जब हम इस विशाल ब्रह्माण्ड को देखते हैं तो मन में एक सवाल जरूर उठता है कि आखिर इसकी शुरुआत कैसे हुई होगी? यह पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि, वायु, सूर्य, चंद्रमा और असंख्य जीव-जंतु कहां से आए? सनातन धर्म के ग्रंथों में सृष्टि की शुरुआत और उसके विस्तार को लेकर बेहद गहरा वर्णन मिलता है।
इन ग्रंथों के अनुसार सृष्टि की शुरुआत में केवल परब्रह्म था। उसका न कोई आदि था और न कोई अंत। उसका कोई निश्चित आकार नहीं था, लेकिन उसे केवल निराकार कह देना भी सही नहीं होगा। जब परब्रह्म की इच्छा से सृष्टि की रचना शुरू हुई तो सबसे पहले ॐ की दिव्य ध्वनि प्रकट हुई। इसके बाद धीरे-धीरे पंचमहाभूत, इंद्रियां, नारायण, हिरण्यगर्भ और ब्रह्मा जी के प्रकट होने के साथ सृष्टि का विस्तार शुरू हुआ।
शुरुआत में केवल परब्रह्म था-
सृष्टि के आरंभ से पहले कुछ भी दिखाई नहीं देता था। न पृथ्वी थी, न आकाश, न सूर्य और न ही चंद्रमा। उस समय केवल परब्रह्म था। वह अनंत था, जिसकी कोई शुरुआत और अंत नहीं था।
जब परब्रह्म ने सृष्टि को प्रकट करने की इच्छा की तो सबसे पहले एक दिव्य ध्वनि उत्पन्न हुई। इसे ॐ कहा गया। सनातन परंपरा में ॐ को अत्यंत पवित्र माना गया है और संसार की सभी ध्वनियों का मूल भी ॐ को ही बताया गया है।
इसके बाद सृष्टि के निर्माण में तीन गुण प्रकट हुए-सत्व, रज और तम। सत्व गुण को संरक्षण से, रजोगुण को क्रिया और सृजन से तथा तमोगुण को संहार से जोड़ा गया। इन्हीं तीन गुणों के प्रभाव से आगे सृष्टि के मूल तत्वों का निर्माण हुआ।
पंचमहाभूत से बनी सृष्टि की नींव-
इसके बाद पांच मूल तत्व प्रकट हुए, जिन्हें पंचमहाभूत कहा गया। ये हैं-आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। इन्हीं पांच तत्वों से आगे चलकर संसार की रचना हुई।
इसके साथ पांच ज्ञानेंद्रियां, पांच कर्मेंद्रियां और मन का भी प्रकट होना बताया गया। मन इन सभी को संचालित करता है और जीव को अपने आसपास की दुनिया को समझने तथा अनुभव करने की शक्ति देता है।
उस समय चारों ओर केवल जल ही जल था। जहां तक नजर जाती, जल दिखाई देता था। लेकिन अभी ऐसा कुछ नहीं था जो उस जल में डूब सके। इसी समय परब्रह्म ने एक दिव्य पुरुष का रूप धारण किया और जल में प्रवेश किया। जल को ‘नार’ और निवास को ‘अयन’ कहा जाता है। इसी वजह से उस दिव्य पुरुष को नारायण कहा गया।
नारायण और हिरण्यगर्भ की उत्पत्ति-
इसके बाद उस दिव्य पुरुष ने जल में अपना अंश स्थापित किया। जल से उसका पालन हुआ और वहां एक चमकता हुआ स्वर्णिम अंड प्रकट हुआ। यह कोई साधारण अंड नहीं था, बल्कि पूरी सृष्टि को अपने भीतर समेटे हुए था।
क्योंकि इसे स्वयं ब्रह्म ने उत्पन्न किया था, इसलिए इसे ब्रह्माण्ड कहा गया। इसके बाद वही दिव्य पुरुष भगवान विष्णु के रूप में उस ब्रह्माण्ड में प्रवेश कर गए। भगवान विष्णु को सृष्टि का पालन करने वाला माना गया और इसी कारण उनका संबंध सत्व गुण से जोड़ा गया।
