सृष्टि के आरंभ की कथाओं में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति से जुड़ी कई ऐसी घटनाएं आती हैं, जिनमें देवी-देवताओं के साथ-साथ रहस्यमयी जीवों और दिव्य शक्तियों का भी वर्णन मिलता है। ऐसी ही एक कथा मधु और कैटभ की है, जो भगवान विष्णु के कान के मैल से उत्पन्न हुए और आगे चलकर उन्होंने ब्रह्मा जी से वेद छीनकर उन्हें जल में छिपा दिया।
इसी घटना के बाद भगवान विष्णु ने हयग्रीव रूप धारण करके दोनों असुरों का सामना किया। लंबा युद्ध होने के बाद भगवान ने अपनी बुद्धि से उन्हें ऐसा वरदान देने के लिए तैयार कर लिया, जिससे अंततः दोनों का वध संभव हो सका। इस लेख में पृथ्वी के ‘मेदिनी’ नाम और भगवान विष्णु के ‘मधुसूदन’ नाम की व्याख्या भी की गई है।
ब्रह्मा के ध्यान से वेदों का प्राकट्य और मधु-कैटभ का जन्म-
जब सृष्टि की रचना का समय आया, तब ब्रह्मा जी ध्यान में लीन हुए। इसी ध्यान से चारों वेद प्रकट हुए और सृष्टि को आगे बढ़ाने का मार्ग तैयार होने लगा।
उसी समय भगवान विष्णु के कान के मैल से दो जीव बाहर निकले। उनमें से एक को शहद की इच्छा हुई, इसलिए उसका नाम मधु रखा गया, जबकि दूसरा कीट के समान दिखाई देता था, इसलिए उसका नाम कैटभ पड़ा।
दोनों ने जब आंखें खोलीं तो चारों ओर केवल जल ही जल दिखाई दे रहा था। उन्हें अपने अस्तित्व और आसपास की दुनिया के बारे में कुछ पता नहीं था। उन्होंने उसी जल को पीना शुरू कर दिया। जितना अधिक वे उस द्रव्य को पीते गए, उतना ही उनका शरीर विशाल होता चला गया।
कुछ समय बाद दोनों ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। कमल पर विराजमान ब्रह्मा जी को देखकर उन्हें क्रोध आया और उन्होंने उनसे वह आसन छोड़ने को कहा। जब ब्रह्मा जी ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया तो दोनों और अधिक उग्र हो गए।
मधु-कैटभ ने वेदों को जल में छिपाया-
मधु और कैटभ ने ब्रह्मा जी को युद्ध के लिए ललकारा, लेकिन ब्रह्मा जी ने उनका सामना करने से इनकार कर दिया। क्रोधित होकर दोनों ने उस कमल को हिलाना शुरू कर दिया, जिस पर ब्रह्मा जी बैठे थे।
इस हलचल में ब्रह्मा जी के हाथों से वेद छूट गए और मधु-कैटभ ने उन्हें उठाकर जल के भीतर छिपा दिया। ब्रह्मा जी समझ गए कि यदि इन दोनों को रोका नहीं गया तो वे सृष्टि के दूसरे कार्यों में भी बाधा डाल सकते हैं।
तब उन्होंने भगवान विष्णु का स्मरण किया। ब्रह्मा जी की चिंता देखकर विष्णु ने पूरी बात समझी और मधु-कैटभ का सामना करने का निश्चय किया। वेदों को वापस लाने और सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान ने हयग्रीव रूप धारण किया। हयग्रीव का स्वरूप अश्वमुख वाला बताया गया है। इसके बाद भगवान विष्णु और दोनों असुरों के बीच भयंकर युद्ध शुरू हुआ।
पांच हजार वर्ष तक चला युद्ध और विष्णु की युक्ति -
मधु और कैटभ दोनों अत्यंत शक्तिशाली थे। एक भाई थक जाता तो दूसरा युद्ध करने लगता और इस तरह दोनों बारी-बारी से भगवान विष्णु से लड़ते रहे। यह युद्ध लगातार पांच हजार वर्षों तक चलता रहा।
इतने लंबे संघर्ष के बाद भगवान विष्णु समझ गए कि केवल शक्ति के बल पर दोनों को हराना आसान नहीं होगा। अब उन्हें बुद्धि से काम लेना होगा।
भगवान ने अचानक युद्ध रोक दिया और दोनों से प्रसन्न होने का भाव दिखाते हुए कहा कि वे उनसे कोई वरदान मांग सकते हैं। दोनों असुरों को लगा कि विष्णु युद्ध से डर गए हैं। उन्होंने उलटे भगवान का उपहास करते हुए कहा कि वरदान तो वे स्वयं देने की स्थिति में हैं।
