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पिप्पलाद ऋषि और शनिदेव की कथा: क्यों पीपल और बच्चों पर नहीं पड़ता शनि का प्रभाव?

पिप्पलाद ऋषि ने माता-पिता की मृत्यु का कारण जानकर शनिदेव को दंड दिया। ब्रह्मा जी के वरदान से पीपल और बच्चों से जुड़ी शनि की विशेष मान्यता की शुरुआत हुई।

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Pippalad Rishi Shani Dev

एक समय की बात है। देवताओं के राजा इंद्र एक राक्षस से बड़े परेशान हो गए थे। उसका नाम वृत्तासुर था। जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि महर्षि दधीचि की हड्डियों से बने वज्र से उसका वध हो सकता है तो इंद्र ने देवताओं के कल्याण के लिए उनसे हड्डियां मांगी। महर्षि द‍धीचि ने अपनी हड्डियां खुशी से इंद्र को दे दी और अपने शरीर का त्याग कर दिया। उनकी पत्नी को जब इस बात का पता चला तो वो भी सती हो गई। लेकिन उनका एक शिशु था जो बहुत छोटा था। दधीचि की पत्नी ने उस शिशु को एक घने पीपल के पेड़ के कोटर में रख दिया।

पीपल के कोटर में रखा महर्षि दधीचि का वह बालक पीपल के फल को खाकर जीवित रहा इसलिए उसका नाम पिप्पलाद हुआ। एक बार उसका सामना देवऋषि नारद से हुआ और नारद जी ने उसे उसकी पहचान बताई। नारद जी ने उस बालक को कहा कि तुम्हारे पिता ने देवताओं के कार्य को सिद्ध करने के लिए अपने शरीर का त्याग किया है। पिप्पलाद ने नारद जी से अपने माता पिता की अचानक से हुई मृत्यु का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि यह शनि की दशा के कारण हुआ है।

पिप्पलाद से इस प्रकार के वचन कहकर नारद जी वहा से चल दिए। इसके बाद पिप्पलाद ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की और उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने उसे दर्शन दिए और पिप्पलाद ने ब्रह्मा जी से शक्तियां प्राप्त की। इसके बाद पिप्पलाद ने शनि का आह्वान किया और उन पर जोर से प्रहार किया। उस समय सूर्य देव भी शनि देव को बचाने में समर्थ नहीं हो पा रहे थे।

उन्होंने ब्रह्म जी से कहा कि वो पिप्पलाद को शांत कर दे। ब्रह्मा जी के द्वारा रोके जाने पर पिप्पलाद ने अपने क्रोध को शांत किया और शनि देव को छोड़ दिया। ब्रह्मा जी ने भी प्रसन्न होकर पिप्पलाद को वरदान दिया कि आज से किसी भी शिशु पर शनि की दशा का प्रभाव नहीं आएगा और पीपल के पेड़ की सेवा करने वाले या पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर तप करने वाले मनुष्य को शनि कभी अशुभ फल नहीं देंगे। पिप्पलाद ने भले ही शनि देव को छोड़ दिया था लेकिन वो अब लंगड़े हो गए थे और उनकी चाल धीमी हो गई थी। उस समय से ही शनि की चाल धीमी है और वो एक राशि का भ्रमण करने में ढाई साल लेते है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1-पिप्पलाद ऋषि कौन थे?

पिप्पलाद ऋषि महर्षि दधीचि के पुत्र माने जाते हैं। पीपल के फल खाकर पालन-पोषण होने के कारण उनका नाम पिप्पलाद पड़ा।

2-पिप्पलाद ऋषि ने शनिदेव को दंड क्यों दिया?

नारद जी से उन्हें पता चला कि उनके माता-पिता की मृत्यु शनिदेव की दशा के कारण हुई थी। इससे क्रोधित होकर उन्होंने शनिदेव का आह्वान कर उन्हें दंड दिया।

3-पिप्पलाद ऋषि को ब्रह्मा जी से कौन-सा वरदान मिला था?

कथा के अनुसार, ब्रह्मा जी ने वरदान दिया कि शनि की दशा का प्रभाव शिशुओं पर नहीं पड़ेगा और पीपल की सेवा या उसके नीचे तप करने वालों पर शनिदेव अशुभ प्रभाव नहीं डालेंगे।

4-शनिदेव की चाल धीमी क्यों मानी जाती है?

पौराणिक कथा के अनुसार, पिप्पलाद ऋषि के प्रहार से शनिदेव लंगड़े हो गए और उनकी चाल धीमी हो गई। इसी कारण उनकी धीमी गति की मान्यता बताई जाती है।

5-शनिदेव एक राशि में कितने समय तक रहते हैं?

ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार शनिदेव लगभग ढाई वर्ष तक एक राशि में रहते हैं और इसके बाद दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं।

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