उस स्वर्णिम अंड ने भगवान विष्णु को अपने भीतर उसी तरह धारण कर लिया, जैसे माता अपने गर्भ में बच्चे को संभालकर रखती है। विष्णु को अपने भीतर धारण करने के कारण इस ब्रह्माण्डीय अंड को हिरण्यगर्भ कहा गया।
‘हिरण्य’ का अर्थ स्वर्ण और ‘गर्भ’ का अर्थ भीतर धारण करने वाला होता है। इसलिए हिरण्यगर्भ को स्वर्णिम गर्भ भी कहा जाता है।
विष्णु की नाभि से प्रकट हुए ब्रह्मा-
हिरण्यगर्भ के भीतर सृष्टि के विस्तार की प्रक्रिया आगे बढ़ी। भगवान विष्णु की नाभि से एक सुंदर कमल का फूल प्रकट हुआ। इसी कमल पर ब्रह्मा जी प्रकट हुए।
ब्रह्मा जी को सृष्टि की रचना का कार्य सौंपा गया। चूंकि वे विष्णु की नाभि से निकले कमल से प्रकट हुए थे, इसलिए उन्हें नाभिज भी कहा गया।
ब्रह्मा जी ने जब चारों ओर देखा तो उनके सामने एक विशाल और रहस्यमय ब्रह्माण्ड था। उन्हें सृष्टि को आगे बढ़ाने का कार्य करना था। कहा जाता है कि हिरण्यगर्भ के भीतर एक वर्ष तक रहने के बाद ब्रह्मा जी ने उस ब्रह्माण्डीय अंड को दो भागों में बांट दिया। उसका ऊपरी भाग स्वर्ग बना और निचला भाग पृथ्वी। इन दोनों के बीच आकाश का विस्तार हुआ।
इस तरह धीरे-धीरे ब्रह्माण्ड अपना स्वरूप लेने लगा। जो स्थान पहले अंधकार और जल से भरा हुआ था, वहां अब सृष्टि की एक नई व्यवस्था दिखाई देने लगी।
ब्रह्मा जी ने इस नई बनी सृष्टि को देखा और उसके आगे विस्तार का कार्य शुरू किया। यहीं से जीव-जगत, प्रकृति और अलग-अलग लोकों के निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
परब्रह्म से ॐ, फिर त्रिगुण और पंचमहाभूत, उसके बाद नारायण, हिरण्यगर्भ और भगवान विष्णु से ब्रह्मा जी का प्रकट होना-सृष्टि की शुरुआत को समझने की यह परंपरा भारतीय आध्यात्मिक चिंतन की सबसे गहरी कथाओं में से एक है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-ब्रह्माण्ड की शुरुआत में क्या था?
सनातन धर्म की इस परंपरा के अनुसार सृष्टि के आरंभ में केवल परब्रह्म था। न पृथ्वी थी, न आकाश और न ही दिखाई देने वाला कोई संसार।
2-सृष्टि की शुरुआत में ॐ का क्या महत्व है?
सृष्टि के प्रकट होने की प्रक्रिया में सबसे पहले ॐ की दिव्य ध्वनि उत्पन्न होने की बात कही गई है। इसे समस्त ध्वनियों का मूल माना जाता है।
3-पंचमहाभूत कौन-कौन से हैं?
पंचमहाभूत हैं-आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। इन्हें सृष्टि के पांच मूल तत्व माना गया है।
4-हिरण्यगर्भ किसे कहा जाता है?
हिरण्यगर्भ उस स्वर्णिम ब्रह्माण्डीय अंड को कहा गया है, जिसने भगवान विष्णु को अपने भीतर धारण किया था। ‘हिरण्य’ का अर्थ स्वर्ण और ‘गर्भ’ का अर्थ धारण करने वाला है।
5-ब्रह्मा जी का जन्म कैसे हुआ?
पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु की नाभि से कमल प्रकट हुआ और उसी कमल पर ब्रह्मा जी का जन्म हुआ। उन्हें सृष्टि की रचना का कार्य सौंपा गया।