यही वह अवसर था जिसकी विष्णु प्रतीक्षा कर रहे थे। भगवान ने कहा कि यदि वे सच में प्रसन्न हैं तो उन्हें ऐसा वर दें कि वे दोनों का वध कर सकें। अपनी बात में फंस चुके मधु और कैटभ ने एक शर्त रख दी। उन्होंने कहा कि भगवान उनका वध केवल ऐसी जगह कर सकते हैं जहां पानी न हो। चारों ओर जल ही जल था, इसलिए उन्हें लगा कि उन्होंने अपने बचने का रास्ता निकाल लिया है।
जंघा पर रखकर हुआ मधु-कैटभ का वध-
भगवान विष्णु मुस्कुराए और अपना विराट स्वरूप धारण कर लिया। उनका शरीर इतना विशाल हो गया कि दोनों असुर उनके सामने बहुत छोटे दिखाई देने लगे।
इसके बाद भगवान ने दोनों को अपनी जंघाओं पर रख लिया, क्योंकि वह स्थान जल से बाहर था। फिर उन्होंने दोनों असुरों का वध कर दिया।
इस कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने मधु का अंत किया, इसलिए उन्हें ‘मधुसूदन’ कहा गया। ‘मधुसूदन’ का अर्थ ही है-मधु का संहार करने वाला। वध के बाद भगवान ने वेदों को जल से प्राप्त किया और उन्हें ब्रह्मा जी को सौंप दिया। इस तरह सृष्टि की रचना का कार्य फिर से आगे बढ़ सका।
पृथ्वी को ‘मेदिनी’ नाम कैसे मिला?
मधु और कैटभ के वध के बाद उनकी देह से निकली मेद या वसा से पृथ्वी के निर्माण की कथा आती है। इसी कारण पृथ्वी को ‘मेदिनी’ नाम दिया गया। संस्कृत में ‘मेद’ शब्द का संबंध वसा या चर्बी से माना जाता है और ‘मेदिनी’ का अर्थ उस कथा के संदर्भ में मेद से बनी धरती से जोड़ा गया है।
इसके बाद दोनों असुरों के शरीर के अलग-अलग हिस्सों से पृथ्वी के बारह भू-भाग या भू-मंडलीय हिस्से बने। हालांकि पृथ्वी की 12 भू-मंडलीय प्लेट बनने की बात आधुनिक भूविज्ञान का तथ्य नहीं है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार पृथ्वी की बाहरी कठोर परत कई टेक्टोनिक प्लेटों में विभाजित है, जिनकी संख्या इस धार्मिक कथा से अलग वैज्ञानिक वर्गीकरण के आधार पर बताई जाती है।
इसके बाद ब्रह्मा जी अपने कमल पर विराजमान होकर सृष्टि की रचना का कार्य फिर से शुरू करते हैं। इस तरह मधु-कैटभ की कथा में एक साथ वेदों की रक्षा, विष्णु के मधुसूदन नाम और पृथ्वी के मेदिनी नाम की धार्मिक व्याख्या सामने आती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-भगवान विष्णु को मधुसूदन क्यों कहा जाता है?
धार्मिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने मधु नाम के असुर का वध किया था। इसी कारण उनका एक प्रसिद्ध नाम ‘मधुसूदन’ पड़ा।
2-मधु और कैटभ कौन थे?
मधु और कैटभ दो असुर भाई थे, जिनकी उत्पत्ति भगवान विष्णु के कान के मैल से होने की कथा पुराणों में मिलती है।
3-भगवान विष्णु ने हयग्रीव रूप क्यों धारण किया?
मधु-कैटभ से युद्ध करने और वेदों को वापस प्राप्त करने के लिए भगवान विष्णु ने अश्वमुख वाले हयग्रीव स्वरूप को धारण किया, ऐसा धार्मिक कथा में बताया गया है।
4-पृथ्वी को मेदिनी क्यों कहा जाता है?
मधु और कैटभ के वध के बाद उनकी देह से निकली मेद से पृथ्वी के निर्माण की कथा कही गई है। इसी वजह से पृथ्वी का एक नाम ‘मेदिनी’ बताया गया है।
5-क्या पृथ्वी की बारह टेक्टोनिक प्लेट मधु-कैटभ के शरीर से बनी थीं?
यह धार्मिक कथा से जुड़ी मान्यता है। आधुनिक भूविज्ञान टेक्टोनिक प्लेटों की उत्पत्ति और उनकी संख्या को पृथ्वी की भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के आधार पर समझाता है।