद्धभूमि में किन संबंधियों को देखा?

भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 1, श्लोक 34 : अर्जुन ने युद्धभूमि में किन संबंधियों को देखा?

भगवद्गीता के अध्याय 1 के श्लोक 34 में अर्जुन युद्धभूमि में उपस्थित आचार्य, पिता, पुत्र, पितामह, मामा, ससुर और अन्य संबंधियों को देखकर युद्ध करने के धर्म पर प्रश्न उठाते हैं।

कामना का त्याग क्यों जरूरी है? इच्छाओं से मुक्ति कैसे मिलेगी?

आध्यात्म

कामना का त्याग क्यों जरूरी है? इच्छाओं से मुक्ति कैसे मिलेगी?

कामना का अर्थ, इच्छाओं से उत्पन्न आसक्ति, क्रोध और मानसिक अशांति को समझिए। जानिए विवेक, समता, आत्मसंतोष और ईश्वर के प्रति समर्पण से कामनाओं का त्याग कैसे करें।

सोमदत्त (सौदास) को असुर योनि क्यों मिली? शिव के शाप से कैसे हुआ उद्धार?

पौराणिक कथाएं

सोमदत्त (सौदास) को असुर योनि क्यों मिली? शिव के शाप से कैसे हुआ उद्धार?

सोमदत्त (सौदास) को महादेव ने असुर योनि का शाप क्यों दिया? जानिए गौतम ऋषि की सलाह, गर्ग मुनि द्वारा नौ दिनों तक सुनाई गई रामकथा और उसके चमत्कारी प्रभाव की कथा।

भागवत पुराण, प्रथम स्कंध (24) : राजा परीक्षित का वैराग्य और गंगा तट पर उनका अंतिम संकल्प

भागवत पुराण

भागवत पुराण, प्रथम स्कंध (24) : राजा परीक्षित का वैराग्य और गंगा तट पर उनका अंतिम संकल्प

भागवत पुराण, प्रथम स्कंध के इस लेख में पढ़िए राजा परीक्षित को तक्षक सर्प के शाप के बाद वैराग्य कैसे हुआ। उन्होंने राजपाट त्यागकर गंगा तट पर आमरण अनशन किया।